(संवित धाम में यज्ञशाला का निर्माण हो रहा है। प्रवेश द्वार चार युगों व चार वेदों के प्रतीक होंगे।)
जोधपुर का पहला महामृत्युंजय कोटि रुद्र यज्ञ 12 जुलाई से, एक माह चलेगा, तैयारियां अंतिम चरण में। यज्ञ से जोधपुर में प्रस्फुटित होगी आध्यात्मिक ऊर्जा, देश के साथ-साथ विदेशों से भी आएंगे साधक। जो नहीं आ पाएंगे, उनके नाम की भी दी जाएंगी आहुतियां
संवित धाम से भरत जोशी की लाइव रिपोर्ट
यज्ञ। साक्षात ईश्वर। वेदों में यज्ञ को ही ईश्वर कहा गया है। आगामी 12 जुलाई से संवित धाम में शुरू हो रहे महामृत्युंजय कोटि रुद्र यज्ञ कलियुग में एक ऐसे यज्ञ की कल्पना की गई है जो चारों युगों का साक्षात अहसास करवाएगा। यह अहसास न केवल जोधपुर के साधकों को होगा, वरन सात समंदर पार से श्रद्धालु और यजमान भी इस महायज्ञ के साक्षी बनेंगे। जो साधक यज्ञ में साक्षात नहीं आ पाएंगे, उनके नाम की भी आहुतियां दी जाएंगी। पहली बार जोधपुर में हो रहे भव्य यज्ञ की तैयारियां अंतिम चरण में हैं। 25 कुंडीय यज्ञ के बारे में बात करें उससे पहले बता दें कि इस यज्ञशाला के चार द्वार होंगे जो चारों युगों और चारों वेदों के प्रतीक होंगे और साधकों को उनके दिग्दर्शन भी करवाएंगे। इस यज्ञशाला का नाम ईश्वर महाकीर्ति रखा गया है। गौरतलब है कि यह संसार ईश्वर की ही महाकीर्ति है और यज्ञ देव उस सर्वशक्तिमान ईश्वर का प्रतिनिधित्व करते हैं। वेदों में तो यज्ञ को ही ईश्वर कहा गया है। इसलिए कह सकते हैं। हे ईश्वर! यज्ञशाला के रूप में आप ही महाकीर्ति फैला रहे हैं…यज्ञ कुंड के चार द्वार- चार युग व चार वेद के प्रतीक होंगे तो 25 कुंड शरीर-आत्मा-ब्रह्मांड का विज्ञान अपने भीतर आत्मसात किए होंगे। इस यज्ञ से जोधपुर की कीर्ति पताका और आध्यात्मिक ऊर्जा पूरे जोधपुर के कण-कण में व्याप्त होने को उत्सुक हैं। संतों और साधकों की पवित्रता से ओत-प्रोत महायज्ञ की तैयारियां जोर-शोर से चल रही हैं।
परमहंस स्वामी ईश्वरानंद गिरि द्वारा स्थापित आश्रम में अध्यात्म की ऊर्जा व्याप्त है
परमहंस स्वामी ईश्वरानंद गिरि महाराज द्वारा दईजर लाछा बासनी में स्थापित संवित धाम आश्रम में 12 जुलाई यज्ञ प्रारंभ हो रहा है। यह आश्रम महाराज की आध्यात्मिक ऊर्जा और तपोबल से प्रफुल्लित हो रहा है और इसकी चारों ओर सौरभ फेल रही है। ऐसे स्थान पर इस महायज्ञ का होना अपने आपमें महान संयोग है। महामृत्युंजय कोटि रुद्र यज्ञ एक माह तक चलेगा और एक माह तक आश्रम में साधकों और संतों का वास जोधपुर के अध्यात्म जगत को नई दिशा देगा।
यज्ञशाला और यज्ञकुंडों पर एक नजर : ऐसी है मान्यता-
1- चार प्रवेश द्वार :
भव्य यज्ञशाला में प्रवेश के लिए चार प्रवेश द्वार बनाए गए हैं। ये चारों द्वार सतयुग, त्रेतायुग, द्वापर युग और कलियुग का प्रतीक होंगे। इतना ही नहीं चार वेदों ऋग्वेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद और सामवेद का प्रतिनिधित्व करते हुए भारतीय सनातन संस्कृति का साक्षात दर्शन भी कराएंगे।
2-ईश्वर महाकीर्ति :
सोमयाजी अग्निहोत्री पंडित नवरतन व्यास के आचार्यत्व में होने वाले यज्ञ के लिए बनाई गई 25 कुंडीय यज्ञशाला का नाम ईश्वर महाकीर्ति रखा गया है। सभी हवन कुंड समचौरस आकृति में बने हैं तथा पांच पांच कुंड की कतार में बनाए गए हैं। समचौरस कुंड प्रकृति कुण्ड कहलाते हैं।
3- 25 कुंडों का महात्म्य :
यज्ञशाला के लिए जो 25 कुंड बनाए गए हैं, उसका अपना महात्म्य हैं, जिसमें 24 कुण्ड 24 तत्व पांच महाभूत, पांच ज्ञानेंद्रिय, पांच कर्मेन्द्रिय, पाँच तन्मात्रा, अंतःकरण चतुष्टय मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार का प्रतीक है, जबकि पच्चीसवां मध्य प्रधान कुण्ड आत्मा का प्रतीक। प्रत्येक कुण्ड में नाभि, कण्ठ, मेखला, योनि, प्रनाल इत्यादि अंग हैं।
महायज्ञ में एक करोड़ महामृत्युंजय मंत्र की आहुतियां दी जाएंगी :
जोधपुर संवित साधनायन सोसायटी की अध्यक्ष रानी उषा देवी ने बताया कि लगातार एक माह तक चलने वाले महामृत्युंजय कोटि रुद्र यज्ञ में एक करोड़ महामृत्युंजय मंत्र की आहुतियां दी जाएंगी । उन्होंने बताया कि अग्निहोत्री पंडित नवरतन व्यास के नेतृत्व में ही दिव्य यज्ञशाला का निर्माण किया गया है, जो पूर्ण रूप से प्राकृतिक पदार्थों से निर्मित है। सभी कुण्ड ईंट गोबर व मिट्टी के गारे से बनाये गए हैं तथा बाँस बल्लियों व सिरकियों से मण्डप बनाया गया है। ईश्वर महाकीर्ति यज्ञशाला के चार द्वारों में पहला पूर्व दिशा का तोरण द्वार जिसका वैदिक नाम सुदृढ़ है जो ऋग्वेद व सतयुग का प्रतिनिधित्व करता है, जिसका संवित नाम धृति द्वार रहेगा। इसी तरह दक्षिण दिशा का तोरण- विकट नाम, यजुर्वेद, त्रेतायुग और संवित नाम शेमुषी गुरु द्वार होगा, जिसमें से सिर्फ गुरु, संत, महात्मा और आचार्य ही प्रवेश करने के अधिकारी हैं। पश्चिम दिशा तोरण सुभीम नाम, सामवेद, द्वापर युग संवित नाम मेधा द्वार तथा उत्तर दिशा तोरण सुप्रभ नाम, अथर्ववेद , कलियुग, संवित नाम श्रीद्वार रखा गया है। तोरण की स्थापना और पूजा सभी विघ्न बाधाओं को रोकने के लिए की जाती हैं।
क्यों महत्वपूर्ण है यज्ञ?
महामृत्युंजय मंत्र से बड़ा कोई मंत्र नहीं माना गया है। यह मंत्र मृत्यु पर भी विजय पाने का अनुष्ठान है। जोधपुर में यह यज्ञ पहली बार हो रहा है। इसकी तैयारियां पिछले एक महीने से भी ज्यादा समय से चल रही हैं। इसमें कई बड़े संत-महात्मा आएंगे और इसके साक्षी विदेशों के शिष्य और साधक भी बनेंगे। इस यज्ञ का महत्व तब और भी बढ़ जाता है जब सावन के महीने में यह आयोजित हो रहा है। संवित धाम जैसी पवित्र स्थली पर हो रहे यज्ञ से जोधपुर के अध्यात्म जगत को नई ऊंचाइयां मिलेंगी।










