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रामरथ से भारत रत्न तक : लालकृष्ण आडवाणी ने राजनीति में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को दी नई धार

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सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का झंडा बुलंद करने वाले आडवाणी को अब राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा के एक पखवाड़े के अंदर ये सम्मान मिला है और यह भी बहुत सहजता से कहा जा सकता है कि आज के दिन देश में आडवाणी के नाम का कोई विरोध करने वाला भी नहीं

जोधपुर से अरूण माथुर की विशेष रिपोर्ट

15 साल की उम्र में 1942 में आरएसएस के एक स्वयंसेवक के रूप में सार्वजनिक जीवन की शुरूआत करने वाले लालकृष्ण आडवाणी को अब जब देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से नवाजा गया है तो यह आभास होता है कि इसके लिए इससे बेहतर कोई समय नहीं हो सकता था। जब देश के अंदर कई विचारधाराएं बहुत प्रबल थीं तो श्रीराम के नाम से राजनीति में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का झंडा बुलंद करने वाले आडवाणी को अब राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा के एक पखवाड़े के अंदर ये सम्मान मिला है और यह भी बहुत सहजता से कहा जा सकता है कि आज के दिन देश में आडवाणी के नाम का कोई विरोध करने वाला भी नहीं।
भाजपा आज एक अजेय राजनीतिक ताकत के रूप में स्थापित है, लेकिन अस्सी के दशक में आडवाणी के प्रयास ने ही भाजपा को कांग्रेस से इतर एक वैकल्पिक राजनीति का आधार खड़ा करने में अहम भूमिका निभाई। अटल बिहारी वाजपेयी की लोकप्रियता के साथ ही लालकृष्ण आडवाणी के संगठनकर्ता के रूप में योगदान को भाजपा को 1984 से दो सीटों से लेकर 15 साल में सत्ता के शिखर तक पहुंचाने में अहम माना जाता है। दरअसल, अटल बिहारी भाजपा के सबसे बड़े चेहरे थे, लेकिन परदे के पीछे संगठन को खड़ा करने का काम आडवाणी ने ही किया।

1980 में आडवाणी ने ही वाजपेयी को सलाह दी थी कि जनता पार्टी परिवार से अलग होकर पार्टी का गठन करना चाहिए, क्योंकि तब के जनता पार्टी के नेता वाजपेयी के विकास को रोकने की कोशिश कर रहे थे। आडवाणी ने ही कमल फूल का चुनाव चिह्न चुना था। राजनीति में अटल-आडवाणी की जोड़ी बहुत सफल और अटूट मानी जाती थी। 2015 में वाजपेयी को भारत रत्न से सम्मानित किया गया था। प्रधानमंत्री मोदी के काल में ही आडवाणी को भी भारत रत्न देने का ऐलान हो गया।

पालमपुर के अधिवेशन में अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण को भाजपा के एजेंडे में शामिल कराने और फिर 1990 में रामरथ यात्रा के सहारे इसे जन-जन तक पहुंचाने में आडवाणी की केंद्रीय भूमिका रही थी। ध्यान देने की बात है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी उस समय रामरथ यात्रा के संयोजन में अहम भूमिका में रहे थे। 34 सालों बाद भव्य राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा के 11 दिन बाद खुद प्रधानमंत्री मोदी ने आडवाणी को भारत रत्न से सम्मानित करने की सूचना दी। वैसे रामरथ से भारत रत्न तक की आडवाणी की यात्रा भी उतार चढ़ावों से भरी रही।

आडवाणी की राजनीति की शुरूआत 1957 से अटल बिहारी वाजपेयी और दीनदयाल उपाध्याय के सहयोगी के रूप में हुई। इसके साथ ही उन्होंने आर्गेनाइजर में काम करते हुए पत्रकारिता में भी हाथ आजमाया, लेकिन बाद में पूरा जीवन राजनीति को समर्पित कर दिया। 1970 में पहली बार राज्यसभा से संसद में प्रवेश करने वाले लालकृष्ण आडवाणी 2019 तक कुल 10 बार संसद सदस्य के रूप में रहे। 1984 में दो सीटों पर सिमटने के बाद भी आडवाणी ने हार नहीं मानी और पांच साल बाद पार्टी को 85 सीटों पर पहुंचा दिया। इसके बाद भाजपा ने पीछे मुड़कर नहीं देखा और अमित शाह के अध्यक्ष रहते हुए दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी बन गई।
कट्टर हिंदुत्व वाली छवि के बावजूद आडवाणी जिन्ना को धर्मनिरपेक्ष बताने को लेकर विवादों में भी रहे। लाहौर की यात्रा के दौरान मोहम्मद अली जिन्ना को धर्मनिरपेक्ष बताने पर भाजपा के कार्यकर्ताओं में ही नाराजगी देखने को मिली और आडवाणी को अध्यक्ष पद से हाथ धोना पड़ा। इसके बावजूद लालकृष्ण आडवाणी की अहमियत भाजपा में कम नहीं हुई और 2009 में उनके चेहरे पर ही पार्टी लोकसभा का चुनाव लड़ी। यह और बात है कि भाजपा तब अपेक्षित सफलता नहीं पास सकी थी।

1980 में भाजपा के गठन के बाद से ही आडवाणी वह शख्स हैं, जो सबसे ज्यादा समय तक पार्टी में अध्यक्ष पद पर बने रहे हैं। बतौर सांसद तीन दशक की लंबी पारी खेलने के बाद आडवाणी पहले गृह मंत्री रहे, बाद में अटल सरकार में (1999-2004) उप प्रधानमंत्री बने। आडवाणी को बेहद बुद्धिजीवी, काबिल और मजबूत नेता माना जाता है जिनके भीतर मजबूत और संपन्न भारत का विचार जड़ तक समाहित है। जैसा कि वाजपेयी कहते थे- आडवाणी ने कभी राष्ट्रवाद के मूलभूत विचार को नहीं त्यागा और इसे ध्यान में रखते हुए राजनीतिक जीवन में वह आगे बढ़े हैं और जहां जरूरत महसूस हुई है, वहां उन्होंने लचीलापन भी दिखाया है।

आडवानी के सफर पर एक नजर

आडवानी का जन्म आठ नवंबर 1927 सिन्ध प्रांत (पाकिस्तान) में हुआ। पिता का नाम किशन चंद आडवाणी एवं माता का नाम ज्ञानी देवी था। 1936-1942- कराची के सेंट पैट्रिक्स स्कूल में 10वीं तक पढ़ाई, क्लास में टापर रहे।1942 में राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ में शामिल हुए।1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान गिडूमल नेशनल कालेज में दाखिला लिया।1944 में कराची के माडल हाई स्कूल में बतौर शिक्षक नौकरी की।1947 में आडवाणी देश के आजाद होने का जश्न भी नहीं मना सके कि विभाजन के चलते उन्हें सिंध में अपना घर छोड़कर दिल्ली आना पड़ा। उन्होंने इस घटना को खुद पर हावी नहीं होने दिया और मन में इस देश को एकसूत्र में बांधने का संकल्प ले लिया।

1947-1951 तक राजस्थान के जोधपुर, अलवर, भरतपुर, कोटा, बुंदी और झालावाड़ में आरएसएस को संगठित किया।1957 में अटल बिहारी वाजपेयी की सहायता के लिए दिल्ली शिफ्ट हुए।1958-63 तक दिल्ली प्रदेश जनसंघ में सचिव रहे।1965 में कमला आडवाणी से विवाह हुआ, प्रतिभा एवं जयंत दो संतानें हैं।अप्रैल 1970 में पहली बार राज्यसभा में प्रवेश किया।दिसंबर 1972- भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष नियुक्त किए गए।26 जून, 1975- बेंगलुरु में आपातकाल के दौरान गिरफ्तार, भारतीय जनसंघ के अन्य सदस्यों के साथ जेल में कैद रहे।मार्च 1977 से जुलाई 1979 तक देश के सूचना एवं प्रसारण मंत्री रहे।मई 1986 में भाजपा अध्यक्ष बने।तीन मार्च 1988 को दोबारा पार्टी अध्यक्ष बने।1990 में सोमनाथ से अयोध्या तक राम मंदिर रथ यात्रा शुरू की।

अक्टूबर 1999 से मई 2004 तक केंद्रीय गृह मंत्री रहे।जून 2002 से मई 2004 तक देश के उप प्रधानमंत्री रहे।
कट्टर हिंदुत्व का चेहरा रहे आडवाणी: आडवाणी राम जन्मभूमि आंदोलन में भाजपा का चेहरा बने। 80 के दशक में विश्व हिंदू परिषद ने ‘राम मंदिर’ निर्माण आंदोलन शुरू किया। 1991 का चुनाव देश की सियासत का टर्निंग पॉइंट रहा। भाजपा मंडल कमीशन की काट के रूप में मंदिर मुद्दा लेकर आई और रामरथ पर सवार होकर देश की मुख्य विपक्षी पार्टी के रूप में उभरी।
आडवाणी ने 1990 में सोमनाथ से अयोध्या तक ‘रथ यात्रा’ की। उनके सियासी जीवन में राम रथ यात्रा, जनादेश यात्रा, स्वर्ण जयंती रथ यात्रा, भारत उदय यात्रा, भारत सुरक्षा यात्रा, जनचेतना यात्रा शामिल हैं। जनसंघ को भाजपा बनाने की यात्रा में सर्वाधिक योगदान लालकृष्ण आडवाणी का रहा। भाजपा की मौजूदा पीढ़ी के 90 फीसदी से ज्यादा नेता आडवाणी ने ही तैयार किए हैं। आडवाणी ने 1995 में अटल बिहारी वाजपेयी को पीएम पद का दावेदार बताकर सबको हैरत में डाल दिया। आडवाणी हमेशा वाजपेयी के नंबर दो बने रहे।

आडवाणी का 50 साल से ज्यादा का सियासी जीवन बेदाग रहा। 1996 में आडवाणी सहित विपक्ष के बड़े नेताओं का हवाला कांड में नाम आया। तब आडवाणी ने इस्तीफा देकर कहा कि वे इसमें बेदाग निकलने के बाद ही चुनाव लड़ेंगे। 1996 वे बेदाग साबित हुए।
10 साल तक पार्टी के रहें अध्यक्ष: आडवाणी 1980 में भारतीय जनता पार्टी की स्थापना के बाद से 1986 तक पार्टी के महासचिव रहे। इसके बाद 1986 से 1991 तक पार्टी के अध्यक्ष पद का उत्तरदायित्व भी उन्होंने सम्भाला। इस तरह 10 साल पार्टी के अध्यक्ष पद रहते हुए उन्होंने पार्टी के हर उत्तरदायित्व को बाखूबी निभाया. और उनके इसी अथक प्रयास का ही परिणाम है कि देश में जनता पार्टी का परचम अधिकांश राज्यों में फहरा रहा है। आडवाणी भारतीय जनता पार्टी के संस्थापक सदस्य भी हैं। इसी के साथ उनका राजस्थान से भी बेहद गहरा नाता रहा है और उन्होंने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत मरूधरा की भूमि से की थी।

बंटवारा के बाद ली राजस्थान की डगर

लालकृष्ण आडवाणी जब केवल 14 साल थे, तब साल 1941 में वह आरएसएस के प्रचारक बन गए थे। देश का बंटवारा होने से पहले वो साल 1947 तक कराची ( जोअब पाकिस्तान में) संघ की शाखाएं लगाते थे। बंटवारा होने के बाद वो प्रचारक बनकर राजस्थान आए। यहां जोधपुर, अलवर, भरतपुर, कोटा, बूंदी और झालावाड़ जिलों में उन्होंने साल 1952 तक संघ के लिए निरंतर काम किया।
1948 में जब आरएसएस पर रोक लगी तो उसके बाद एक राजननीतिक संगठन की स्थापना की गई जिसका नाम जनसंघ रखा गया। जिसे स्थापित करने के लिए साल 1952 में जनसंध के संस्थापक डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने आडवाणी को राजस्थान भेजा गया था. जिसके बाद से लगातार 10 सालों तक राजस्थान में जनसंघ की जड़ों को गहरा करने लाल कृष्ण आडवाणी की महत्वपूर्ण भूमिका रही, जो आज तक राजनीति में मिसाल पेश करती है।

राजस्थान में जनसंघ को मजबूत करने के लिए आडवाणी ने साल 1952 में जयपुर में प्रसिद्ध हवा महल के करीब पुरानी राजस्थान विधानसभा के सामने धाभाई जी की हवेली में जनसंघ का कार्यालय बनाया। जहां से वहजनसंघ की गतिविधियों को चलाते थे। कुछ समय तक वहां पर काम करते फिर वह गुलाबी नगरी के पुराने शहर में चैड़ा रास्ता में नानाजी की हवेली में जनसंघ के कार्यालय को ले गए। यही हवेली बाद में आगे चलकर संघ का मुख्यालय भी रही। नानाजी स्वयं जागीरदार थे और संघ से उनका गहरा जुड़ाव रखते थे। इसी कारण जनसंघ के नेताओं का नानाजी की हवेली में आना-जाना था। तो जनसंघ से जुड़े होने कारण आडवाणी नानाजी की हवेली में करीब 10 साल तक रहे और जनसंघ के कार्य को आगे बढ़ाकर राजस्थान में पहचान दिलाई।

भैरोंसिह शेखावत से लेकर भानु कुमार शास्त्री पर दिखाया भरोसा

भारत के 11 वें उपराष्ट्रपति रहे भैरोंसिह शेखावत को राजस्थान विधानसभा के साल 1952 में हुए पहले चुनाव में आडवाणी ने ही चुनाव का टिकट दिया था। इस चुनाव में भैरोंसिंह शेखावत समेत 8 विधायकों ने आडवाणी के भरोसे को कायम रखा और राजस्थान विधानसभा चुनकर पहुंचे। यही पहले 9 विधायक थे जनसंघ के जो विधानसभा पहुंचे। इसीलिए यह कहना गलत नहीं है कि आडवाणी की दूरदृष्टि के कारण ही भैरोंसिंह शेखावत राजनीति में आ पाए थे। वहीं बाद में राजस्थान के मुख्यमंत्री और देश के उप राष्ट्रपति भी रहे। फिर जब साल 1952 में लोकसभा का चुनाव हुआ तो आडवाणी ने भानु कुमार शास्त्री को टिकट दिया था, शास्त्री बाद में राजस्थान में विधायक और यहां से सांसद भी रहे। आडवाणी के रहते ही जनसंघ ने राजस्थान में जागीर प्रथा को समाप्त करने वाले राजस्थान भूमि सुधार एवं जागीर पुनर्भरण अधिनियम 1952 का समर्थन किया था, जिसके बाद भैरोंसिंह शेखावत और जगत सिंह झाला को छोड़कर शेष 6 जनसंघ विधायकों ने विरोध में पार्टी छोड़ दी थी। तब यूं लगा था कि राजस्थान में जनसंघ समाप्त हो जाएगा, लेकिन आडवाणी और भैरों सिंह शेखावत की राजनीतिक कुशलता ने पार्टी को गिरने नहीं दिया।
लालकृष्ण आडवाणी को खिचड़ी खाना बहुत पसंद था। वो जयपुर में नानाजी की हवेली पर कोयले की सिगड़ी रखते थे, जिस पर अक्सर खिचड़ी बनाकर खाया करते थे। आडवाणी को चाय पीने का भी शौक था। संघ कार्यालय के पास एक सिंधी की चाय नाम की दुकान थी, जहां वो अक्सर चाय पिया करते थे।

आडवानी भारत के 50वें रत्न

भारतीय जनता पार्टी के दिग्गज नेता लाल कृष्ण आडवाणी को मोदी सरकार भारत रत्न से सम्मानित करेगी। पीएम मोदी ने ट्वीट कर उन्हें भारत रत्न देने से जुड़ी जानकारी दी। भारत में हिंदुत्व पॉलिटिक्स के वह बड़े चेहरों में से एक रहे हैं। राम मंदिर आंदोलन को लेकर आज तक उन्हें याद किया जाता है। लेकिन अगर भारत पाकिस्तान का बंटवारा शांति से हो जाता तो शायद आडवाणी कराची में रह रहे होते। जी हां, एक बम धमाके के कारण वह भारत आ गए।
लाल कृष्ण आडवाणी। अब भारत के 50वें रत्न हो गए हैं। उम्र 96 साल। पाकिस्तान के कराची में जन्म लेकिन 1947 बंटवारे में सरहद से सटे राजस्थान की राजधानी जयपुर आ गए। 21 साल की उम्र में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कार्यालय गोपाल जी का रास्ता से राजनीति का ककहरा सीखा और फिर कुछ दिन अलवर में नई अलख जगाई।
सेंट पैट्रिक में पढ़ाई के कारण अंग्रेजी दुरूस्त थी तो संघ ने दिल्ली में राजनीति कर रहे अटल बिहारी वाजपेयी की सहायता के लिए भेज दिया गया। यहीं से आडवाणी की राजनीतिक अंगड़ाई ने ऐसा स्वरूप धारण जिसने कांग्रेस के एकाधिकार को खत्म करने का काम किया। 90 के दशक में हिंदुत्व और राष्ट्रवाद को ऐसी हवा दी कि राजनीति की हवा बदल गई।
भारत की राजनीति में अटल-आडवाणी जोड़ी ने वो इतिहास लिखा जिससे भारतीय जनता पार्टी का परचम अब पूरे देश में लहरा रहा है। भाजपा की इमारत जिन ईंटों पर बुलंद है उसकी नींव में एक पत्थर आडवाणी के भी नाम है। भारत जिस समय अपनी आजादी का अमृत काल मना रहा है ठीक उतना ही समय लालकृष्ण आडवाणी को राजनीतिक जीवन में हो चुका है। पूर्व उप प्रधानमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी को तेवर की तासीर का नेता माना जाता रहा जो अपने कार्यकर्ताओं से कहता था कि मारक क्षमता जरूरी है 90 के दशक में सोमनाथ से अयोध्या की पहली रथयात्रा कि और फिर इसके बाद भाजपा ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। भाजपा संपूर्ण प्रभुत्व के साथ मजबूती से खड़ी है।

पं. श्रीराम दवे का जीवन परिचय
पं० श्रीराम दवे का जन्म दिनांक 22.09.1922 आश्विन कृष्ण प्रतिपदा गुरुवार संवत् 1979 को राजस्थान प्रदेश के बाड़मेर जिला स्थित समदड़ी गाँव में श्रीमाली ब्राह्मण समाज के एक सामान्य परिवार में हुआ। आपके पिता पं० श्री शंकर लाल बहुत ही सरल एवं साधारण व्यक्ति थे। आपकी माता श्रीमती मथुरा देवी बहुत ही मेधावी एवं सात्त्विक वृत्ति की थीं।
पं० दवे कराची में संस्कृत के शिक्षक रहे थे। देश विभाजन के बाद जोधपुर आ गए थे। जहाँ स्टेट बैंक ऑफ बीकानेर एण्ड जयपुर-जोधपुर शाखा से वर्ष 1980 में सेवानिवृत्त होने के बाद लेखन कार्य को प्राथमिकता दी। नौकरी की मनोवृत्ति के कारण समाज एवं शिक्षा में आये परिवर्तन अर्थात् लार्ड मैकाले की शिक्षा पद्धति के बुरे परिणाम को लेकर एवं अपने बैंक सेवा काल में प्राप्त अनुभवों के आधार पर आपने ‘‘भृत्याभरणम्‘‘ नामक महाकाव्य लिखा।
पं० श्रीराम दवे आधुनिक संस्कृत के श्रेष्ठ कवि माने जाते हैं। प्रस्तुत ग्रन्थ में स्वतंत्र भारत की साम्प्रतिक स्थिति को पौराणिक कथानक के माध्यम से चित्रित किया गया है। 37 सर्गात्मक इस काव्य में नायिका प्रधान भृत्या को उद्देश्य बनाकर जो कुछ भी वर्णित किया गया है वह सब तथ्यात्मक रूप से विवेचित है। पूर्णतः व्यंग्य प्रधान व्यंजनामूलक रचना में सुश्री भृत्या कुमारी नायिका के रूप में विलसित है जो भगवान विश्वेश्वर विष्णु की मायारूपिणी विचित्रवीर्या शक्ति है।
‘‘भृत्याभरणम्‘‘ युग प्रवृत्ति बोधक महाकाव्य है। नायिका प्रधान इस काव्य में भृत्या अर्थात् नौकरी प्राप्त करना ही मानव मात्र का लक्ष्य बन गया है। यह भृत्या कुमारी अवस्था में(कौमार्य भंग किये बिना) ही अपने उत्कोच नामक रिश्वत पुत्र को जन्म देती है। उत्कोच से मानव अपने जीवन में क्या क्या हासिल कर सकता है का अनेक रूपकों, उपमानों, अन्योक्तियों और मानवीकरण के साथ सुगमतापूर्वक वर्णन करना कवि का ध्येय रहा है। इस कृति पर लेखक को 1992 में राजस्थान संस्कृत अकादमी से ‘‘माघ‘‘ पुरस्कार मिल चुका है। महाकाव्य के प्रथम सर्ग में नारद का भारत की वर्तमान स्तिथि को देखकर भ्रमण करने से लेकर अन्तिम सर्ग में उत्कोच वध भरतवाक्य पर्यन्त वर्णन सहृदयजनों को हठात् आकर्षित करता है। कवि की कल्पना बहुत ही विशद है। रिश्वत के प्रभाव से बलहीन व्यक्ति भी बलशाली बन जाता है। उसके आधिपत्य को कुचलने में यदि भीम और प्रशासनिक व्यवस्था में राष्ट्रपति भी आ जाए तो वह मौका पाकर संकट में भी भाग जाता है।

आडवानी और पं. दवे के बीच रहा दोस्ताना संबंध
अयोध्या में रामजन्म भूमि पर मंदिर निर्माण आंदोलन और भारतीय जनता पार्टी को राजनीति के शिखर की ओर ले जाने वाले रामरथ के साथ ही लाल कृष्ण आडवानी को भारत रत्न दिये जाने की घोषणा के बाद पं. श्रीराम दवे के परिवार में भी खुशी की लहर है। जोधपुर निवासी पं. श्रीराम दवे और लाल कृष्ण आडवानी के बीच दोस्ताना संबंध रहे है। भारत-पाक विभाजन के बाद पड़ोसी मुल्क छोड़ कर वे 1947 में जोधपुर आये थे। और इसी शहर में जनसंघ का दीपक जलाया और भाजपा के उदय के बाद कमल भी खिलाया।
आडवानी को भारत रत्न देने की घोषणा से पं. श्रीराम दवे के परिजनों में काफी खुशी नजर आई। आडवानी जब भी जोधपुर आये पं. दवे के घर जरूर गये। यहीं वजह है कि आडवानी इनके दिल में बसते है। आडवानी का पं. श्रीराम दवे से आत्मीय रिश्ता रहा है। दवे और आडवानी के रिश्तों की कहानी को शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता।
पं. श्रीराम दवे की पुत्री जया दवे ने आडवानी के भारत रत्न की घोषणा पर कहा कि आडवानी ने निस्वार्थ भाव से देश की सेवा की। अपने मित्र के परिवार सदस्यों से आडवानी का काफी लगाव रहा। पं. श्रीराम दवे से उनका काफी गहरा दोस्ताना रहा। भारत रत्न जैसा पुरूस्कार मिलने से पूरा परिवार अपने को गौरवांवित महसूस कर रहा है। जया दवे के अनुसार श्रीराम मन्दिर आंदोलन में भाग लेने के लिए भाई अशोक दवे ने भी कारसेवक के रूप में भाग लिया था। तब आडवानी कारसेवकों के अगुवां, मार्गदर्शक रहे।
भारत रत्न मिलने से हृदय अत्यंत प्रसन्न है। उनका पूरा जीवन राष्ट्र तथा समाज के उत्थान के लिए समर्पित रहा है। अपने राजनीति कौशल से उन्होनें भारत के भविष्य की नींव रखी। बता दे कि भारत-पाक विभाजन के बाद कराची छोड़ कर आडवानी जोधपुर आ गए थे। आडवानी 29 दिन तक जोधपुर में रहे। करीब 70 साल की राजनीतिक यात्रा में आडवानी का जोधपुर से खास जुड़ाव रहा। आडवानी आखिरी बार सितंबर 2005 में जोधपुर आये थे। अवसर था महाकवि पं. श्रीराम दवे के संस्कृत काव्य, ब्रह्मरसायन के विमोचन का।
गौरतलब है कि भारत रत्न लाल कृष्ण आडवानी पं. श्रीराम दवे के अनन्य मित्र रहे। आडवानी और पं. दवे राष्ट्र विभाजन के पूर्व कराची में रहते थे। वहीं आडवानी और पं. दवे राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ की शाखा में जाते थे। आप दोनों संघ के दायित्वान कार्यकर्ता रहे। इसके बाद वे राजस्थान आ गए। आडवानी जोधपुर आने के कुछ समय बाद भरतपुर चले गए। पं. श्रीराम दवे यहीं बैंक अधिकारी के रूप में कार्यरत रहे।
पं. दवे की पुत्री जया दवे के अनुसार आडवानी एवं पं. दवे सात वर्षो तक एक ही विद्यालय में अध्यापन का कार्य करते थे। आडवानी अंग्रेजी विषय एवं पं. दवे संस्कृत विषय पढ़ाते थे। आडवानी के राष्ट्रीय राजनीति के शिखर पर पहुंचने के बाद भी हमारा पारिवारीक संबंध अगाध है। पं. जी की दोहिती साध्वी प्रीति प्रियवंदा आज भी आडवानी को नानाजी मानती है। यदा कदा दूरभाष पर आडवानी से वार्तालाप होता रहता है।

Rising Bhaskar
Author: Rising Bhaskar


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