रिपोर्टिंग फ्रॉम विनायका हॉस्पिटल वेटिंग रूम | स्टिंग ऑपरेशन के 7 साल बाद की सच्चाई
डी के पुरोहित. जोधपुर
7 साल पहले मैंने स्टिंग किया था। आज फिर उसी दर्द के बिना दर्द की कहानी में वापस हूं – लेकिन इस बार पूरे सिस्टम की धज्जियां उड़ाने के लिए।
जोधपुर में यदि आपके पेट में हल्का दर्द हो जाए, या न भी हो – बस एक झूठा शक भर पैदा कर दिया जाए – तो आप लाखों रुपए के सर्जरी बिल, बोगस जाँचों और जानलेवा ऑपरेशन का हिस्सा बन सकते हैं।
यह कोई कल्पना नहीं – यह शहर के निजी अस्पतालों में चल रहे एक सुनियोजित लूट तंत्र की सच्ची रिपोर्ट है।
स्टिंग ऑपरेशन: जब मेरे पेट में दर्द था ही नहीं
साल 2017, मैं और एक डिप्टी न्यूज़ एडिटर महावीर राठी एक स्टिंग ऑपरेशन के तहत शहर के एक प्रतिष्ठित डॉक्टर के पास पहुँचे। मैंने सामान्य पेट दर्द की शिकायत की।
जाँच के नाम पर सोनोग्राफी करवाई गई। रिपोर्ट में “पित्त की थैली में पथरी” दर्शा दी गई।
डॉ ने तुरंत कहा – “ऑपरेशन करवाना पड़ेगा। देरी हुई तो खतरनाक होगा।”
लेकिन सच यह था –
🔹 मुझे कभी भी पथरी नहीं थी।
🔹 मैं पूरी तरह स्वस्थ था।
🔹 और अगर मैंने उस वक्त सर्जरी करवा ली होती, तो या तो मेरी जेब कटती – या ज़िन्दगी।
जोधपुर के बड़े निजी अस्पताल: इलाज के नाम पर इंटक टारगेट
शहर के कम से कम 8 प्रमुख मल्टीस्पेशियलिटी अस्पताल, जो रोज़ाना लाखों के बिल काटते हैं, अब “पथरी सर्जरी” को टारगेट प्रॉफ़िट मॉडल बना चुके हैं।
सिस्टम का कामकाज:
- जनरल फिजिशियन से शुरुआत होती है जो “शक” जताकर सोनोग्राफी लिखते हैं।
- सोनोग्राफी सेंटर पहले से सेट होते हैं – रिपोर्ट में “पथरी” दिखाना लगभग तय।
- फिर आपको “इमरजेंसी” बताकर निजी अस्पताल रेफर किया जाता है।
- अस्पताल सर्जरी का दबाव बनाता है:
- “इंफेक्शन फैल सकता है”
- “अंतड़ियों में ब्लॉकेज”
- “फैलने से पहले निकाल दो”
- पैकेज: ₹75,000 से ₹2 लाख तक
- बोनस स्कीम: रेफर करने वाले डॉक्टर को कमीशन, सोनोग्राफर को हिस्सा, अस्पताल को मोटा लाभ।
“डायग्नोसिस डकैती”: जब सोनोग्राफी ही झूठ बोलने लगे
एक स्थानीय सोनोग्राफी तकनीशियन ने नाम न छापने की शर्त पर बताया:
“हमें हर हफ्ते एक कोटा मिलता है – कम से कम 10 ‘पथरी पॉज़िटिव’ रिपोर्ट्स। असल में पता नहीं चलता किसी को है भी या नहीं।”
ऐसे झूठी रिपोर्टिंग से हर महीने 100+ झूठी सर्जरी सिर्फ जोधपुर में की जा रही हैं।
डॉक्टर या डीलर? – नैतिकता की कब्रगाह
पश्चिमी राजस्थान में प्रतिष्ठा रखने वाले कई डॉक्टर अब डीलरों की भूमिका में उतर आए हैं।
वे मेडिकल कंपनियों, निजी अस्पतालों और डायग्नोस्टिक सेंटरों के कॉर्पोरेट एजेंट बन चुके हैं।
एक पूर्व सर्जन ने स्वीकार किया:
“मालिकों का टारगेट है – हर महीने 40 से ज़्यादा पथरी सर्जरी। जो डॉक्टर टारगेट लाता है, उसे बोनस मिलता है।”
बड़े मीडिया घरानों की चुप्पी – विज्ञापन बनाम पत्रकारिता
बड़े निजी अस्पताल सालाना करोड़ों विज्ञापन पर खर्च करते हैं।
वे स्थानीय और राष्ट्रीय अखबारों में “पथरी मुक्ति कैंप” और “एक दिन में इलाज” जैसे भ्रामक विज्ञापन छपवाते हैं।
रिपोर्टर जब असली स्थिति उजागर करता है – तो विज्ञापन की धमकी मिलती है।
यही कारण है कि आज तक इस रैकेट पर कोई राष्ट्रीय डिबेट नहीं हुई।
बिना लक्षण, बिना दर्द, फिर भी ऑपरेशन?
जोधपुर के सरकारी अस्पताल के एक वरिष्ठ सर्जन बताते हैं:
“90% पित्त की थैली की पथरी बिल्कुल बिना लक्षण होती है। उसे छेड़ना ही नहीं चाहिए। लेकिन निजी अस्पताल इसमें सर्जरी कर लाभ कमाते हैं।”
बचपन की पथरी, किशोरों की सर्जरी – क्या यही भविष्य है?
अब 18–25 वर्ष की उम्र में “पथरी” बताकर लैप्रोस्कोपिक सर्जरी करवाई जा रही है।
ये नस्ल वही है जो बिना दर्द, बिना तकलीफ़, सिर्फ “मार्जिन” के लिए ऑपरेट की जा रही है।
वास्तविक केस स्टडीज़: झूठ, सर्जरी और भारी बिल, नाम बदल दिए हैं
- रीटा चौधरी, उम्र 29 – दो निजी डॉक्टरों ने पथरी बताई, सरकारी हॉस्पिटल में कुछ नहीं निकला।
- सुबोध सिंह, उम्र 37 – ऑपरेशन के बाद पता चला कि पथरी 1mm की थी – जो अपने आप निकल सकती थी।
- गुलाबराम, – पेट दर्द था ही नहीं, लेकिन तीन रिपोर्ट्स में पथरी दिखा दी गई।
कार्रवाई क्यों नहीं होती?
- चिकित्सा विभाग के अधिकारी अस्पतालों के पैनल में शामिल हैं।
- हेल्थ रेगुलेटरी कमेटियों की बैठक ही नहीं होती।
- RTI से मिली जानकारी के अनुसार:
“2022 से अब तक किसी भी निजी अस्पताल पर पथरी से जुड़ी सर्जरी की शिकायत में कोई कार्रवाई नहीं हुई।”
कानून की मजबूरी या प्रशासन की मिलीभगत?
राजस्थान में Rajasthan Clinical Establishment Act लागू है लेकिन
इसकी धारा-20 (Misleading Diagnosis & Treatment) का कभी इस्तेमाल नहीं हुआ।
कोई पैनल डॉक्टर कार्रवाई नहीं करता – क्योंकि वे खुद उसी सिस्टम के हिस्से हैं।
लोगों को कैसे बचाएं?
- कोई भी ऑपरेशन करवाने से पहले दूसरी राय जरूर लें।
- सरकारी अस्पतालों की राय को भी प्राथमिकता दें।
- जांच रिपोर्ट पर blind trust न करें – खासकर सोनोग्राफी रिपोर्ट पर।
- लक्षण नहीं हैं तो पथरी को न छेड़ना ही बेहतर।
सार्वजनिक मांग: जाँच की जाए!
हमारी रिपोर्ट की मांग:
- जोधपुर में पिछले 5 साल में हुई पथरी सर्जरी की जांच हो
- सोनोग्राफी सेंटरों के लाइसेंस की समीक्षा हो
- “झूठी रिपोर्टिंग” पर केस दर्ज हों
- निजी अस्पतालों पर निगरानी बोर्ड गठित किया जाए
पत्रकारिता का संकल्प
मैं आज फिर वही स्टिंग करने का मन बना चुका हूँ।
इस बार सिर्फ एक डॉक्टर नहीं – पूरे सिस्टम की चीरफाड़ होगी।
हम नहीं रुकेंगे – क्योंकि सवाल सिर्फ एक पेट की पथरी का नहीं – इस समाज की नैतिकता की पथरी का है।








