Explore

Search

Friday, April 17, 2026, 3:18 am

Friday, April 17, 2026, 3:18 am

LATEST NEWS
Lifestyle

“सोनिया गांधी: सत्ता का त्याग या त्रासदी से उपजा द्वंद्व?”

एक्सक्लूसिव खोजी रिपोर्ट | लेखक: जेवियर मोरो की किताब ‘द रेड साड़ी’ पर आधारित, आज दूसरी किस्त

डीके पुरोहित. नई दिल्ली, diliprakhai@gmail.com

क्या भारत के सबसे ताकतवर राजनीतिक परिवार की बहू ने सत्ता के सिंहासन को अस्वीकार कर इतिहास रचा था या यह निर्णय व्यक्तिगत पीड़ा और राजनैतिक षड्यंत्रों के बीच उपजा आंतरिक द्वंद्व था? यह सवाल आज फिर से प्रासंगिक हो गया है, क्योंकि जेवियर मोरो की चर्चित किताब “द रेड साड़ी” के आधार पर हमारी खोजी टीम ने जिन दस्तावेज़ों, परिस्थितियों और निर्णयों की कड़ियों को जोड़ा है, वह न सिर्फ देश की राजनीति को झकझोर देगा बल्कि विदेशी कूटनीति और खुफिया हलकों में भी खलबली मचा देगा।

यह कहानी सिर्फ एक महिला के त्याग की नहीं है, बल्कि सत्ता, रक्तरंजित विरासत और ‘गांधी’ नाम की राजनीतिक कीमत की है।

एक फोन कॉल और टूटा हुआ स्तंभ

राजीव गांधी की हत्या के कुछ घंटों बाद, सोनिया गांधी एक भयंकर आघात में थीं। उनके चारों ओर राजनैतिक नेताओं की भीड़ थी जो दुख व्यक्त कर रही थी, मगर उनके चेहरों पर सत्ता के संतुलन की चिंता भी साफ झलक रही थी। जब उनकी मां ने रोम से कहा, “शायद तुम्हें इटली लौट आना चाहिए,” तो सोनिया का मौन ही उनके मन के द्वंद्व की घोषणा था।

यह वही क्षण था जब एक ओर उनके बच्चों की सुरक्षा का सवाल था और दूसरी ओर नेहरू-गांधी परिवार की वह विरासत, जो न केवल कांग्रेस पार्टी की आत्मा थी, बल्कि भारत की धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक व्यवस्था की रीढ़ भी।

गांधी नाम: जिम्मेदारी या अभिशाप?

जब कांग्रेस कार्यसमिति के वरिष्ठ नेता उनके घर पहुंचे और कहा, “आप ही गांधी परिवार की लौ हैं, और इस राष्ट्र की उम्मीद भी,” तो सोनिया ने स्पष्ट किया – “मैं नहीं चाहती कि मेरे बच्चों का भी वही हश्र हो जो राजीव और इंदिरा का हुआ।”

राजनीति से घृणा करने वाली इस महिला को पार्टी का नेतृत्व ‘चांदी की थाली’ में परोसा गया। लेकिन उनकी पहली प्रतिक्रिया थी – “आपने गलत दरवाज़ा खटखटाया है।” उनकी यह बात जितनी सादगी से कही गई, उतनी ही भारत के सत्ता गलियारों में हलचल मचाने वाली थी।

सत्ता के भूखे दरबारियों की बेचैनी

यह वही नेता थे, जो राजीव गांधी के जीवनकाल में दरबार सजाते थे। अब वही नेता अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे थे, क्योंकि कांग्रेस की सत्ता की कुर्सी खाली हो चुकी थी। “आप नहीं लेंगी तो पार्टी टूट जाएगी,” यह बयान महज़ दबाव नहीं था, बल्कि वह रणनीति थी जिससे गांधी नाम को मोहरे की तरह इस्तेमाल किया जा सके।

सोनिया की असहमति: राजनीतिक ‘संन्यास’ या चतुर रणनीति?

“मुझे राजनीति से नफ़रत है,” यह बात सोनिया ने एक से अधिक बार दोहराई। लेकिन क्या यह नफ़रत वाकई उस खतरनाक खेल से थी या उस समय के समीकरणों को समझने वाली एक बुद्धिमती महिला का रणनीतिक विराम?

सोनिया जानती थीं कि सत्ता के खेल में गांधी नाम जितना ताकतवर है, उतना ही घातक भी। “यह नाम जितना विरासत है, उतना ही अभिशाप भी,” उन्होंने कहा। उन्होंने यह भी कहा, “अगर राजीव पायलट ही रहते, तो आज ज़िंदा होते।”

जनता का दबाव और विदेशी चुप्पी

जब उन्होंने आधिकारिक रूप से कांग्रेस अध्यक्ष बनने से इनकार किया और एक पत्र पार्टी को भेजा – “यह समय मेरे बच्चों और मेरे लिए अत्यंत पीड़ादायक है, मैं यह पद स्वीकार नहीं कर सकती” – तब कांग्रेस कार्यकर्ता भौचक्के रह गए। मगर अगले दिन जनपथ 10 के बाहर पोस्टर लहराने लगे: “सोनियाजी अध्यक्ष बनो।”

यह क्या था? जनता का स्वतःस्फूर्त समर्थन या कांग्रेस नेताओं द्वारा सुनियोजित दबाव तंत्र?

इटली के ओर्बासानो में उनके रिश्तेदारों ने राहत की सांस ली: “कम से कम अब उनकी और बच्चों की जान खतरे में नहीं होगी।” लेकिन भारत में सियासी भूचाल आ गया। विदेशी मीडिया में यह सवाल छा गया: “क्या भारत ने एक और गांधी खो दिया?”

नेहरू-गांधी परिवार: राजनीतिक उत्तराधिकार या राष्ट्रीय मजबूरी?

नेहरू से लेकर इंदिरा और राजीव तक, यह परिवार न सिर्फ कांग्रेस बल्कि भारत की आत्मा का प्रतीक बन चुका था। मोरो की किताब में जो वर्णन है, वह इस वंश के साथ भारत के भावनात्मक रिश्ते की पुष्टि करता है। यह मात्र विरासत नहीं थी, यह भारत की राजनीतिक स्थिरता की गारंटी थी।

और इसी वजह से, कांग्रेस कार्यसमिति ने सोनिया से आग्रह किया: “अगर आप नहीं आईं तो भारत बिखर जाएगा।”

कांग्रेस का डर: टूटती हुई पार्टी, उभरता भगवा

यह वह समय था जब कांग्रेस विपक्ष में थी और बीजेपी जैसे हिंदुत्व आधारित दल उभार पर। पार्टी जानती थी कि अगर गांधी परिवार का चेहरा सामने नहीं रहा, तो उनकी विचारधारा और राजनीतिक अस्तित्व दोनों खतरे में पड़ जाएंगे।

क्या यह सोनिया की जीत थी या कांग्रेस की हार?

अंततः, सोनिया ने मना कर दिया। लेकिन पार्टी हार मानने को तैयार नहीं थी। यही कारण था कि आने वाले वर्षों में सोनिया की वापसी होती है, पहले सिर्फ एक ‘बहू’ के रूप में और फिर एक मज़बूत राजनेता के तौर पर। लेकिन यह एक और कहानी है…

आख़िरी सवाल: क्या राजनीति से भागना वास्तव में संभव है?

सोनिया गांधी ने उस दिन मना कर दिया, लेकिन क्या सच में सत्ता उन्हें छोड़ पाई? क्या कांग्रेस पार्टी ने उन्हें बख्शा? और क्या भारत कभी इस परिवार से मुक्त हो सकेगा?

यह सिर्फ एक महिला की कहानी नहीं है। यह भारत की राजनीतिक आत्मा की कहानी है, जो ‘त्याग’ और ‘बलिदान’ जैसे शब्दों में लिपटी होती है लेकिन अंत में उसकी धड़कनें सत्ता के गलियारों में सुनाई देती हैं।

[यह खोजी रिपोर्ट जेवियर मोरो की किताब ‘द रेड साड़ी’ पर आधारित है। इसमें कोई तथ्यात्मक फेरबदल नहीं किया गया है, बल्कि इसे पत्रकारिता के विवेचन और व्यापक विश्लेषण के साथ प्रस्तुत किया गया है। कल पढ़िए तीसरी कड़ी ]

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor