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Sunday, April 6, 2025, 11:18 am

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जिस दिन पाप अपने चरम पर होंगे तब पृथ्वी समूची मानव जाति को निगल लेगी, पृथ्वी में इतनी क्षमता है कि वह समूचे कालखंड को अपने भीतर जमींदोज कर दे : पंकजप्रभु 

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(प्रख्यात जैन संत परमपूज्य पंकजप्रभु महाराज का चातुर्मास 17 जुलाई से एक अज्ञात स्थान पर अपने आश्रम में शुरू हुआ। पंकजप्रभु अपने चातुर्मास के दौरान चार माह तक एक ही स्थान पर विराजमान होकर अपने चैतन्य से अवचेतन को मथने में लगे रहेंगे। वे और संतों की तरह प्रवचन नहीं देते। उन्हें जो भी पात्र व्यक्ति लगता है उसे वे मानसिक तरंगों के जरिए प्रवचन देते हैं। उनके पास ऐसी विशिष्ट सिद्धियां है जिससे वे मानव मात्र के हृदय की बात जान लेते हैं और उनसे संवाद करने लगते हैं। उनका मन से मन का कनेक्शन जुड़ जाता है और वे अपनी बात रखते हैं। वे किसी प्रकार का दिखावा नहीं करते। उनका असली स्वरूप आज तक किसी ने नहीं देखा। उनके शिष्यों ने भी उन्हें आज तक देखा नहीं है। क्योंकि वे अपने सारे शिष्यों को मानसिक संदेश के जरिए ही ज्ञान का झरना नि:सृत करते हैं। उनकी अंतिम बार जो तस्वीर हमें मिली थी उसी का हम बार-बार उपयोग कर रहे हैं क्योंकि स्वामीजी अपना परिचय जगत को फिलहाल देना नहीं चाहते। उनका कहना है कि जब उचित समय आएगा तब वे जगत को अपना स्वरूप दिखाएंगे। वे शिष्यों से घिरे नहीं रहते। वे साधना भी बिलकुल एकांत में करते हैं। वे क्या खाते हैं? क्या पीते हैं? किसी को नहीं पता। उनकी आयु कितनी है? उनका आश्रम कहां है? उनके गुरु कौन है? ऐसे कई सवाल हैं जो अभी तक रहस्य बने हुए हैं। जो तस्वीर हम इस आलेख के साथ प्रकाशित कर रहे हैं और अब तक प्रकाशित करते आए हैं एक विश्वास है कि गुरुदेव का इस रूप में हमने दर्शन किया है। लेकिन हम दावे के साथ नहीं कह सकते हैं कि परम पूज्य पंकजप्रभु का यही स्वरूप हैं। बहरहाल गुरुदेव का हमसे मानसिक रूप से संपर्क जुड़ा है और वे जगत को जो प्रवचन देने जा रहे हैं उससे हूबहू रूबरू करवा रहे हैं। जैसा कि गुरुदेव ने कहा था कि वे चार महीने तक रोज एक शब्द को केंद्रित करते हुए प्रवचन देंगे। जैसा कि यह शरीर पंच तत्वों से मिलकर बना है- आकाश, पृथ्वी, अग्नि, वायु और जल…। आकाश तत्व पर स्वामीजी के प्रवचन हो चुके हैं। आज पृथ्वी तत्व पर स्वामीजी प्रवचन दे रहे हैं।)

गुरुदेव बोल रहे हैं-

पृथ्वी। जो हमें धारण किए हुए है। साइंस की नजर में पृथ्वी एक ग्रह से अधिक कुछ भी नहीं। मगर हम पृथ्वी को मां कहते हैं। इस शरीर की रचना में एक अंश पृथ्वी का भी है। पृथ्वी के जन्म की शास्त्रोक्त कहानी राजा पृथु की आपने सुन ही रखी है। पृथ्वी जिसे अचला भी कहते हैं। साइंस कहता है कि पृथ्वी सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाती है। मगर पृथ्वी के लिए हमारे शास्त्रों ने अचला यानी जो चलायमान नहीं है, शब्द इस्तेमाल किया है। अचला यानी पृथ्वी चलायमान नहीं है। फिर वैज्ञानिक किस आधार पर कहते हैं कि पृथ्वी सूर्य के चारों ओर घूमती है। साइंस अपनी जगह सही है और हमारे शास्त्र अपनी जगह। पृथ्वी सूर्य के चारों ओर अपने अक्ष पर घूमती है, यही कारण है कि हमें इसका अहसास नहीं होता और नजर नहीं आती। इस तरह पृथ्वी अचला है और गतिशील भी। पृथ्वी अचला जरूर है मगर गति उसका स्वभाव है। पृथ्वी हमारी मां है इसलिए अचला नहीं हो सकती। क्योंकि मां अचला कैसे हो सकती है? अब सवाल है कि अचला नाम पृथ्वी का कैसे पड़ा? आदि काल में एक ऋषि थे- चलानंद प्रभु…वे दुनिया के पहले जैन ऋषि थे। वे समुद्र पर चला करते थे। जब समुद्र की लहरों ने चलानंद प्रभु की साधना भंग की तो उन्होंने श्राप दे दिया कि आज से तुम अचला हो जाओ (यानी चलना बंद हो जाओ) तब समुद्र ने ऋषि के सामने दया की भीख मांगी और कहा कि ऐसा श्राप ना दें क्योंकि यह समुद्र की नैसर्गिक हत्या हो जाएगी। लहरें समुद्र का प्राण है और अगर लहरें ही अचला हो जाएगी तो समुद्र कहां जाएगा? आखिर ऋषि को दया आ जाती है और वह कहते हैं कि मैं अचला से विवाह करूंगा और उन्हें अपना साधना स्थली बनाऊंगा। कहते हैं उस दिन समुद्र से पृथ्वी बाहर आई और उसका दूसरा जन्म हुआ और तब से इस पृथ्वी को अचला कहा जाता है। दुनिया के किसी भी शास्त्र या ग्रंथ में हे मानव तुम्हें यह कहानी नहीं मिलेगी, क्योंकि यह कहानी सिर्फ और सिर्फ मुझे पता है। इस कहानी को मैंने अपने साधना चक्षुओं से देखा है। तब चलानंद प्रभु और अचला ने मिलकर अपना परिवार बढ़ाया और तब से धरती पर ऋषि की संतान पली-बढ़ी और आज जैन धर्म का वट वृक्ष इतना समृद्ध हो सका। जैन धर्म की कहानी उतनी ही पुरानी है जितनी यह धरती यानी अचला पुरानी है। धरती के जन्म से पहले भी जैन ऋषि का अस्तित्व विद्यमान था।

हे मानव पृथ्वी की कहानी तुमने सुनीं। अलग-अलग धर्मों में, अलग-अलग शास्त्रों में पृथ्वी के जन्म की कहानी तुम्हें अलग-अलग मिलेगी। दरअसल पृथ्वी हमारे लिए साक्षात जीवंत तत्व है। तत्व है तो निश्चित रूप से जीवंत ही होगा। हमारे यहां पृथ्वी को देवी का स्वरूप माना गया है। जब माता सीता को पृथ्वी ने अपनी आगोश में पनाह दी तो राम ने इस धरती को चेतावनी दी कि या तो उनकी सीता को लौटा दे नहीं तो परिणाम भुगतने को तैयार रहे। तब ऋषियों ने अपने तर्कों और समझदारी से पृथ्वी को बचा लिया। दरअसल पृथ्वी एक ऐसी सत्ता है जो अपने भीतर प्रलय की क्षमता रखती है। इसका परिणाम हम भूकंप के रूप में देखते हैं। जब-जब भूंकप आते हैं तो धरती पर प्रलय आता है। भूकंप से समुद्रों में सुनामी आती है। भूकंप से मानव जाति नष्ट भी हो सकती है। जिस दिन पाप अपने चरम पर होंगे तब पृथ्वी समूची मानव जाति को निगल लेगी। पृथ्वी में इतनी क्षमता है कि वह समूचे कालखंड की मानव जाति और मानव जाति के विकास को अपने भीतर जमींदोज कर दे। इसलिए हे मानव, पृथ्वी से डरें। पृथ्वी के अस्तित्व से खिलवाड़ करना छोड़ दें। पृथ्वी को पृथ्वी की तरह ही रहने दें। पृथ्वी की संपदा के साथ खिलवाड़ ना करें। यह पेड़-पौधे, नदियां, तालाब, खेत-खलिहान, पहाड़-पठार और प्रकृति का शृंगार शृंगार ही रहने दें। इन वनों पर आरी चलाना बंद करें। पृथ्वी को हमारे शास्त्रों में माता का दर्जा है। लेकिन आज हम अपनी ही मां के दुश्मन बन गए हैं। हमने पृथ्वी की संपदा को नष्ट करना शुरू कर दिया है। ध्यान रहे पृथ्वी इसकी भरपाई करना खुद जानती है। जब अति होगी तो मनुष्य को इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी। इसलिए हे मनुष्य, पृथ्वी को विवश मत करो कि वह अपने ही पुत्रों की बली ले। पृथ्वी ऐसा स्थान है जहां देवता भी जन्म लेने के लिए लालायित रहते हैं। पृथ्वी पर ही समस्त लीलाएं होती हैं। पृथ्वी पर ही समस्त धर्मों का जन्म स्थान है। पृथ्वी पर स्वर्ग है। जिस स्वर्ग को हम ऊपर ढूंढ़ते हैं, दरअसल वह स्वर्ग तो पृथ्वी पर ही है। पृथ्वी को अपना काम करने दो और हमें पृथ्वी के नैसर्गिक राह में रुकावट नहीं डालनी चाहिए। क्योंकि जिस दिन पृथ्वी को गुस्सा आ गया उस दिन अनर्थ हो जाएगा।

पृथ्वी पर जीवन की कहानी है वैसे ही साइंस कहता है कि हमारी गैलेक्सी में ऐसी और कई पृथ्वियां हो सकती है और वहां भी जन्म हो सकता है। साइंस ने जो बात कही है वही हमारे शास्त्रों ने भी कही है। पृथ्वी एक ग्रह मात्र नहीं है। हमारे यहां धारयती यानी धारण करने वाली को पृथ्वी कहा गया है। पृथ्वी हम सबको धारण किए हुए हैं। पृथ्वी पर जब पाप बहुत बढ़ गए तो भगीरथ आकाश से गंगा लाया। आज पृथ्वी पर गंगा जैसी नदियां है। हमने गंगा के अस्तित्व को भी खतरे में डाल दिया। याद रखो मानव गंगा और तमाम नदियों के साथ खिलवाड़ कर हम पृथ्वी और अपने अस्तित्व के साथ खिलवाड़ कर रहा हैं। पृथ्वी के संकट हरना हम पृथ्वी पुत्रों का कर्तव्य है। हमें अपने पुत्र होने का धर्म भी निभाना है। जब ब्रह्माजी ने सृष्टि का निर्माण करना शुरू किया तब कहा था- एको अहं बहुस्याम…मैं एक हूं अनेक हो जाऊं…और ब्रह्माजी का सृष्टि का यज्ञ शुरू हुआ। यह यज्ञ आज भी जारी है। ब्रह्माजी की सृष्टि का यज्ञ कभी रुकता नहीं है। हम यह अपनी चेतन आंखों से नहीं देख पाते। लेकिन सृष्टि के निर्माण का यज्ञ आज भी जारी है। पृथ्वी पर आने वाले समय में इसके संकेत अभी से दिखाई दे रहे हैं। हे मानव सृष्टि का यज्ञ कभी रुकता नहीं है। यह परंपरा ना जाने कब से चली आ रही है और पृथ्वी अपने सीने में सृष्टि के किरदारों को पनाह देती रहती है। इसलिए हे मानव, जब तुम नहीं रहोगे तब भी पृथ्वी पर कोई और रूप में सृष्टि दस्तक दे सकती है। इसलिए पृथ्वी का आदर करो। पृथ्वी का सम्मान करो। पृथ्वी को तंग करना छोड़ दो। पृथ्वी के लिए संकटमोचक बनो उसके लिए संकट का कारण मत बनो। अगर तुम पृथ्वी के लिए संकट का कारण बनोगे तो पृथ्वी तुम्हें माफ नहीं करेगी। हालांकि पृथ्वी का स्वभाव माफ करना है। मां कभी अपने पुत्रों का बुरा नहीं चाहती। लेकिन जब मां का दिल छलनी होता है। जब मां की हाय लगती है तो सबकुछ नष्ट हो जाता है। इसलिए हे मानव, इस धरती मां को समझो। उसके नैसर्गिक स्वरूप से खिलवाड़ मत करो। धरती ने, इस पृथ्वी ने कब से सृष्टि को अपने आगोश में पनाह दी है। तुम हो कि पृथ्वी को नष्ट करने पर तुले हो। ऐसा करके तुम अपना खुद का ही अहित करने जा रहे हो। इसलिए हे मानव पृथ्वी को मान दो। पृथ्वी को उसके खुद के जीने का अधिकार दो। पृथ्वी को पृथ्वी बनी रहने दो। पृथ्वी ही नहीं रही तो तुम्हारा जीवन भी नहीं रहेगा। लेकिन तुम इस शाश्वत सत्य को भी नहीं समझ रहे। तुम विकास की अंधी दौड़ में खुद अपने अस्तित्व की अनदेखी कर रहे हो। इसलिए हे मानव आज मैं तुमसे इस पृथ्वी के लिए प्रार्थना करता हूं। इस पृथ्वी को अपने से पृथक मत समझो। पृथ्वी तुमसे पृथक नहीं है। तुमसे अलग रहकर पृथ्वी भी खुश नहीं रह सकती। मगर यदि तुमने पृथ्वी को प्रलय के लिए विवश किया तो वह दिन तुम्हारे लिए विनाश का संकेत लेकर आएगा। इसलिए पृथ्वी और पृथ्वी पुत्रों के लिए कल्याण की बात यही होगी कि धर्म को धारण करने वाली पृथ्वी को अपने भीतर महसूस करो और पृथ्वी को अपनी मां की तरह मान दो। आज इतना ही।

Rising Bhaskar
Author: Rising Bhaskar


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