Explore

Search

Friday, January 23, 2026, 7:30 am

Friday, January 23, 2026, 7:30 am

LATEST NEWS
Lifestyle

कश्मीर में आतंकवाद पर कमलेश्वर से 2004 में दिल्ली में लिया अप्रकाशित इंटरव्यू; ‘कश्मीर रात के बाद’ की अगले प्रोजेक्ट ‘कश्मीर को मुक्त करो’ पर सवाल जवाब

कैसे-कैसे मंजर सामने आ रहे हैं, गाते-गाते लोग चिल्ला रहे हैं…फिर हंसता-गाता-खेलता कश्मीर लहूलुहान

डीके पुरोहित. जोधपुर

जम्मू-कश्मीर के अनंतनाग जिले में पहलगाम से 6 किमी दूर स्थित पर्यटन स्थल बैसरन घाटी में मंगलवार दाेपहर 2:45 बजे आतंकियों ने बड़ा हमला किया। सेना की वर्दी पहने 5 आतंकियों ने बड़ा हमला किया और 40 पर्यटकों के समूह पर अंधाधुंध गोलियां बरसाई। इनमें 26 पर्यटकों की मौत हो गई, जबकि कई घायल है। 25 साल पहले 1 अगस्त 2000 को अमरनाथ के बेस कैंप पर हमले में 30 से ज्यादा नागरिक मारे गए थे। मार्च 2000 में ही आतंकियों ने दक्षिण कश्मीर के छत्तीसिंहपुरा में 35 सिखों की हत्या कर दी थी। 14 फरवरी 2019 को पुलवामा हमला हुआ था, जिसमें 40 जवान शहीद हो गए थे। बात जब कश्मीर में आतंकवाद की हो रही है तो मुझे बरबस कमलेश्वर याद आ रहे हैं। कमलेश्वर की एक पापुलर बुक है- ‘कश्मीर रात के बाद’...इस पुस्तक में कमलेश्वर ने आतंकवादियों को बैनकाब किया था। वे छद्म रूप से कई आतंकवादी संगठनों के आतंकवादियों से मिले और उनके एक्सक्लूसिव इंटरव्यू किए और उनकी खोजपरक पत्रकारिता पर आधारित यह पुस्तक कश्मीर में आतंकवाद पर जीवंत दस्तावेज है। कमलेश्वर इस पुस्तक में लिखते हैं कि कट्‌टर मुस्लिम आतंकी इतने क्रूर होते है कि गलती से भारतीय मीडिया के पत्रकार उनके हाथ लग जाए तो उन्हें तड़पा तड़पा कर मार सकते थे। ऐसे हालात में कमलेश्वर ने विदेशी मीडिया का चेहरा बनकर और छद्म रूप से ऐसे कई आतंकवादियों के इंटरव्यू किए। तब जाकर एक जीवंत दस्तावेज सामने आया- ‘कश्मीर रात के बाद’ के रूप में। एक बार आउटलुक में इस लेखक ने कमलेश्वर की कोई कहानी आधी पढ़ी और लेखक को नींद आ गई। तब इस लेखक ने कमलेश्वर को पत्र लिखा कि मैं आपकी कहानी आउटलुक में पढ़ रहा था और आधी पढ़ी थी कि नींद आ गई। तब कमलेश्वर ने पत्र का लंबा चौड़ा जवाब दिया और मुझसे सवाल किया कि क्या कहानी अपनी सार्थकता खो रही है? आपने मेरी कहानी आधी ही क्यों पढ़ी? क्या कहानी में कोई कमी थी? तब मैंने उनको पत्र का जवाब दिया और लिखा कि आज के लेखक कहानी की भ्रूण हत्या कर रहे हैं, पर आपकी कहानी में कोई कमी नहीं थी, दरअसल अखबार की नौकरी में रात 2 बजे घर लौटने के बाद कोई कैसे पूरी कहानी पढ़ सकता है? वो भी एक सीटिंग में…तब कमलेश्वर का पोस्टकार्ड आया- चलो जान बची…। इस तरह कमलेश्वर और इस लेखक के बीच पत्रों का सिलसिला चलता रहा। इसी बीच एक बार दिल्ली में कमलेश्वर से मिलने का मौका मिला। तब इस लेखक ने कमलेश्वर का अनौपचारिक इंटरव्यू लिया था, यह इंटरव्यू आउटलुक में भेजा था, पर प्रकाशित नहीं हुआ। आज जबकि कश्मीर में आतंकवाद फिर चरम पर है और स्वर्ग लहूलुहान है। कमलेश्वर दरअसल कश्मीर रात के बाद की अगली कड़ी में ‘कश्मीर को मुक्त करो’ पुस्तक लिखने की तैयारी कर रहे थे। कमलेश्वर का जन्म 6 जनवरी 1932 को उत्तरप्रदेश के मैनपुरी जिले में हुआ था। उन्होंने 1954 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य में एमए किया। उन्होंने फिल्मों के लिए पटकथाएं तो लिखीं ही, उनके उपन्यासों पर फिल्में भी बनीं। आंधी, मौसम (फिल्म), सारा आकाश, रजनीगंधा, मिस्टर नटवरलाल, सौतन, लैला, रामबलराम की पटकथाएं कमलेश्वर ने ही लिखी थी। लोकप्रिय टीवी सीरियल चंद्रकांता के अलावा दर्पण और एक कहानी जैसे धारावाहिकों की पटकथा लिखने वाले भी कमलेश्वर ही थे। उन्होंने कई वृत्तचित्रों और कार्यक्रमों का निर्देशन भी किया। हिंदी लेखक कमलेश्वर बीसवीं शदी के सबसे सशक्त लेखकों में से एक समझे जाते हैं। कहानी, उपन्यास, पत्रकारिता, स्तंभ लेखन, फिल्म पटकथा जैसी अनेक विधाओं में उन्होंने अपनी लेखन प्रतिभा का परिचय दिया। कमलेश्वर का लेखन केवल गंभीर साहित्य से ही जुड़ा नहीं रहा बल्कि उनके लेखन के कई तरह के रंग देखने को मिलते हैं। 1995 में कमलेश्वर को पद्मभूषण से नवाजा गया और 2003 में उन्हें कितने पाकिस्तान उपन्यास के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। वे सारिका, धर्मयुग, जागरण और दैनिक भास्कर जैसे प्रसिद्ध पत्र-पत्रिकाओं के संपादक भी रहे। उन्होंने दूरदर्शन के अतिरिक्त महानिदेशक जैसे महत्वपूर्ण दायित्व भी निभाए। कमलेश्वर ने अपने 75 सालके जीवन में 12 उपन्यास, 17 कहानी संग्रह और करीब 100 फिल्मों की पटकथाएं लिखीं। दिल्ली में लिए उनसे इंटरव्यू के पेश है खास अंश-

राइजिंग भास्कर : आपको पत्रकार कहलाना ज्यादा पसंद है या साहित्यकार या फिल्मी पटकथा का चेहरा आपकी पहचान है?

कमलेश्वर (हंसते हुए) : मैंने एमए हिंदी में किया। मैं साहित्य का विद्यार्थी रहा। इसलिए बैसिकली साहित्यकार हूं। फिल्मों और दूरदर्शन की ओर से ऑफर आए कि हमारे लिए भी लिखो तो पटकथा लेखन में आगे बढ़ा। उन दिनों साहित्यकार और पत्रकारिता अलग नहीं मानी जाती थी। आज तो यह बहस चल पड़ी है कि एक अच्छा साहित्यकार अच्छा पत्रकार नहीं हो सकता। और एक अच्छा पत्रकार अच्छा साहित्यकार नहीं हो सकता। जबकि मेरी नजर में साहित्यकार और पत्रकार दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। इन्हें अलग करना छाछ से मक्खन अलग करने जैसा है। छाछ से मक्खन अलग भलेही कर लें लेकिन छाछ में मक्खन ऑलरेडी छुपा होता है। एक साहित्यकार भी छाछ की तरह होता है और उसमें पत्रकार मक्खन की तरह छुपा होता है।

राइजिंग भास्कर : आप दूरदर्शन से भी जुड़े रहे। कश्मीर रात के बाद में आपने विदेशी मीडिया का चेहरा बनकर आतंकवादियों के इंटरव्यू क्यों लिए?

कमलेश्वर : कुछ आतंकवादी संगठन हद से ज्यादा क्रूर होते हैं। उनके चंगुल में एक बार कोई फंस जाए तो वे तड़पा-तड़पा कर उनकी हत्या कर सकते हैं। खासकर ऐसे कट्‌टर आतंकवादी संगठनों से जुड़े लोग भारतीय मीडिया को पसंद नहीं करते जबकि विदेशी मीडिया को आगे बढ़कर इंटरव्यू देते हैं। यही कारण है कि छद्म वेश धरकर हम लोगों ने इंटरव्यू लिए।

राइजिंग भास्कर : क्या कश्मीर रात के बाद आतंकवाद पर जीवंत दस्तावेज कहा जा सकता है?

कमलेश्वर : बिलकुल। निसंदेह। हमने काफी मेहनत की। आतंकवादियों से एक्सकल्यूसिव इंटरव्यू किए। लश्कर-ए-तैयबा जैसे संगठन पर कार्रवाई को सरकार भी उद्यत हुई। हमने भारत सरकार को आतंकवादियों के बारे में चेताया भी। मैं आपको बताना चाहूंगा कि कश्मीर रात के बाद में हमने जिन आतंकवादियों के या संगठनों के बारे में लिखा है उनमें कुछ अब अन्य संगठनों में घुस गए हैं और हमारी ‘अगली बुक कश्मीर को मुक्त करो’ में इसका खुलासा करेंगे।

राइजिंग भास्कर : आतंकवादी संगठनों को इतनी खतरनाक ट्रेनिंग कौन देता है और फंडिंग कहां से होती है?

कमलेश्वर : कट्टरपंथी देश इन आतंकवादियों को ट्रेनिंग देते हैं तो विदेशी फंडिंग भी होती है। विदेशी फंडिंग भी दो तरह से होती है- एक तो इन्हें पैसा मिलता है और दूसरा हथियार। साथ ही कट्टरपंथी देश कैंपों में विशेष ट्रेनिंग देकर इन्हें मानवता के दुश्मन के रूप में प्रशिक्षित करते हैं। कश्मीर में जो आतंकवाद फल-फूल रहा है उसका उद्देश्य कश्मीर को कमजोर करना है। आज इन आतंकवादी संगठनों के पास जितने आधुनिक हथियार है उतने तो भारत की सुरक्षा एजेंसियों और पुलिस के पास भी नहीं होते। यही कारण है कि आतंकवादी संगठनों के हौसले बुलंद है।

राइजिंग भास्कर : कश्मीर में आतंकवाद कैसे खत्म हो सकता है?

कमलेश्वर : यह सवाल आपने जितनी सरलता से पूछा है, उसका उत्तर इतना सरल नहीं है। क्योंकि आतंकवाद वैश्विक समस्या है। यह कब किस रूप में सामने आए कहा नहीं जा सकता। इसमें हिंदू भी मारे जा सकते हैं तो सिख भी मारे जा सकते हैं। ईसाई भी मारे जा सकते। आम आदमी भी मर सकते हैं और सेना के जवान भी शहीद हो सकते हैं। सुरक्षा एजेंसियों के अधिकारी और कार्मिक भी शिकार हो सकते हैं। भारत में अलग-अलग तरह के आतंकवाद पनप रहे हैं। बात कश्मीर की ही करें तो विदेशी ताकतों की कश्मीर पर नजर है। विदेशी ताकतें कश्मीर में अस्थिरता फैलाकर अपना स्वार्थ पूरा करने की साजिशें रचती रहती है। इसलिए आतंकवाद खत्म करने के लिए सबसे पहले उसके कारणों को दूर करना होगा। यह इच्छाशक्ति के बगैर नहीं हो सकता। भारत में तो आतंकवाद ऐसा रोग बन चुका है जो टेबलेट लेने, इंजेक्शन लगाने या ऑपरेशन से ठीक हो जाता है। पर फिर संक्रमण हो जाता है। हम भारत में आतंकवाद को इसी नजरीए से देख सकते हैं। देश के अलग-अलग भागों में हिंसा इसी का परिणाम है। ऐसा कोई फार्मूला या इलाज नजर नहीं आ रहा कि उसे अपनाने से आतंकवाद जड़ से खत्म हो जाए। पंजाब में हमें कुछ हद तक सफलता जरूर मिली। पर कश्मीर का मुद्दा इंटरनेशनल है और यहां स्वर्ग पर विदेशी ताकतों की नजरें है। ऐसे में यहां शांति बहाल करना चुनौती है।

राइजिंग भास्कर : ‘कश्मीर को मुक्त करो’ कब तक सामने आएगी?

कमलेश्वर : कह नहीं सकते। अभी दो-तीन और प्रोजेक्ट चल रहे हैं। पहले उन प्रोजेक्ट पर काम चल रहा है। उसके बाद पुरानी कड़ियों को जोड़ते हुए नए संदर्भ में लिखना पड़ेगा। भविष्य में आतंकवाद का चेहरा जो मैं देख रहा हूं उसे देखते हुए आगामी प्रोजेक्ट कुछ हटकर होगा। हां इतना बताना चाहूंगा कि कुछ नए आतंकवादी संगठन पनप रहे हैं, जिनकी कड़ियां कश्मीर रात के बाद में छूट गई थी, वो अगली बुक में सामने आएगी।…चलो चाय पीते हैं। हम चाय पीने लगते हैं।

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor