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Friday, October 2, 2026, 9:36 am

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Lifestyle

ऑन द स्पॉट एफ.एम. 102.4 पर आठवां इंटरव्यू टणकार भाईसाहब का केबी व्यास के साथ

आइडिया एवं क्यूरेटर : केबी व्यास, दुबई
वर्ड्स ऑफ इंटरव्यू : आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस
प्रजेंट : दिलीप कुमार पुरोहित. राइजिंग भास्कर

♪♪… ढम… ढम… टण… टण… टणकार… ♪♪
“आप सुन रहे हैं—ऑन द स्पॉट एफ.एम. 102.4… जहाँ सवाल भी हँसते हैं और जवाब सुनकर अक़्ल भी कहती है—भाई, मुझे इसमें मत घसीटो!”
(स्टूडियो में तालियों की गड़गड़ाहट…)
के बी व्यास:
नमस्कार सा… राम-राम सा… खम्मा घणी सा!
आज हमारे स्टूडियो में पधारे हैं एक ऐसी शख्सियत, जिनकी आवाज़ सुनकर दरवाज़े की कुंडी तक अपने-आप बजने लगती है। ये जहाँ बैठते हैं, वहाँ बातचीत कम और टण-टण-टणकार ज़्यादा होती है।
स्वागत कीजिए—मोहल्ले की चलती-फिरती घंटी, बहसों के बादशाह, बातों के उस्ताद और हर वाक्य के अंत में अपना ही बाजा बजाने वाले—भाईजान टणकार साहब का!
(तालियाँ… सीटी… और कहीं से बर्तन गिरने की आवाज़!)
भाईजान टणकार:
वाह भाई वाह! क्या परिचय दिया है! लेकिन थोड़ा कम है। हमारे बारे में अगर पूरा परिचय दिया जाए तो आपका कार्यक्रम ख़त्म हो जाएगा, स्टेशन बंद हो जाएगा और अगली सुबह की आरती शुरू हो जाएगी।
के बी व्यास:
तो भाईजान, सबसे पहले ये बताइए कि आपको “टणकार” नाम कैसे मिला?
भाईजान टणकार:
देखिए साहब, बचपन से ही हमारी आवाज़ में वजन था। दूसरे बच्चे रोते थे—“ऊँ… ऊँ…”। हम रोते थे—“टणऽऽऽऽकार!”
माँ समझ जाती थीं—बच्चा दूध माँग रहा है। पड़ोसी समझते थे—मंदिर की घंटी बज गई। और दूधवाला समझता था—उसके पैसे माँगे जा रहे हैं!
के बी व्यास:
मतलब बचपन से ही आपकी आवाज़ दूर तक जाती थी?
भाईजान टणकार:
दूर तक? साहब, हमारी आवाज़ का कोई पोस्टल कोड नहीं है! एक बार हमने छत से पत्नी को आवाज़ दी—“चाय बना दो!”
पत्नी रसोई में थीं, लेकिन चाय सामने वाली गली की भाभी बनाकर ले आईं।
के बी व्यास:
आपकी पत्नी आपकी इस ऊँची आवाज़ से परेशान नहीं होतीं?
भाईजान टणकार:
पहले होती थीं। अब उन्होंने तरीका निकाल लिया है।
के बी व्यास:
क्या?
भाईजान टणकार:
जब हम बोलना शुरू करते हैं, वो मिक्सी चला देती हैं!
लेकिन हमारी टणकार ऐसी है कि मिक्सी भी दो मिनट बाद बंद होकर कहती है—“भैया, पहले आप निपट लो!”
(स्टूडियो में जोरदार ठहाका…)
के बी व्यास:
सुना है आप हर विषय पर अपनी राय देना जरूरी समझते हैं?
भाईजान टणकार:
बिल्कुल! राय देना नागरिक का मौलिक अधिकार है।
कोई क्रिकेट पर बात करे—हम विशेषज्ञ।कोई अर्थव्यवस्था पर बात करे—हम अर्थशास्त्री।कोई बीमारी पर बात करे—हम डॉक्टर।कोई रॉकेट की बात करे—हम वैज्ञानिक।
के बी व्यास:
और अगर विषय आपको मालूम न हो?
भाईजान टणकार:
तो और ज़ोर से बोलते हैं! साहब, ज्ञान कम हो तो आवाज़ बढ़ा देनी चाहिए। सामने वाले को सोचने का मौका ही मत दो कि हमें आता कितना है!
के बी व्यास:
वाह! ये ज्ञान आपने कहाँ से प्राप्त किया?
भाईजान टणकार:
व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी से!
हमने वहाँ से राजनीति में पीएचडी, चिकित्सा में एमबीबीएस, ज्योतिष में डिप्लोमा और अंतरिक्ष विज्ञान में सर्टिफिकेट किया है।
सुबह सात बजे तक पाँच फारवर्ड पढ़ लेते हैं और आठ बजे तक विश्व विशेषज्ञ बन जाते हैं।
के बी व्यास:
क्या आप खबरों की सत्यता जाँचते भी हैं?
भाईजान टणकार:
हम खबर की सत्यता नहीं जाँचते—खबर हमारी सत्यता जाँचती है!
अगर खबर हमारी सोच से मिलती है तो सौ प्रतिशत सही। अगर नहीं मिलती तो फेक न्यूज़!
के बी व्यास:
भाईजान, आपकी प्रसिद्धि मोहल्ले में कैसी है?
भाईजान टणकार:
बहुत शानदार! हमें देखते ही लोग रास्ता बदल लेते हैं।
के बी व्यास:
इतना सम्मान?
भाईजान टणकार:
जी! कोई हमारा समय बर्बाद नहीं करना चाहता… और हम उसका छोड़ते नहीं हैं!
हम सुबह दूध लेने निकलें तो दूधवाला हमें देखते ही पैकेट दूर से फेंक देता है—“भाईजान, पैसे कल दे देना, बस चर्चा मत शुरू करना!”
के बी व्यास:
आप किस विषय पर सबसे लंबी चर्चा कर सकते हैं?
भाईजान टणकार:
विषय कोई भी हो, अंत में हम उसे अपने ऊपर ले आते हैं।
कोई कहे—“आज बारिश बहुत हुई।”
हम कहेंगे—“हाँ, 1987 में जब हम स्कूल जा रहे थे, ऐसी ही बारिश हुई थी…”
फिर वहाँ से स्कूल, स्कूल से मास्टर साहब, मास्टर साहब से शिक्षा व्यवस्था, शिक्षा से सरकार, सरकार से महँगाई और महँगाई से सीधे हमारी गैस की समस्या!
के बी व्यास:
मतलब यात्रा लंबी होती है?
भाईजान टणकार:
बातचीत में हम गूगल मैप नहीं मानते। जहाँ से शुरू करें, वहाँ वापस आने की कोई गारंटी नहीं!
(हँसी की गूँज…)
के बी व्यास:
आपके दोस्त कितने हैं?
भाईजान टणकार:
बहुत हैं। बस सामने कम आते हैं।
के बी व्यास:
क्यों?
भाईजान टणकार:
लोग व्यस्त हैं आजकल। हमें देखते ही अचानक किसी को फोन आ जाता है, किसी को पत्नी बुला लेती है, किसी को याद आ जाता है कि गैस खुली छोड़ आया है।
एक मित्र तो हमें देखकर दौड़ने लगा। हमने कहा—“अरे, कहाँ जा रहे हो?”
बोला—“डॉक्टर ने कहा है रोज़ दो किलोमीटर दौड़ो।”
हमने पूछा—“लेकिन डॉक्टर ने आज ही कहा?”
कहता—“नहीं, आपको देखकर याद आ गया!”
के बी व्यास:
आपको गुस्सा जल्दी आता है?
भाईजान टणकार:
हमें गुस्सा नहीं आता, हमारी आवाज़ में उत्साह बढ़ जाता है।
पत्नी कहती हैं—“धीरे बोलिए।”
हम कहते हैं—“हम धीरे ही बोल रहे हैं!”
तभी ऊपर वाला पड़ोसी नीचे से आवाज़ लगाता है—“भाईजान, थोड़ा और धीरे!”
के बी व्यास:
सुना है आप बाज़ार में मोलभाव भी खूब करते हैं?
भाईजान टणकार:
मोलभाव हमारी कला है।
दुकानदार बोला—“ये शर्ट दो हजार की है।”
हमने कहा—“पाँच सौ।”
उसने कहा—“साहब, मेरा खरीद मूल्य ही बारह सौ है।”
हम बोले—“तो गलती आपकी है! खरीदते समय मोलभाव करना चाहिए था!”
के बी व्यास:
फिर शर्ट कितने में मिली?
भाईजान टणकार:
शर्ट नहीं मिली। दुकानदार ने हमें पानी पिलाकर बाहर छोड़ दिया।
लेकिन नैतिक विजय हमारी हुई!
के बी व्यास:
भाईजान, सोशल मीडिया पर भी सक्रिय हैं?
भाईजान टणकार:
बहुत! हम सुबह “गुड मॉर्निंग” का फूल भेजते हैं, दोपहर तक ज्ञान, शाम तक राजनीति और रात में स्वास्थ्य टिप्स।
हमारे संदेश इतने नियमित हैं कि लोगों ने अलार्म बंद कर दिया है। सुबह छह बजे हमारा “सुप्रभात” पहुँचते ही पूरा ग्रुप जाग जाता है।
के बी व्यास:
लोग जवाब देते हैं?
भाईजान टणकार:
पहले देते थे। अब सिर्फ नीले टिक आते हैं। मगर हम समझते हैं—मौन भी समर्थन का एक रूप है।
के बी व्यास:
अगर कोई आपको ग्रुप से निकाल दे?
भाईजान टणकार:
तो हम नया ग्रुप बना लेते हैं—“सत्य से डरने वाले लोग”—और सबसे पहले उसी को जोड़ते हैं जिसने निकाला था!
(स्टूडियो में तालियाँ और ठहाके…)
के बी व्यास:
आपका जीवन-मंत्र क्या है?
भाईजान टणकार:
बहुत सरल है—
“अगर सामने वाला आपकी बात न समझे तो बात बदलो मत—आवाज़ बढ़ाओ!”
के बी व्यास:
लेकिन भाईजान, कभी चुप रहना भी अच्छा होता है।
भाईजान टणकार:
बिल्कुल होता है। हम रोज़ रात को सोते समय लगभग सात घंटे चुप रहते हैं।
के बी व्यास:
पत्नी के लिए वही सात घंटे शांति के होंगे!
भाईजान टणकार:
अरे नहीं! पत्नी कहती हैं कि हम खर्राटे भी ऐसे लेते हैं जैसे खाली पीपे में मोटरसाइकिल स्टार्ट हो रही हो—
घर्रऽऽऽ… टणऽऽऽ… घर्रऽऽऽ… टणकार!
के बी व्यास:
अंत में हमारे श्रोताओं को कोई संदेश देना चाहेंगे?
भाईजान टणकार:
ज़रूर!
भाइयों और बहनों, जीवन छोटा है। अपनी बात दिल में मत रखिए। जो कहना है कहिए, जहाँ कहना है कहिए, जितना कहना है कहिए—
के बी व्यास:
और सामने वाला सुनना न चाहे?
भाईजान टणकार:
तो उसका कंधा पकड़ लीजिए! बातचीत बीच में छोड़ना सामाजिक अपराध है!
के बी व्यास:
भाईजान, हमारे कार्यक्रम का समय समाप्त हो गया है।
भाईजान टणकार:
अरे, अभी तो हमने अपना परिचय भी पूरा नहीं किया!
के बी व्यास:
हमारा अगला कार्यक्रम शुरू होने वाला है।
भाईजान टणकार:
कोई बात नहीं, हम उसमें भी बैठ जाते हैं। विषय क्या है?
के बी व्यास:
“मानसिक शांति कैसे प्राप्त करें?”
भाईजान टणकार:
बहुत बढ़िया! इस विषय पर हम तीन घंटे बोल सकते हैं!
के बी व्यास:
बस… इसी कारण आपको उसमें नहीं बैठा सकते!
(स्टूडियो में जबरदस्त ठहाका और तालियों की गड़गड़ाहट…)
♪♪… टण… टण… टणऽऽऽकार… ♪♪
के बी व्यास:
तो श्रोताओं, ये थे हमारे आज के खास मेहमान—भाईजान टणकार साहब।
इनसे हमने आज एक महत्वपूर्ण शिक्षा ली—बात में दम हो तो अच्छा है, मगर हर बात में टणकार हो तो पड़ोसी भी ईयरप्लग खरीद लेते हैं!
फिर मिलेंगे एक नए किरदार और नई हास्य-टणकार के साथ—
ऑन द स्पॉट एफ.एम. 102.4 पर—जहाँ सवाल भी हँसते हैं और जवाब खुद अपनी तालियाँ बजाते हैं!
Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor