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Friday, April 17, 2026, 6:34 am

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ये कैसा बदलाव…”एक समय था… जब विदाई में आंसू आते थे, अब श्मशान में भी नहीं आते”

21वीं सदी में संवेदनाओं की दहलीज पर आए बदलाव को हम किस तकनीक का नाम देंगे? क्या कभी हम विचार करेंगे कि ये बदलाव हमारी नई पीढ़ी में संस्कारों का क्षरण तो नहीं कर रहा…

राइजिंग भास्कर की एडिटर इन चीफ राखी पुरोहित का आलेख

एक समय था, जब हम किसी अपने को रेलवे स्टेशन छोड़ने जाते थे, तो आंखें नम हो जाती थीं, गले रुंध जाते थे, और एक अदृश्य डोर सी खिंच जाती थी दिलों के बीच। वह बिछड़ने का क्षण स्थायी नहीं था, फिर भी वह क्षण भारी लगता था। लेकिन अब 21वीं सदी में, श्मशान में भी आंसू नहीं आते। अंतिम विदाई, जो जीवन की पूर्ण विराम है, वह भी आज “औपचारिकता” बनकर रह गई है। इस कथन में न केवल भावनाओं की ह्रास की पीड़ा छिपी है, बल्कि एक पूरा सभ्यतागत संक्रमण भी प्रकट होता है।

यह आलेख इसी रूपांतरण पर केंद्रित है—कैसे हमने संवेदनाओं को पीछे छोड़, एक यांत्रिक, व्यस्त और आत्म-केंद्रित समाज में खुद को ढाल लिया है।

1. भावनाओं का समय से विदाई लेना

20वीं सदी के उत्तरार्ध तक भारतीय समाज का ताना-बाना रिश्तों की गरमाहट, मोहब्बत और आपसी जुड़ाव से बना हुआ था। संयुक्त परिवार, मेल-जोल, त्योहार, मिलन, बिछोह—ये सभी भावनात्मक निवेश से भरे होते थे। तब “बिदाई” शब्द केवल शादी या मृत्यु से नहीं, बल्कि किसी की थोड़ी देर की गैरमौजूदगी से भी जुड़ जाता था।

रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड या गांव की सरहद तक किसी को छोड़ने जाना एक भावनात्मक रस्म होती थी। वह व्यक्ति लौटेगा, यह जानते हुए भी आंखें भर जाती थीं।

आज, वही बिछोह अगर मृत्यु के रूप में भी सामने आता है, तब भी अधिकतर चेहरों पर भाव नहीं होते—या शायद हों भी, तो वो सिर्फ व्हाट्सएप स्टेटस तक सीमित रह जाते हैं: “RIP”, “Gone too soon” या “Om Shanti”.

2. क्या हम संवेदनशील से संवेदनहीन हो गए हैं?

आज हम मृत्यु को भी “समाचार” की तरह लेते हैं। किसी परिचित की मृत्यु की सूचना मिलते ही सबसे पहले “समय और स्थान” पूछा जाता है — ताकि उपस्थित होने की “योजना” बनाई जा सके। न कोई सन्नाटा, न कोई आत्ममंथन। सिर्फ तारीख, समय और ‘उपस्थित होने’ की बाध्यता।

संवेदनाएं अब “रीयल टाइम” में व्यक्त नहीं होतीं। हम डिजिटल संवेदनाएं भेजते हैं—emoji, शोक संदेश, पोस्ट, और स्टेटस अपडेट। असली रोना, असली सिसकियां, असली पीड़ा अब केवल स्मृतियों का हिस्सा हैं।

3. श्मशान – अब अंतिम गंतव्य नहीं, बल्कि ‘प्रक्रिया’ है

श्मशान कभी मोक्ष का मार्ग था। वहां शोक, स्मृति, और जीवन की क्षणभंगुरता का बोध होता था। अब वह “मोर्ट्युआरी लॉजिस्टिक्स” का हिस्सा बन चुका है।

अक्सर देखा गया है कि अंतिम संस्कार के दौरान लोग मोबाइल पर व्यस्त रहते हैं, व्हाट्सएप पर मीटिंग रद्द करते हैं या अगली यात्रा की योजना बना रहे होते हैं। पहले जहां लोग घंटों बैठकर मृतात्मा की स्मृति में रोते थे, अब अधिकतर 15 मिनट की “शोकसभा” में ही सब निपटा लिया जाता है।

4. व्यस्तता: संवेदनाओं का सबसे बड़ा दुश्मन

21वीं सदी का मानव व्यस्त है—इतना व्यस्त कि उसे अपने ही भीतर झांकने का समय नहीं है। भावनाएं “उत्पादकता” में बाधक मानी जाती हैं।

बच्चे स्कूल से आते हैं, माता-पिता मोबाइल पर व्यस्त होते हैं। कोई शहर छोड़ता है, तो ‘कॉल कर लेना’ कहकर विदाई हो जाती है। कोई हमेशा के लिए चला जाए तो भी ‘शांति से चले गए’ बोलकर सब फिर दिनचर्या में लग जाते हैं।

क्या हमारी आत्मा इतनी अभ्यस्त हो चुकी है कि दुख भी अब “प्रोसेस” बन चुका है? क्या हमें भावनाओं की जगह “प्रोटोकॉल” ने ले ली है?

5. तकनीक: जुड़ाव की जगह दूराव का कारण?

हम अब हर समय “कनेक्टेड” रहते हैं—फिर भी पहले से कहीं अधिक अकेले हैं। वीडियो कॉल, टेक्स्ट मैसेज, और सोशल मीडिया ने रिश्तों को सतही बना दिया है।

जब लोग हर रोज स्क्रीन पर दिखते हैं, तब उनका जाना असली महसूस नहीं होता। उनके ‘डिजिटल अवशेष’ (प्रोफाइल्स, पोस्ट्स) अभी भी जिंदा रहते हैं। इसीलिए अब मृत्यु भी “अपूर्ण” सी लगती है—जैसे किसी का अकाउंट डिलीट हुआ हो, जीवन नहीं।

6. क्या रोना एक कमजोरी बन गया है?

अब हम भावनाओं को ‘प्रदर्शन’ मानते हैं, और रोना ‘कमजोरी’ समझते हैं। विशेषकर पुरुषों में यह प्रवृत्ति और गहरी है:

“मर्द कभी नहीं रोते।”

इस सामाजिक मान्यता ने लाखों आत्माओं को भीतर से जर्जर कर दिया है। लोग रोते नहीं हैं, इसलिए वे टूटते भी नहीं हैं—वे सड़ते हैं।

7. सांस्कृतिक क्षरण – रस्में तो हैं, पर भावना नहीं

हिंदू समाज में ‘श्राद्ध’, ‘तेरहवीं’, ‘प्रार्थना सभा’ जैसी कई परंपराएं थीं जो शोक को सामाजिक रूप से साझा करने का अवसर देती थीं। पर अब वे सब रस्में बन गई हैं—’कैटरिंग’, ‘टेंट’, ‘डीजे के बिना भजन’, और अंतिम भोज की व्यवस्था ने इसे उत्सव सरीखा बना दिया है।

जहां पहले शोक होता था, अब केवल “आयोजन” होता है।

8. समाधान: क्या हम संवेदनशीलता पुनः पा सकते हैं?

यह प्रश्न केवल सामाजिक या मनोवैज्ञानिक नहीं, आध्यात्मिक भी है। जब हम श्मशान में रो नहीं पाते, तो इसका मतलब केवल इतना नहीं कि हम कठोर हो गए हैं, बल्कि यह भी कि हमने जीवन के अर्थ को खो दिया है।

संवेदनशीलता को लौटाने के कुछ उपाय:

  • मौन और ध्यान: स्वयं के भीतर उतरना। मोबाइल और स्क्रीन से दूर रहकर आत्मा की आवाज सुनना।
  • स्लो लाइफ: अपने जीवन की गति को धीमा करना, ताकि हम हर भावना को महसूस कर सकें।
  • रिश्तों में निवेश: न कि सिर्फ बातें करना, बल्कि सुनना और महसूस करना।
  • भावनाओं को स्वीकारना: रोना, हंसना, डरना, दुखी होना – यह सब इंसान होने के प्रमाण हैं। इन्हें दबाइए नहीं।
आंसू बहते क्यों नहीं?

जब भावनाएं दिमाग से नहीं, दिल से आती हैं—तब वे आंसू बनती हैं। लेकिन जब दिल को हमने प्रोजेक्ट्स, डेडलाइन और सोशल मीडिया से भर दिया है, तब आंसू के लिए जगह कहां बचती है?

रेलवे स्टेशन पर रोने वाला समाज इंसानियत का समाज था—जहां अस्थायी बिछड़ाव भी भारी लगता था। और आज जब श्मशान में आंखें सूखी रहती हैं, तो इसका मतलब यह नहीं कि दुख कम है—बल्कि यह संकेत है कि हम अंदर से खाली हो गए हैं।

अब ज़रूरत है उस खालीपन को भरने की—संवेदनाओं से, आत्मचिंतन से, और रिश्तों की गहराई से। ताकि जब अगली बार कोई जाए, तो कम से कम दिल उसे याद कर सके।

“एक समय था जब रोने में भी शांति थी, अब चुप रहने में भी शोर है। शायद हम सबको फिर से इंसान बनना सीखना होगा।”

 

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor