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Thursday, April 16, 2026, 1:25 pm

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“एक बच्‍चा छुड़ाया, सैकड़ों अब भी जकड़े हैं: जोधपुर में बाल श्रम पर पुलिस की आंखें मूंदे क्यों?”

रेस्टोरेंट, होटल, चाय की दुकानें, फैक्ट्रियां और अफसरों के घरों में मासूम हाथों से मेहनत करवाई जा रही है, लेकिन कार्रवाई सिर्फ ‘प्रेस नोट’ तक सीमित

डीके पुरोहित. जोधपुर

राजस्थान पुलिस की ‘मानव तस्करी विरोधी यूनिट’ (Anti Human Trafficking Unit – AHTU), जोधपुर पूर्व ने आज एक बार फिर एक सराहनीय लेकिन “अधूरी” कार्रवाई को अंजाम दिया। प्रेस नोट के अनुसार, एक नाबालिग बालक को मानव दुर्व्यवहार व जबरन बाल श्रम से मुक्त करवाया गया। यह कार्रवाई पुलिस कमिश्नर राजेंद्र सिंह और मानव तस्करी विरोधी यूनिट के विशेष निर्देशों पर की गई। टीम को जानकारी मिली थी कि एक सुनार के यहां नाबालिग से जबरन मजदूरी करवाई जा रही थी।

इस कार्रवाई की जितनी सराहना हो, कम है। लेकिन सवाल यह है कि आखिर ऐसी कार्रवाई साल में केवल एक या दो बार ही क्यों होती है? क्या यह अकेला बालक ही था जो जबरन श्रम कर रहा था? क्या बाकी सैकड़ों नहीं, हजारों बाल श्रमिक जोधपुर की गलियों, होटलों, दुकानों और अफसरों के आलीशान घरों में नहीं दिखाई देते?

जोधपुर के बाल श्रमिकों की तस्वीर: हर गली एक चुप चीख

सिर्फ मेड़ती गेट ही नहीं, बल्कि पूरे जोधपुर शहर के हर बाजार, हर मोहल्ले, हर कॉलोनी में बच्चों से मजदूरी करवाई जा रही है:

  • चाय की दुकानों पर ट्रे उठाते बच्चे,
  • होटलों में झूठे बर्तन धोते छोटे हाथ,
  • साइकिल रिपेयरिंग की दुकानों में पंक्चर भरते नंगे पांव किशोर,
  • फैक्ट्रियों और वर्कशॉप में लोहे की चिंगारियों के बीच मजदूरी करते मासूम,
  • और अफसरों के घरों में पोछा, झाड़ू, बर्तन करते बच्चे।

यह सब दृश्य आम हैं। समाज इन पर चुप है, और पुलिस भी।

कहां हैं आंकड़े? कहां है ईमानदार कार्रवाई?

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) के अनुसार, 2023 तक भारत में लगभग 1.1 करोड़ बच्चे बाल श्रमिक थे। राजस्थान का नाम इस सूची में सबसे ऊपर है। लेकिन जोधपुर जैसे शहर में, जहां रोज़ाना हजारों बच्चे श्रम करते दिखते हैं, पिछले 3 वर्षों में मात्र 7–10 बच्चों को ही छुड़ाया जाना संदेहास्पद आंकड़ा नहीं तो और क्या है?

पुलिस की भूमिका पर सवाल

प्रेस नोटों में कार्रवाई का ज़िक्र होता है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही है। सामाजिक कार्यकर्ता विजयलक्ष्मी कहती हैं:

“पुलिस जब चाहती है, तब कार्रवाई कर सकती है। लेकिन अधिकतर मामलों में या तो आंखें मूंद लेती है या रसूखदारों के सामने झुक जाती है। होटल हो या सरकारी अफसरों का घर — कोई सुरक्षित नहीं है बच्चों के शोषण से।”

एक RTI कार्यकर्ता ने बताया कि 2022–2024 के दौरान जोधपुर में पकड़े गए बाल श्रमिकों के मामले में एक भी फैक्ट्री मालिक या होटल संचालक को सजा नहीं मिली।

कैसे चलते हैं ये बाल श्रम नेटवर्क?

बाल श्रमिकों को छोटे जिलों या आदिवासी क्षेत्रों से बहला-फुसलाकर जोधपुर लाया जाता है। उनके मां-बाप को रोज़गार का झांसा दिया जाता है। फिर उन्हें बंधुआ मजदूर जैसा बनाकर दुकानों में काम पर लगा दिया जाता है।

यह एक सुनियोजित नेटवर्क होता है:

  • दलाल बच्चों को लाते हैं,
  • दुकानदार उन्हें ‘कमज़ोर आर्थिक हालात’ का हवाला देकर रख लेते हैं,
  • और पुलिस ‘कोई शिकायत नहीं’ होने का बहाना बनाकर हाथ खींच लेती है।
पुलिस कार्रवाई का पैटर्न: सिर्फ ‘प्रेस रिलीज़’

मानव तस्करी यूनिट की हर कार्रवाई के बाद एक प्रेस नोट जारी किया जाता है। उसमें एक–दो बच्चों के छुड़ाने का ज़िक्र होता है, आरोपियों के खिलाफ FIR होती है, और फिर सब शांत। कई मामलों में तो पुलिस और यूनिट समझौता ही कर लेती है। लेकिन इन प्रेस नोटों से बाल श्रम खत्म नहीं होता।

आखिर क्या है पुलिस की मजबूरी या मंशा?
  1. क्या पुलिस की जांच में केवल वही जगहें आती हैं जहां मीडिया का ध्यान जाता है?
  2. क्या बड़े होटलों, रसूखदार घरों या राजनीति से जुड़े लोगों की दुकानों को अछूता रखा जाता है?
  3. क्यों पुलिस proactive रूप से स्कूलों, NGOs, सामाजिक संस्थानों के साथ मिलकर बाल श्रम विरोधी अभियान नहीं चलाती?
राजनीतिक संरक्षण और पुलिस की चुप्पी

यह बात किसी से छिपी नहीं कि कई रेस्टोरेंट, दुकानों और फैक्ट्रियों के मालिक राजनेताओं या अफसरों के नजदीकी होते हैं। ऐसे में पुलिस की कार्रवाई “चुनिंदा” हो जाती है। यह चुनाव सिर्फ ‘कम ताकतवर’ के खिलाफ होता है। जो गरीब दुकानदार बालक रखता है, उसके खिलाफ कार्रवाई होती है। लेकिन वही काम बड़ा व्यापारी करता है, तो कार्रवाई नहीं होती।

समाज की चुप्पी भी उतनी ही दोषी

पुलिस की निष्क्रियता जितनी चिंताजनक है, उतना ही समाज का मौन भी। हमने बच्चों को चाय परोसते देखा, लेकिन कभी सवाल नहीं किया। हमने मासूम को बर्तन धोते देखा, पर रिपोर्ट नहीं की।

समाज को अब यह समझना होगा कि बाल श्रम सिर्फ ग़रीबी नहीं, एक अपराध है।

आगे की राह क्या होनी चाहिए?
  1. पुलिस को प्रतिदिन निरीक्षण अभियान चलाने चाहिए।
  2. हर दुकान, होटल, फैक्ट्री और घर का रिकॉर्ड बनना चाहिए जहां कर्मचारी काम करते हैं।
  3. बाल श्रम के विरुद्ध टोल फ्री नंबर, मोबाइल ऐप और वॉचडॉग कमेटियां बननी चाहिए।
  4. बाल श्रमिक रखने वालों पर कठोर दंड और लाइसेंस रद्द करने की सजा हो।
  5. हर थाने में बाल संरक्षण अधिकारी अनिवार्य रूप से नियुक्त हो।
प्रेस नोट सिर्फ दिखावा नहीं, सामाजिक बदलाव का दस्तावेज बने- तभी कुछ बलदेगा

एक बच्चा छुड़ाना अच्छा है, लेकिन सैकड़ों को नजरअंदाज करना सबसे बड़ा अन्याय है। जोधपुर को बाल श्रम मुक्त बनाने की राह लंबी जरूर है, लेकिन मुश्किल नहीं — अगर पुलिस ईमानदार हो, समाज जागरूक हो और सरकार इच्छुक हो। प्रेस नोट सिर्फ दिखावा नहीं, सामाजिक बदलाव का दस्तावेज बने — तभी कुछ बदलेगा।

 

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor