लेखक : डीके पुरोहित रेगिस्तानी धोरों की धरती जैसलमेर। जी, हां मैं उस क्षेत्र से आता हूं जहां मेरी मां तालाब से घड़ा भर कर पानी लाती थी। तालाब भी घर से चार किलोमीटर दूर था। तीन चार चक्कर काट कर तीन-चार घड़े पानी घर में आते। उसी से खाना बनता। उसी पानी को पीते … Continue reading राइजिंग भास्कर स्थापना दिवस स्टोरी 6…पानी बचाओ-पीढियां बचाओ…कल पछताना ना पड़े इसलिए आज संभलो…मारवाड़ ने सदा समझा है पानी का मोल, क्यों आप सहमत हैं ना?…
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