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Friday, May 24, 2024, 6:12 pm

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ये है हमारा राइजिंग भास्कर यानी राइजिंग इंडिया

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अतिथि संपादक : डीके पुरोहित

मित्रों,

हे मालिक तेरे बंदे हम, ऐसे हो हमारे करम, नेकी पर चलें और बदी से टलें ताकि हंसते हुए निकले दम…यह प्रार्थना ‘दो आंखें बारह हाथ’ (1957)…गीतकार भरत व्यास, गायिका लता मंगेश्कर, संगीत वसंत देसाई…यह आप सब जानते हैं…इस प्रार्थना ने मेरे जीवन को एक नई दिशा दी है…लोग मर जाते हैं, मगर शब्द-सुर साधना रह जाती है। मित्रों, जब मैं घोर निराशा में होता हूं, कोई रास्ता नजर नहीं आता है तो ये पंक्तियां सुनता हूं तो आंखों से आंसू आ जाते हैं…कैसे लोग होंगे जिन्होंने इसे लिखा, गाया और इतिहास में अमर हो गए…हर एक शब्द सृष्टि का संवाहक होता है…शब्द केवल शब्द नहीं होते…शब्द ही साक्षात परमात्मा है…परमात्मा को किसने देखा इस पर क्या लिखें, हो सकता है हम जो लिख रहे हैं वो परमात्मा ही लिखा रहा हो…बहरहाल…इस प्रार्थना का स्मरण करते हुए आज से एक नई शुरुआत कर रहे हैं…राइजिंग भास्कर डॉट कॉम…

भास्कर ही क्यों? आपके मन में सवाल हो सकता है। 1995 में हमने उदित भास्कर नाम से पाक्षिक पेपर के टाइटल के लिए आवेदन किया था। मगर सरकारी सिस्टम आप जानते हैं कैसा है यह फाइल दिल्ली तक पहुंची ही नहीं…अभी पांच महीने पहले हमने फिर इसी टाइटल के लिए आवेदन किया, मगर फिर वही सरकारी सिस्टम…फाइल दिल्ली तक पहुंची ही नहीं…बहरहाल उदित भास्कर हमारे मन में वर्षों से था जब भास्कर ने राजस्थान में दस्तक ही नहीं दी थी और हमने भास्कर नाम के अखबार का नाम ही नहीं सुना था। हम उन दिनों हिन्दुस्तान के जैसलमेर रिपोर्टर हुआ करते थे। तब अचानक किसी दोस्त ने कहा- राजस्थान में भास्कर आ रहा है, कमलेश्वर संपादक है…एप्लाई करो…मैंने कहा हिन्दुस्तान छोड़कर मैं भास्कर में क्यों जाऊं? इतना अच्छा अखबार है…पैसे नहीं है, मगर मेरी कोई खबर रुकती नहीं…पूरी आजादी है…तब बात खत्म हो गई और हम सबकुछ भूल गए।

हिन्दुस्तान में वर्षों तक काम किया…हिन्दुस्तान से छह-छह महीनों तक पैसे नहीं आते थे…हमारी प्राइवेट नौकरी भी छूट गई थी…और नौकरी हमने जॉइन की नहीं क्योंकि अखबार में होने की सब नियोक्ता कीमत चाहते थे, हम किसी के हाथ का मोहरा बनना नहीं चाहते थे…मित्रों हमारी मां पूजा में जो एक दो रुपया चढ़ाती थी उसे चुराकर चार-पांच पोस्टकार्ड खरीदते और पोस्टकार्ड पर हिन्दुस्तान को न्यूज भेजते थे…हिन्दुस्तान की ओर से फैक्स कार्ड दिया हुआ था और निशुल्क में न्यूज फैक्स कर सकते थे, मगर तारघर वाले एक कॉपी अपने पास रख देते थे और हमारी न्यूज आउट हो जाती थी, इसलिए हमने फैक्स करवाना बंद कर दिया..मित्रों उन दिनों हम क्या करते थे, क्या करना चाहते थे कोई नहीं जानता था…सीआईडी वाले हमारी डाक फाड़कर उसमें क्या आ रहा है क्या जा रहा है पढ़ लेते थे…हमने इसकी लिखित में सीआईडी को शिकायत भी की…सीआईडी का एक इंस्पेक्टर घर आया और शिकायत वापस लेने को कहा, मगर हमने शिकायत वापस नहीं ली…ये सब बातें इसलिए कि जर्नलिज्म के खतरे होते हैं, सीआईडी और दुनिया भर की खुफिया एजेंसियां आपकी पल-पल की खबर रखते हैं…लोग परमाणु बम से नहीं डरते, लेकिन किसी देश को पता चल जाए कि कोई देश उस पर परमाणु हमला कर सकता है तो यह खबर बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है…हमने उदित भास्कर डॉट कॉम में यह खबर ब्रेक की थी कि चीन अमेरिका पर कभी भी परमाणु हमला कर सकता है… उसके बाद अमेरिका की स्पीकर नेंसी पेलोसी ताइवान पहुंची और तनाव की खबरें आप सबने सुनी पढ़ी होगी। तब संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी कहा था दुनिया परमाणु जंग से दो कदम दूर…बहरहाल बात आई गई हो गई…हमने साल भर उदित भास्कर डॉट कॉम में जितना समय मिला उतना दिया, पर एक महीने से ज्यादा समय हो गया उदित भास्कर डॉट कॉम किसी ने हैक कर लिया है, आप पुरानी पोस्टें पढ़ तो सकते हैं, मगर हम उसमें कोई भी खबर अपलोड नहीं कर पा रहे हैं…इसलिए हमने राइजिंग भास्कर डॉट कॉम की नई शुरुआत की है…हमने उदित भास्कर डॉट कॉम को बंद नहीं किया है, साल भर के लिए उसे रिन्यू करा लिया है और हर साल रिन्यू कराते रहेंगे। हमारा अगला कदम होगा उदित भास्कर कॉर्पोरेशन लिमिटेड नाम से कंपनी बनाना और उदित भास्कर अखबार निकालना। इसके लिए हम आर्थिक रूप से मजबूत होने पर आईपीओ निकालेंगे। अगर ईश्वर ने चाहा और कोई पूंजीपति हमारी शर्तों पर पूंजी लगाने को तैयार हुआ तो यह ख्वाब भी पूरा होगा। हम नहीं चाहते हमारे पास अरबो-खरबों रुपए हो, हमारी लिखने की आजादी कभी खत्म नहीं हो…हम जो मिशन लेकर चलें हैं उसमें हमारे साथ केवल ईश्वर है और भारत की 140 करोड़ जनता। जनता का विश्वास हम कभी नहीं तोड़ेंगे। हमें ना चुनाव लड़ना है और ना ही नेता बनना है, हम तो कलम से क्रांति का बीज बोना चाहते हैं।

अब आपके मन में सवाल होगा कि दैनिक भास्कर जैसे अखबार को छोड़कर राइजिंग भास्कर से लगाव क्यों? इसकी चर्चा फिलहाल हम नहीं कर रहे। फिर कभी किसी दिन करेंगे। अब आते हैं कि हम लिखते क्यों हैं? इसका जवाब आपको क्रांतिकारी कवि शिवमंगल सिंह सुमन की निम्न कविता उद्धृत करते हुए बताना चाहते हैं। पहले आप नीचे पूरी कविता पढ़ें-

घर-आंगन में आग लग रही।
सुलग रहे वन -उपवन,
दर दीवारें चटख रही हैं
जलते छप्पर- छाजन।
तन जलता है , मन जलता है
जलता जन-धन-जीवन,
एक नहीं जलते सदियों से
जकड़े गर्हित बंधन।
दूर बैठकर ताप रहा है,
आग लगाने वाला,
मेरा देश जल रहा,
कोई नहीं बुझाने वाला।

भाई की गर्दन पर
भाई का तन गया दुधारा
सब झगड़े की जड़ है
पुरखों के घर का बंटवारा
एक अकड़कर कहता
अपने मन का हक ले लेंगें,
और दूसरा कहता तिल
भर भूमि न बंटने देंगें।
पंच बना बैठा है घर में,
फूट डालने वाला,
मेरा देश जल रहा,
कोई नहीं बुझाने वाला।

दोनों के नेतागण बनते
अधिकारों के हामी,
किंतु एक दिन को भी
हमको अखरी नहीं गुलामी।
दानों को मोहताज हो गए
दर-दर बने भिखारी,
भूख, अकाल, महामारी से
दोनों की लाचारी।
आज धार्मिक बना,
धर्म का नाम मिटाने वाला
मेरा देश जल रहा,
कोई नहीं बुझानेवाला।

होकर बड़े लड़ेंगें यों
यदि कहीं जान मैं लेती,
कुल-कलंक-संतान
सौर में गला घोंट मैं देती।
लोग निपूती कहते पर
यह दिन न देखना पड़ता,
मैं न बंधनों में सड़ती
छाती में शूल न गढ़ता।
बैठी यही बिसूर रही मां,
नीचों ने घर घाला,
मेरा देश जल रहा,
कोई नहीं बुझाने वाला।

भगतसिंह, अशफाक,
लालमोहन, गणेश बलिदानी,
सोच रहें होंगें, हम सबकी
व्यर्थ गई कुरबानी
जिस धरती को तन की
देकर खाद खून से सींचा ,
अंकुर लेते समय उसी पर
किसने जहर उलीचा।
हरी भरी खेती पर ओले गिरे,
पड़ गया पाला,
मेरा देश जल रहा,
कोई नहीं बुझाने वाला।

जब भूखा बंगाल,
तड़पमर गया ठोककर किस्मत,
बीच हाट में बिकी
तुम्हारी मां – बहनों की अस्मत।
जब कुत्तों की मौत मर गए
बिलख-बिलख नर-नारी ,
कहां कई थी भाग उस समय
मरदानगी तुम्हारी।
तब अन्यायी का गढ़ तुमने
क्यों न चूर कर डाला,
मेरा देश जल रहा,
कोई नहीं बुझाने वाला।

पुरखों का अभिमान तुम्हारा
और वीरता देखी,
राम-मुहम्मद की संतानों!
व्यर्थ न मारो शेखी।
सर्वनाश की लपटों में
सुख-शांति झोंकने वालों !
भोले बच्चें, अबलाओ के
छुरा भोंकने वालों !
ऐसी बर्बरता का
इतिहासों में नहीं हवाला,
मेरा देश जल रहा,
कोई नहीं बुझानेवाला।

घर-घर मां की कलख
पिता की आह, बहन का क्रंदन,
हाय, दूधमुँहे बच्चे भी
हो गए तुम्हारे दुश्मन?
इस दिन की खातिर ही थी
शमशीर तुम्हारी प्यासी ?
मुंह दिखलाने योग्य कहीं भी
रहे न भारतवासी।
हंसते हैं सब देख
गुलामों का यह ढंग निराला।
मेरा देश जल रहा,
कोई नहीं बुझाने वाला।

जाति-धर्म गृह-हीन
युगों का नंगा-भूखा-प्यासा,
आज सर्वहारा तू ही है
एक हमारी आशा।
ये छल छंद शोषकों के हैं
कुत्सित, ओछे, गंदे,
तेरा खून चूसने को ही
ये दंगों के फंदे।
तेरा एका गुमराहों को
राह दिखाने वाला ,
मेरा देश जल रहा,
कोई नहीं बुझाने वाला।

यह एक कविता ही काफी है कि लिखने की जरूरत क्यों है हमें? बड़े-बड़े मीडिया घराने हैं। ये मीडिया नहीं माफिया है? समानांतर सरकारें चलाते हैं? अधिकतर मीडिया घरानों पर पूंजीवादी ताकतों का कब्जा है। वे ही देश में सरकारें बनाते हैं और वे ही सरकारें गिराते हैं। भोली भाली जनता को जो दिखता और दिखाया जाता है वो हकीकत नहीं है। तो हकीकत क्या है? धैर्य रखिए। क्रांति के बीज की शुरुआत हो चुकी है। हम स्थितियों पर नजर रखे हुए हैं। हमें पता है कब क्या लिखना है? राहुल गांधी कहते हैं कि सारे मोदी सरनेम लगाने वाले चोर क्यों है? अंबानी-अदानी अरबपति क्यों हो रहे हैं? देश जवाब मांग रहा है। तो राहुल भाई राजीव गांधी पर भी बोफोर्स तोप घोटाले के आरोप लगे थे। उसका तो कभी आप जिक्र नहीं करते। महंगाई का रोना रोते हो…बहुत समय पहले एक नारा लगता था- खा गई शक्कर पी गई तेल, वाह रे इंदिरा तेरा खेल…बचपन में हमने यह नारा खूब सुना है। नरेंद्र मोदी की सरकार को तो जुमे जुमे दस साल होने जा रहे हैं। आधी शताब्दी से ज्यादा तो आपने शासन किया है। नरसिम्हा राव पर भी आरोप लगे थे। हर्षद मेहता कांड भूल गए। आपकी सरकारें कौनसी दूध की धुली हुई रही है। जहां तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सवाल है- अगर देश में अंबानी अदानी अपनी पूंजी बढ़ा रहे हैं तो जलन नहीं होनी चाहिए, मिर्ची नहीं लगनी चाहिए, हां हम राइजिंग भास्कर के माध्यम से वादा करते हैं कि अंबानी अदानी की संपत्ति फले-बढ़े, वे ही नहीं भारत के लोगों के पास अपार धन-दौलत हो, हम बुरा नहीं मानते…लेकिन जब तक शिवमंगल सिंह सुमन की कविता जैसे देश में हालात हो तो हम चुप नहीं बैठने वाले। अंबानी अदानी खूब कमाए हमें कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन यदि देश के लिए और देश की जनता के लिए उन्होंने कुछ नहीं किया तो उनकी दौलत को धूल में मिला देंगे। जनता जब भूख से मरेगी तो सेठों की तिजोरियां सबसे पहले लूटी जाएगी। अगर दुर्भाग्य से वह दिन आया तो देश में एक नई क्रांति होगी। फिर ना मोदी कुछ कर पाएंगे और ना ही राहुल।

मित्रों, यह भारत देश है। यहां धूमिल की निम्न कविता का उल्लेख करना जरूरी है। पहले धूमिल की यह कविता पढ़ें-

भीड़ बढ़ती रही
चौराहे चौड़े होते रहे
लोग अपने-अपने हिस्से का अनाज
खाकर-निरापद भाव से
बच्चे जनते रहे।
योजनायें चलती रहीं
बन्दूकों के कारखानों में
जूते बनते रहे।
और जब कभी मौसम उतार पर
होता था हमारा संशय
हमें कोंचता था।
हम उत्तेजित होकर
पूछते थे – यह क्या है?
ऐसा क्यों है?
फिर बहसें होतीं थीं
शब्दों के जंगल में
हम एक-दूसरे को काटते थे
भाषा की खाई को
ज़ुबान से कम जूतों से
ज़्यादा पाटते थे
कभी वह हारता रहा…
कभी हम जीतते रहे…
इसी तरह नोक-झोंक चलती रही
दिन बीतते रहे…
मगर एक दिन मैं स्तब्ध रह गया।
मेरा सारा धीरज
युद्ध की आग से पिघलती हुयी बर्फ में
बह गया।
मैंने देखा कि मैदानों में
नदियों की जगह
मरे हुये सांपों की केंचुलें बिछी हैं
पेड़-टूटे हुये रडार की तरह खड़े हैं
दूर-दूर तक
कोई मौसम नहीं है
लोग-
घरों के भीतर नंगे हो गये हैं
और बाहर मुर्दे पड़े हैं
विधवायें तमगा लूट रहीं हैं
सधवायें मंगल गा रहीं हैं
वन-महोत्सव से लौटी हुई कार्यप्रणालियां
अकाल का लंगर चला रही हैं
जगह-जगह तख्तियाँ लटक रहीं हैं-
‘यह श्मशान है,यहां की तस्वीर लेना
सख्त मना है।’
फिर भी उस उजाड़ में
कहीं-कहीं घास का हरा कोना
कितना डरावना है
मैंने अचरज से देखा कि दुनिया का
सबसे बड़ा बौद्ध- मठ
बारूद का सबसे बड़ा गोदाम है
अखबार के मटमैले हासिये पर
लेटे हुये, एक तटस्थ और कोढ़ी देवता का
शांतिवाद, नाम है
यह मेरा देश है…
यह मेरा देश है…
हिमालय से लेकर हिंद महासागर तक
फैला हुआ
जली हुई मिट्टी का ढेर है
जहां हर तीसरी जुबान का मतलब-
नफ़रत है।
साज़िश है।
अन्धेर है।
यह मेरा देश है
और यह मेरे देश की जनता है
जनता क्या है?
एक शब्द… सिर्फ एक शब्द है:
कुहरा,कीचड़ और कांच से
बना हुआ…
एक भेड़ है
जो दूसरों की ठण्ड के लिये
अपनी पीठ पर
ऊन की फसल ढो रही है।
एक पेड़ है
जो ढलान पर
हर आती-जाती हवा की जुबान में
हाँऽऽ.. हाँऽऽ करता है
क्योंकि अपनी हरियाली से
डरता है।
गांवों में गन्दे पनालों से लेकर
शहर के शिवालों तक फैली हुई
‘कथाकलि’ की अमूर्त मुद्रा है
यह जनता…
उसकी श्रद्धा अटूट है
उसको समझा दिया गया है कि यहां
ऐसा जनतंत्र है जिसमें
घोड़े और घास को
एक-जैसी छूट है
कैसी विडम्बना है
कैसा झूठ है
दरअसल, अपने यहां जनतन्त्र
एक ऐसा तमाशा है
जिसकी जान
मदारी की भाषा है।
हर तरफ धुआं है
हर तरफ कुहासा है
जो दांतों और दलदलों का दलाल है
वही देशभक्त है
अन्धकार में सुरक्षित होने का नाम है-
तटस्थता।
यहां
कायरता के चेहरे पर
सबसे ज्यादा रक्त है।
जिसके पास थाली है
हर भूखा आदमी
उसके लिये, सबसे भद्दी गाली है
हर तरफ कुआं है
हर तरफ खाई है
यहाँ, सिर्फ, वह आदमी, देश के करीब है
जो या तो मूर्ख है
या फिर गरीब है

तो मित्रों, शिवमंगल सिंह सुमन और धुमिल जैसे कवि जिस देश में हुए हैं। उस देश में लिखना खतरे से खाली नहीं है। लेकिन वे कवि मरकर अमर हो गए, मगर देश को जगाने के लिए लिखा। हम भी लिखेंगे। आपसे बातें तो बहुत करनी है। मगर फिलहाल इतना ही।

Rising Bhaskar
Author: Rising Bhaskar


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