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Thursday, April 16, 2026, 9:25 pm

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विधि दाधीच ने लिखा अरंगेत्रम में अपना विधान…दीक्षित हुईं…पहली ही प्रस्तुति में तोड़ा दसों दिशाओं का मौन, घुंघुरुओं ने छुआ आकाश, आंखों के इशारों में उतर आए सात सुरों के सातों सागर

“देवत्व के स्वरूप में विधि दाधीच” : शिवम नाट्यालय का 59वां अरंगेत्रम समारोह

दिलीप कुमार पुरोहित. राखी पुरोहित. भगवान पंवार की विशेष रिपोर्ट

राइजिंग भास्कर लाइव, महालक्ष्मी शिक्षण संस्थान ऑडिटोरियम, जोधपुर से

समय – शाम के सात बजे।

ऑडिटोरियम का परदा अभी उठा नहीं था, मगर घुंघरुओं की छुपी-छुपी झंकारें जैसे पर्दे के पार से ही मन को झकझोर रही थीं। हर चेहरा उत्सुक, हर आंख मंच को ताकती हुई। कुर्सियों की हर कतार में अलग-अलग उम्र, अलग-अलग पृष्ठभूमियों के लोग बैठे थे — मगर एक समानता थी: सब सांस थामे हुए थे। मंच के एक कोने में सुंदर रूप से सजा दीप-स्तंभ जल रहा था और उसके सामने बाईं ओर बैठीं थीं गुरु डॉ. मंजूषा चंद्रभूषण सक्सेना — सौम्यता और तेजस्विता का अद्भुत संगम। और फिर, आया वह क्षण…

पहला स्पंदन – जब घुंघरुओं ने आकाश को ललकारा

जब विधि दाधीच ने मंच पर पहला कदम रखा, तो लगा जैसे दसों दिशाओं ने ताल पकड़ ली हो। शरीर के हर अंग से जैसे वेदना, वीरता और वात्सल्य एक साथ प्रवाहित होने लगे। पुष्पांजलि के माध्यम से शुरू हुआ यह आध्यात्मिक यात्रा का दृश्य — ताल ‘आदितालम’ में समर्पण की पराकाष्ठा थीं।

विधि की आंखें जब दर्शकों से मिलीं, तो हर नज़र झुक गई — शायद उस दृष्टि में कुछ दिव्य था। उनका शरीर कोई माध्यम नहीं, बल्कि साक्षात ब्रह्मांड का प्रतीक बन गया था।

त्रियस्य एकम ताल में अलारिपु, और फिर… हेमावती राग में जटिस्वरम!

जैसे-जैसे प्रस्तुति आगे बढ़ी, त्रियस्य एकम ताल में ‘अलारिपु’ ने शुद्धता और नाद की शक्ति को दर्शाया। फिर जटिस्वरम में जब राग ‘हेमावती’ की तरंगों पर विधि का शरीर थिरका, तो संगीत और गति का ऐसा मेल बना, मानो नदी और चांदनी का आलिंगन हो गया हो।

हर हाथ का इशारा एक श्लोक की तरह था, और हर पांव की थाप एक मंत्र की तरह।

शब्दम में द्रौपदी चीरहरण — सृष्टि के दर्द का मंचन

फिर मंच पर घटा वो दृश्य जिसने संपूर्ण ऑडिटोरियम को मौन कर दिया।

शब्दम में द्रौपदी चीरहरण की कथा जब विधि ने रची, तो कृष्ण की लीला, स्त्री का अपमान, और धर्म की पुकार — सब कुछ बस एक शरीर और दो आंखों के माध्यम से झलक गया। दर्शकों में कुछ लोग आंखें पोंछते दिखे, तो कईयों ने सिर झुका लिया — शायद उस दृश्य में सबका कुछ खो गया था।

“नी इंदा मायम” और फिर पराशक्ति जननी — रसों का महासागर

वर्णम में “नी इंदा मायम” — राग मालिका में विधि ने जब पराशक्ति के शृंगार, वियोग, वीरता और रौद्र रूप को दर्शाया, तो हर दृश्य में जैसे देवी साक्षात प्रकट हो गईं। यह कोई नृत्य नहीं था — यह शरीर में देवी को आमंत्रित करने की क्रिया थी।

ताल ‘आदितालम’ में उनकी भंगिमाओं ने हर रस को जीकर दिखाया — शृंगार रस में सौंदर्य, वियोग में व्यथा, वीर रस में गरिमा और रौद्र में अग्नि।

राग पारस में तिल्लाना — तालियों की गड़गड़ाहट

कार्यक्रम की ऊर्जात्मक चरम सीमा तब आई जब विधि ने राग पारस में तिल्लाना प्रस्तुत किया। पांवों की थापें, हाथों की मुद्राएं और चेहरे की लयात्मकता ने ऐसा समां बांधा कि तालियां रुकने का नाम नहीं ले रही थीं।
बच्चे उछल रहे थे, बुज़ुर्ग मुस्कुरा रहे थे — और कैमरे लगातार क्लिक कर रहे थे।

मंगलम – गुरु वंदना के साथ समापन

कार्यक्रम का समापन हुआ “मंगलम” के साथ। विधि ने झुककर पहले गुरु का आशीर्वाद लिया, फिर दोनों हाथ जोड़ दर्शकों को प्रणाम किया। उस झुकने में विनम्रता थी, आभार था और एक संदेश — “जो कुछ हूं, गुरु के कारण हूं।”

गुरु मंजूषा चंद्रभूषण सक्सेना की शपथ और संदेश

विधि को घुंघरू पहनाते हुए गुरु डॉ. मंजूषा सक्सेना ने उसे भारतीय संस्कृति और गुरु-शिष्य परंपरा निभाने की शपथ दिलाई। उन्होंने बताया कि —

“भरतनाट्यम की परंपरा 2000 ईसा पूर्व से चली आ रही है। गुरुकुल में बालिकाएं वर्षों साधना करती थीं और फिर ‘अरंगेत्रम’ के रूप में उनकी पहली प्रस्तुति होती थी। आज भी यह परंपरा उतनी ही श्रद्धा से निभाई जाती है।”

संस्था की स्थापना 1999 में हुई थी। आज 6 शाखाओं में 500 छात्राएं प्रशिक्षित हो रही हैं, और 58 अरंगेत्रम पूरी कर चुकी हैं। मंजूषा जी अमेरिका, कनाडा, फ्रांस में भी भरतनाट्यम सिखा चुकी हैं।

स्वामी गोविंद देव गिरि जी का भावविभोर संदेश

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि राष्ट्रीय संत स्वामी गोविंद देव गिरि जी महाराज थे।

“मैं तो हनुमान कथा करने जोधपुर आया था… पर विधि का नृत्य देख मन भर आया। भरतनाट्यम मौन में कहे जाने वाली वेदना है। यह एक स्पंदन है, जिसमें अध्यात्म की सारी क्रियाएं समाहित हैं।”

उन्होंने कहा —

“सृष्टि का शिरोमणि स्थान भरतनाट्यम है। जब द्रौपदी को सभा में खींचा जाता है और कृष्ण की कृपा होती है — वह दृश्य शरीर की स्थिति का परम योग है। यही ब्रह्मांड का योग है।”

स्वामीजी ने विधि और गुरु मंजूषा जी का मंच पर अभिनंदन किया।

विधि की गुरु मंजूषा चंद्रभूषण सक्सैना के बारे में जानकारी

शिवम नाट्यम संस्था विगत 26 वर्षों से जोधपुर में भरतनाट्यम के क्षेत्र में लगातार कार्य कर रही है। संस्था की स्थापना 1999 में हुई थी। वर्तमान में 6 शाखाओं में 500 छात्राएं भरत नाट्यम सीख रही हैं और 58 छात्राएं अरंगेत्रम पूरी कर चुकी हैं। भरत नाट्यम गुरु मंजूषा ने अपने गुरु सरोज वैद्यनाथम से शिक्षा दिल्ली में ली थीं। मंजूषा अमेरिका, कनाड़ा और फ्रांस में भी अरंगेत्रम की प्रस्तुति दे चुकी है और विदेशों में 100 बच्चों को भरतनाट्यम सिखा चुकी हैं। उनके पति एयरफोर्स सेवा में पी.सक्सेना उन्हें हमेशा प्रोत्साहित करते रहे हैं। मंजूषा को 2010 में भास्कर वुमन ईयर अवार्ड सहित अनेक अवार्ड मिल चुके हैं। मंजूषा ने भरत नाट्यम की जटिलताओं को दूर कर उसे सरल और सौम्य बनाया है। वर्तमान में वे आईआईटी में गेस्ट फैकल्टी के रूप में सेवाएं दे रही हैं। कार्यक्रम में श्री हरिप्रसाद व्यास, श्री आनंद राठी, श्री सुरेश राठी, डिस्ट्रिक्ट जज पूर्ण शर्मा, हर्षचंद्र भूषण, सौम्यचंद्र भूषण अतिथि के रूप में उपस्थित थे।

इस अवसर पर स्वामी गोविंद देव गिरि ने विधि और उसकी गुरु मां मंजूषा का अभिनंदन किया। राठी परिवार ने स्वामी गोविंद देव गिरि महाराज का अभिनंदन किया। इस मौके पर विधि के पिता कृष्णकांत त्रिवेदी और माता मधु त्रिवेदी ने विधि की गुरु मंजूषा का अभिनंदन किया।

आनंद राठी और सुरेश राठी ने बालिका को आशीर्वाद देते हुए उसके सुनहरे भविष्य की शुभकामनाएं दी व शिवम नाट्यालय की इस पहल को सराहा और उम्मीद जताई कि आने वाले समय में जोधपुर राजस्थान में भरतनाट्यम के लिए जाना जाएगा। श्री हरि प्रसाद व्यास ने कहा कि किसी ख्याति प्राप्त संस्था से अरंगेत्ररम करना मायने रखता है। यह डिग्री देश में ही नहीं विदेशों में भी महत्वपूर्ण है। श्री आनंद राठी ने गुरु शिष्य की इस परंपरा को सराहा और नाट्यालय की शिष्यायों को भविष्य में इसी तरह से भारतीय संस्कृति से जुड़े रहने की सलाह दी। श्री सुरेश राठी ने विधि और उसके माता-पिता को बधाई देते हुए भविष्य की शुभकामनाएं दी। साथ ही भारतीय संस्कृति की इस धरोहर को बचाए रखने और इसे नई पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए संस्था की सराहना की। शिष्या की माता श्रीमती मधु त्रिवेदी और पिता श्री कृष्ण कुमार त्रिवेदी ने सभी अतिथियों का स्वागत एवं आभार प्रकट किया। संचालन ममता सिंह और संस्थान की सीनियर छात्राओं द्वारा किया गया। कार्यक्रम के आरंभ में राठी परिवार के साथ ही अतिथियों ने दीप प्रज्वलित किया। इस दौरान चंद्रा बूब, शीला आसोपा, शकुंतला जैन, फूलकंवर मूंदड़ा, सुरेश राठी की धर्म पत्नी शशि राठी सहित शहर के अनेक गणमान्य लोग मौजूद थे।

विधि दाधीच का विशेष इंटरव्यू (LIVE)

1. नाम: विधि दाधीच
2. माता-पिता: मधु त्रिवेदी और कृष्णकांत त्रिवेदी
3. भरतनाट्यम प्रशिक्षण: 5 साल की उम्र से, अब 11 साल हो चुके हैं
4. भरतनाट्यम क्या है?: “पूजा है।”
5. क्यों चुना?: रुचि थी, मगर इसे प्रोफेशन नहीं बनाना
6. भविष्य की योजना?: पढ़ाई में आगे बढ़ना
7. अवार्ड?: नित्यांजलि, आकृति, अयोध्या सहित 50+ अवार्ड
8. मंच प्रस्तुति: अजमेर (2 बार), अयोध्या (1 बार), DPS व जोधपुर के अन्य मंच
9. फिर जन्म मिला तो?: “फिर से अरंगेत्रम करना चाहूंगी।”
10. आदर्श: स्वामी गोविंद देव गिरि जी, प्रेरणा त्रिवेदी, माता-पिता, भाई इशित व उदित डागा

 

 

 

 

 

 

 

 

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor