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Sunday, October 18, 2026, 10:26 am

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Lifestyle

ऑन द स्पॉट एफ.एम. 102.4 पर 12वां इंटरव्यू हल्लाराम हड़कम्पी का केबी व्यास के साथ

आइडिया एवं क्यूरेटर : केबी व्यास, दुबई
वर्ड्स ऑफ इंटरव्यू : आर्टिफिशियल इंटलिजेंस
प्रजेंट : दिलीप कुमार पुरोहित. राइजिंग भास्कर



(जिंगल बजता है।)
“तथ्य मिले न मिले, ऐलान ज़रूरी,
हड़कम्पी जी की है पूरी तैयारी!”
के बी व्यास:
नमस्कार सा! राम-राम सा! खम्मा घणी सा!
आज हमारे मेहमान ख़बर की पुष्टि होने का इंतज़ार नहीं करते। कहते हैं—“तब तक कोई दूसरा फैला देगा!” इनके मोहल्ले में लोग ख़तरे से कम, इनके “सावधान!” से ज़्यादा डरते हैं।
इनकी ख़बरें इतनी तेज़ होती हैं कि सच पीछे से दौड़ते-दौड़ते हाँफ जाता है।
स्वागत कीजिए—श्री हल्लाराम हड़कम्पी जी!
हल्लाराम:
बचाओ! स्टूडियो धँस रहा है!
के बी व्यास:
कुर्सी का लीवर छोड़िए सा।
हल्लाराम:
ओह! तो कोई ख़तरा नहीं?
के बी व्यास:
कुर्सी को नहीं। कार्यक्रम को है।
हल्लाराम:
फिर भी मेरी सतर्कता देखिए!
के बी व्यास:
जी। घटना आपकी उँगली ने की, घोषणा आपके मुँह ने और नुकसान हमारी टी.आर.पी. का हुआ।
हल्लाराम:
मैं ख़तरे को जन्म लेते ही पकड़ लेता हूँ।
के बी व्यास:
आप तो ख़तरे को गर्भ में ही अफ़वाह बना देते हैं।
हल्लाराम:
और अगर ख़तरा पैदा न हो?
के बी व्यास:
तो आप उसे गोद लेकर पालते हैं—जब तक वह मोहल्ले में फैल न जाए।
के बी व्यास:
यह प्रतिभा बचपन से है?
हल्लाराम:
स्कूल में मैंने सबसे पहले साँप देखा था।
के बी व्यास:
कहाँ?
हल्लाराम:
मास्टर जी की मेज़ के नीचे। चिल्लाया तो पूरी कक्षा भाग गई।
के बी व्यास:
साँप निकला?
हल्लाराम:
जूते का फीता निकला। लेकिन हिल साँप की तरह रहा था!
के बी व्यास:
ग़लती मानी?
हल्लाराम:
कहा—“मेरे प्रयास से संभावित दुर्घटना टली।”
के बी व्यास:
यानी फीता पकड़ा गया, दावा बच निकला!
हल्लाराम:
बाद में मैंने फीते को भी संदिग्ध घोषित कर दिया।
के बी व्यास:
क्यों?
हल्लाराम:
वह जूते से बँधा था। इतनी गहरी साज़िश अकेला फीता नहीं कर सकता।
के बी व्यास:
फिर जाँच कहाँ पहुँची?
हल्लाराम:
मास्टर जी ने जूता उतारकर मुझे दे दिया।
के बी व्यास:
और आपने?
हल्लाराम:
उसे भी संदिग्ध घोषित कर दिया।
के बी व्यास:
वाह सा! उस दिन साँप नहीं मिला, मगर आपकी कल्पना को पहली बार जूते मिले।
के बी व्यास:
शादी में भी हल्ला मचाया था?
हल्लाराम:
फेरों के समय चिल्लाया—“आग! आग!”
के बी व्यास:
हवन की?
हल्लाराम:
पंडित जी ने भी यही कहा। मगर सावधानी में क्या बुराई है?
के बी व्यास:
सावधानी में नहीं, आपकी आवाज़ में है। वह ख़तरे से पहले पहुँचती है और समझदारी के बाद भी नहीं लौटती।
हल्लाराम:
फिर क्या हुआ?
के बी व्यास:
किसी ने पानी की बाल्टी उड़ेल दी।
हल्लाराम:
मुझ पर। पंडित जी बोले—“पहले घोषणा करने वाले को ठंडा करो।”
के बी व्यास:
दूल्हा-दुल्हन के फेरे रुके?
हल्लाराम:
नहीं, मेरी पिटाई के फेरे शुरू हो गए।
के बी व्यास:
बारात ने क्या कहा?
हल्लाराम:
“आग बुझ गई, मगर हल्लाराम की गर्मी अभी बाकी है।”
के बी व्यास:
उस दिन शादी दो लोगों की हुई थी, लेकिन विदाई आपकी चेतावनी की हुई।
के बी व्यास:
मोहल्ले की सुरक्षा आप देखते हैं?
हल्लाराम:
कल रात एक संदिग्ध आदमी पकड़ा।
के बी व्यास:
क्या कर रहा था?
हल्लाराम:
अपनी ही दीवार के पास झुका था।
के बी व्यास:
अपनी दीवार के पास?
हल्लाराम:
चोर कहीं भी हो सकता है!
के बी व्यास:
कौन निकला?
हल्लाराम:
पड़ोसी। चप्पल ढूँढ़ रहा था।
के बी व्यास:
आपने माफ़ी माँगी?
हल्लाराम:
मैंने घोषणा की—“स्थिति नियंत्रण में है!”
के बी व्यास:
और पड़ोसी?
हल्लाराम:
चप्पल मिलने के बाद स्थिति फिर बिगड़ गई।
के बी व्यास:
क्यों?
हल्लाराम:
चप्पल उसी ने मेरे सिर पर रखकर कहा—“अब इसे भी संदिग्ध समझो।”
के बी व्यास:
आपने पुलिस को बुलाया?
हल्लाराम:
हाँ। पुलिस ने पूछा—“अपराध क्या हुआ?”
के बी व्यास:
आपने क्या कहा?
हल्लाराम:
“अपराध नहीं हुआ, लेकिन मेरी रात सफल हुई।”
के बी व्यास:
मोहल्ले में चोर नहीं मिला, मगर सुरक्षा विभाग को एक स्थायी ख़तरा मिल गया—आप।
के बी व्यास:
व्हाट्सऐप पर ख़बर जाँचकर भेजते हैं?
हल्लाराम:
मैं सूचना पहुँचाता हूँ। जाँच जनता करे।
के बी व्यास:
आपकी ज़िम्मेदारी?
हल्लाराम:
सबसे पहले पहुँचाना।
के बी व्यास:
ग़लत हुई तो?
हल्लाराम:
नीचे लिख देता हूँ—“प्राप्त संदेश।”
के बी व्यास:
जैसे गंदगी दरवाज़े पर डालकर कह दें—“प्राप्त कचरा!”
हल्लाराम:
आप भावनाएँ समझिए। मैंने लिखा था—“कल से पानी बंद!”
के बी व्यास:
कहाँ?
हल्लाराम:
दूसरे शहर में।
के बी व्यास:
कब?
हल्लाराम:
पिछले साल।
के बी व्यास:
तो सही क्या था?
हल्लाराम:
पानी! विषय तो पानी ही था!
के बी व्यास:
तो कल से क्या बंद था?
हल्लाराम:
मेरी विश्वसनीयता।
के बी व्यास:
वह तो परसों से बंद थी सा।
हल्लाराम:
लेकिन संदेश अभी भी घूम रहा है।
के बी व्यास:
यानी पानी नहीं, आपकी अफ़वाह बह रही है।
हल्लाराम:
और वह भी बिना पाइपलाइन के।
के बी व्यास:
आपकी ख़बरें इतनी रिसावदार हैं कि नगर निगम भी उन्हें देखकर शर्मिंदा हो जाए। मोहल्ले वालों ने समूह से निकाल दिया?
हल्लाराम:
सच की आवाज़ दबाई जा रही है।
के बी व्यास:
आपकी कौन-सी ख़बर सच निकली?
हल्लाराम:
कि मुझे समूह से निकाल दिया गया।
के बी व्यास:
उसे किसने फैलाया?
हल्लाराम:
मैंने नया समूह बनाया—“जागरूक नागरिक, भाग दो।”
के बी व्यास:
सदस्य कितने?
हल्लाराम:
अभी मैं और मेरा दूसरा नम्बर। दोनों सक्रिय हैं।
के बी व्यास:
तीसरा सदस्य?
हल्लाराम:
वह भी मैं ही हूँ, लेकिन अभी निष्क्रिय हूँ।
के बी व्यास:
समूह में चर्चा होती है?
हल्लाराम:
हाँ। मैं संदेश भेजता हूँ, फिर दूसरे नम्बर से “वाह!” लिखता हूँ।
के बी व्यास:
लोकतंत्र का सबसे छोटा और सबसे अकेला संस्करण!
हल्लाराम:
कल मैंने मतदान भी कराया।
के बी व्यास:
नतीजा?
हल्लाराम:
दो वोट मेरे पक्ष में, एक वोट भी मेरे पक्ष में।
के बी व्यास:
तीसरा वोट किसने दिया?
हल्लाराम:
मैंने भविष्य की ओर से दिया।
के बी व्यास:
आपके समूह में सदस्य कम नहीं हैं सा—बस जनता अभी तक पैदा नहीं हुई। अच्छा, सच्चाई सामने आए तो सुधार भेजते हैं?
हल्लाराम:
ज़रूर। पिछली बार रात बारह बजे भेजा।
के बी व्यास:
मूल ख़बर कब भेजी थी?
हल्लाराम:
सुबह आठ बजे। तब सब जाग रहे थे।
के बी व्यास:
सुधार रात को क्यों?
हल्लाराम:
ग़लती पर अनावश्यक हल्ला नहीं चाहता।
के बी व्यास:
वाह सा! अफ़वाह लाउडस्पीकर पर, माफ़ी तकिए के नीचे!
हल्लाराम:
मैंने सुधार भी भेजा था—“यदि किसी को भ्रम हुआ हो तो वह अपनी समझ की जाँच करे।”
के बी व्यास:
आप ग़लती नहीं करते, जनता को ग़लत समझने पर मजबूर करते हैं!
हल्लाराम:
मैंने अंत में लिखा—“सुधार पढ़ने की आवश्यकता नहीं, मूल संदेश पर्याप्त भावनात्मक था।”
के बी व्यास:
यानी तथ्य मर गया, मगर भावना का अंतिम संस्कार भी आपने लाइव कर दिया।
( ठहाका )
के बी व्यास:
घर में आपकी घोषणाओं का क्या असर है?
हल्लाराम:
अब पत्नी पहले पूछती हैं—“देखा है या बस ऐसे ही लगा है?”
के बी व्यास:
अच्छा सवाल है।
हल्लाराम:
कल कहा—“रसोई में भयंकर धुआँ!”
के बी व्यास:
फिर?
हल्लाराम:
बोलीं—“तड़का लगाया है। देशवासियों को सम्बोधित मत करना।”
के बी व्यास:
आपने क्या किया?
हल्लाराम:
मैंने खिड़की खोली और लाइव प्रसारण शुरू कर दिया।
के बी व्यास:
किस विषय पर?
हल्लाराम:
“रसोई से उठता धुआँ—क्या यह घरेलू संकट है या राष्ट्रीय संकेत?”
के बी व्यास:
और खाना?
हल्लाराम:
ठंडा हो गया।
के बी व्यास:
कम-से-कम एक ख़बर सही निकली—घर में गर्मी आपकी वजह से थी।
हल्लाराम:
पत्नी ने कहा, “आज से रसोई में प्रवेश से पहले तथ्य-जाँच कराना।”
के बी व्यास:
फिर आपने क्या किया?
हल्लाराम:
मैंने घर में नया विभाग खोल दिया—“घरेलू आपदा एवं त्वरित घोषणा मंत्रालय।”
के बी व्यास:
मंत्री कौन?
हल्लाराम:
मैं।
के बी व्यास:
और विपक्ष?
हल्लाराम:
मेरी पत्नी—वह हर घोषणा के बाद सरकार गिरा देती हैं।
के बी व्यास:
कभी आपकी आवाज़ सही जगह काम आई?
हल्लाराम:
एक बच्चे की गेंद सड़क पर गई। वह पीछे दौड़ा। मैंने आवाज़ देकर रोक लिया। सामने गाड़ी थी।
के बी व्यास:
उस दिन अलग क्या किया?
हल्लाराम:
ख़तरा सामने देखा था। उसी को पुकारा, जिसे रोकना था।
के बी व्यास:
बस सा। आवाज़ का काम हुआ।
हल्लाराम:
और बच्चे की माँ ने धन्यवाद दिया। बिना किसी समूह में भेजे!
के बी व्यास:
यानी पहली बार आपने ख़बर नहीं, इंसान बचाया।
हल्लाराम:
हाँ। उस दिन मैंने कुछ नहीं बढ़ाया।
के बी व्यास:
कितना?
हल्लाराम:
बस इतना कि गाड़ी छोटी थी, सड़क लंबी थी और बच्चा राष्ट्रीय स्तर का धावक था।
के बी व्यास:
फिर वही पुरानी बीमारी!
हल्लाराम:
लेकिन इस बार मैंने वीडियो भी नहीं बनाया।
के बी व्यास:
क्यों?
हल्लाराम:
बच्चे की माँ ने कहा—“पहले इंसान बनो, फिर रिपोर्टर।”
के बी व्यास:
और आप?
हल्लाराम:
मैंने पूछा—“इंसान बनने की प्रक्रिया लाइव कर दूँ?”
के बी व्यास:
आपने बच्चे को बचाया, मगर अपनी आदत को फिर सड़क पर छोड़ दिया। चलिए अब श्रोताओं से क्या कहेंगे?
हल्लाराम:
आगे भेजने से पहले पढ़िए। तारीख़, जगह और स्रोत देखिए। संदेह हो तो रुकिए।
के बी व्यास:
आप भी रुकेंगे?
हल्लाराम:
बिल्कुल। अब मेरी हर ख़बर सत्यापित होगी।
(मोबाइल बजता है।)
हल्लाराम:
अरे! सनसनीख़ेज़ संदेश आया है! तुरंत सबको—
के बी व्यास:
पहले पढ़िए सा।
हल्लाराम:
“आपका डेटा पैक समाप्त होने वाला है।”
के बी व्यास:
आज मोहल्ले को सबसे अच्छी ख़बर मिली है!
हल्लाराम:
लेकिन यह संदेश सच है!
के बी व्यास:
क्यों?
हल्लाराम:
क्योंकि इसे भेजने वाला नेटवर्क है, मैं नहीं।
के बी व्यास:
तो आज पहली बार सत्यापन हुआ।
हल्लाराम:
और डेटा बंद होने से पहले एक आख़िरी संदेश भेज दूँ?
के बी व्यास:
किसे?
हल्लाराम:
पूरे मोहल्ले को—“हल्लाराम हड़कम्पी अब ऑफ़लाइन हैं।”
के बी व्यास:
इसे ख़बर मत कहिए सा। इसे सार्वजनिक राहत की अधिसूचना कहिए!
हल्लाराम:
लेकिन अगर लोग पूछें कि मैं कब लौटूँगा?
के बी व्यास:
कह दीजिए—“जब नेटवर्क फिर से गलती करेगा।”
हल्लाराम:
और अगर नेटवर्क ने मुझे हमेशा के लिए बंद कर दिया?
के बी व्यास:
तो पहली बार इतिहास में कोई अफ़वाह नहीं फैलेगी—क्योंकि स्रोत ही समाप्त हो चुका होगा।
(ठहाकों के बीच जिंगल बजता है।)















Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor