11 दिसंबर—अंतरराष्ट्रीय पर्वतारोहण दिवस पर विशेष स्टोरी
अक्षय हौसलों की उड़ान ने अक्षय गौड़ को शिखर पर रहने की दी सोच…चोटी उनके आगे बौनी हो जाती है। वे सीने में फौलाद, कदमों में सफलता के निशां और दिल में तिरंगा रखते हैं…हिन्दुस्तान को शिखर पर देखना ही उनका सपना है…पर्वतारोहण का शौक जुनून के हद तक है…खतरों से खेलने के हुनर ने उन्हें कभी निराश नहीं किया, बिजनेस भी यही सोच उन्हें सफल बनाती गई…एक रिपोर्ट-
दिलीप कुमार पुरोहित. जोधपुर
9783414079 diliprakhai@gmail.com
11 दिसंबर यह सिर्फ़ एक तारीख़ नहीं, बल्कि उस जज़्बे का उत्सव है जो इंसान को ऊंचाइयों की ओर खींचता है—जहां सांसें पतली हो जाती हैं, रास्ते कठिन होते हैं और हर क़दम चुनौती बन जाता है। पर्वतारोहण मानव साहस का चरम रूप है; यहां इंसान जोखिम से आंख मिलाता है, प्रकृति की कठोरता को स्वीकार करता है और अपनी सीमाओं को बार-बार पीछे छोड़ता है। यही वजह है कि पर्वत केवल चट्टानों का ढेर नहीं, बल्कि आत्मानुशासन, धैर्य और अटूट इच्छाशक्ति की पाठशाला होते हैं।
पर्वतों पर चढ़ना मानो अपने भीतर की पहाड़ियों को फतह करना है। तेज़ हवाएँ मन को परखती हैं, बर्फ़ीली रातें इरादों को, और अनिश्चित मौसम आत्मविश्वास को। कई बार एक गलत कदम गिरावट बन सकता है—शरीर ही नहीं, हौसलों की भी। लेकिन इंसान, साहस के हथियार से लैस होकर, इन्हीं खतरों के बीच अपनी हॉबी और जुनून पूरा करता है। यही वह जगह है जहां एडवेंचर महज़ शौक़ नहीं रहता, जीवन-दर्शन बन जाता है।
इसी एडवेंचर की दुनिया में एक नाम लगातार चमकता है—जोधपुर के युवा व्यवसायी और अंतरराष्ट्रीय पर्वतारोही अक्षय गौड़। जिनके लिए पर्वत सिर्फ़ चढ़ने की चीज़ नहीं, बल्कि राष्ट्रप्रेम, समाजसेवा और प्रेरणा का मंच हैं।
बचपन से पहाड़ों का बुलावा
कहा जाता है, कुछ आवाज़ें बचपन में ही दिल में घर कर लेती हैं। अक्षय गौड़ के लिए वह आवाज़ पर्वतों की थी। ऊंचाइयां उन्हें लुभाती रहीं—कभी तस्वीरों में, कभी कहानियों में। समय के साथ यह आकर्षण दृढ़ संकल्प में बदला। व्यवसायिक दुनिया में सक्रिय रहते हुए भी उन्होंने एडवेंचर को जीवन से अलग नहीं किया; बल्कि उसे उद्देश्य के साथ जोड़ा।
अक्षय मानते हैं कि पर्वतारोहण महज़ व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, सामाजिक बदलाव का माध्यम भी हो सकता है। यही सोच उन्हें विशिष्ट बनाती है—वे चढ़ते हैं, लेकिन साथ लेकर; जीतते हैं, तो समाज को जोड़कर।
पतासलू पर्वत: जहां साहस ने इतिहास लिखा
पतासलू पर्वत—सुंदर, लेकिन उतना ही कठोर। यहां की पगडंडियां पत्थरीली हैं, मौसम पल-पल बदलता है और ऊंचाई के साथ सांसों की लय टूटने लगती है। इसी पर्वत पर अक्षय गौड़ ने वह कर दिखाया, जो सिर्फ़ इरादों से ही संभव होता है—10 दिव्यांग बच्चों के साथ कठिन चढ़ाई और शिखर पर 101 फीट का तिरंगा।
चढ़ाई के दौरान विपरीत परिस्थितियां लगातार परीक्षा लेती रहीं। कहीं अचानक आई बर्फ़ीली हवा ने काफ़िले को रोक दिया, कहीं ढलान पर फिसलन ने संतुलन बिगाड़ा। ऊंचाई बढ़ते ही ऑक्सीजन कम होने लगी; कुछ बच्चों की सांसें तेज़ हो गईं। ऐसे में अक्षय की भूमिका सिर्फ़ पर्वतारोही की नहीं रही—वे मार्गदर्शक, मनोबल बढ़ाने वाले और सुरक्षा कवच बनकर सामने आए। हर ठहराव पर वे बच्चों से बात करते, उन्हें लक्ष्य याद दिलाते—कि यह चढ़ाई सिर्फ़ सामना जीतने की नहीं, खुद पर जीत की है।
और फिर वह पल आया—शिखर। ठंडी हवाओं के बीच 101 फीट का तिरंगा लहराया। दृश्य सिर्फ़ मनोहारी नहीं था, ऐतिहासिक था। लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड में दर्ज हुई यह उपलब्धि बताती है कि जब जुनून समाजसेवा से जुड़ जाए, तो असंभव संभव हो जाता है।
सम्मान, पर उससे बड़ा दायित्व
ऐसी उपलब्धियां सिर्फ़ रिकॉर्ड नहीं बनातीं, प्रेरणा गढ़ती हैं। राजस्थान पुलिस के तत्कालीन डीजीपी रविप्रकाश मेहरड़ा और ह्यूमन राइट्स के तत्कालीन कमिश्नर किशनजी ने जयपुर पुलिस मुख्यालय में अक्षय गौड़ को सम्मानित किया। यह सम्मान उनके साहस का था—और उस मानवीय दृष्टि का भी, जिसमें दिव्यांग बच्चों की भागीदारी केंद्र में रही। अक्षय के लिए यह क्षण गर्व का था, पर उससे भी बड़ा दायित्व—कि आगे का रास्ता और व्यापक होना चाहिए।
चोटियां बौनी होती गई, तिरंगा शान से लहराता रहा :
अक्षय का तिरंगे से प्रेम हर चढ़ाई में झलकता है। हिमाचल के हमता पास पर तिरंगा लहराना हो या 16 हज़ार फीट ऊँचे बारालाचा ला पास पर—हर बार लक्ष्य सिर्फ़ शिखर नहीं, संदेश रहा: भारत की भावना हर ऊँचाई पर अडिग है।
इन अभियानों में मौसम की बेरुख़ी अक्सर सामने आती है। हमता पास पर अचानक बदली ने रास्ता ढक दिया; दृश्यता कम हो गई। बारालाचा ला की ठंडी हवाओं और तापमान ने शरीर की ऊर्जा को तेज़ी से चूसा। फिर भी, सही प्रशिक्षण, अनुशासन और मानसिक दृढ़ता ने हर बाधा को पीछे छोड़ा। तिरंगा फहराया गया—और उसके साथ देश का मान।
नेपाल से मिली पहचान
अक्षय की उपलब्धियां सीमाओं में बंधी नहीं। नेपाल में भी विभिन्न संस्थाओं ने उन्हें सर्टिफिकेट देकर सम्मानित किया। यह अंतरराष्ट्रीय पहचान बताती है कि साहस की भाषा वैश्विक होती है—जहां ईमानदार प्रयास को हर जगह आदर मिलता है।
किलिमंजारो मिशन: बिना सप्लीमेंट ऑक्सीजन, दौड़कर फतह करने का सपना
(दक्षिणी अफ्रीका की सबसे ऊंची चोटी किलिमंजारो जिसे अब अक्षय दौड़कर फतेह करेंगे।)
अब अक्षय गौड़ की निगाहें अफ़्रीका की सबसे ऊंची चोटी—किलिमंजारो पर हैं। लक्ष्य स्पष्ट और चुनौती अतुल—बिना सप्लीमेंट ऑक्सीजन के, दौड़ते हुए किलिमंजारो को फतह करना और नया विश्व रिकॉर्ड रचना। यह महज़ चढ़ाई नहीं, सहनशक्ति, गति और मानसिक मज़बूती का चरम परीक्षण है।
किलिमंजारो की ढलानें लंबी हैं, ऊँचाई के साथ ऑक्सीजन का स्तर तेज़ी से गिरता है। बिना सप्लीमेंट ऑक्सीजन दौड़ना—यह शरीर की हर प्रणाली को चरम पर ले जाता है। अक्षय इस चुनौती के लिए विशेष ट्रेनिंग ले रहे हैं—हाई-एल्टीट्यूड कंडीशनिंग, एन्ड्यूरेंस रन, श्वसन अभ्यास और मानसिक दृढ़ता की तैयारी। उनका विश्वास है कि सही तैयारी और अनुशासन से असंभव भी साकार हो सकता है।
(किलिमंजारो फतेह करने के लिए अक्षस हॉर्स राइडिंग, साइकिलिंग और स्विमिंग का कठोर अभ्यास कर रहे हैं।)
यह मिशन इसलिए भी ऐतिहासिक होगा क्योंकि वे पहले व्यक्ति होंगे जो दौड़कर किलिमंजारो फतह करेंगे—और शिखर पर तिरंगा लहराएंगे। राष्ट्रप्रेम उनके हर क़दम में धड़कता है।
एडवेंचर, अनुशासन और मानव-मन
पर्वतारोहण हमें सिखाता है कि जोखिम से खेलना लापरवाही नहीं—अनुशासन है। हर रस्सी, हर क़दम, हर विराम—सोच-समझकर। अक्षय की यात्राएं इसी संतुलन का उदाहरण हैं। वे बताते हैं कि एडवेंचर की असली जीत डर को नज़रअंदाज़ करना नहीं, बल्कि उसे समझकर आगे बढ़ना है।
दिव्यांग बच्चों के साथ चढ़ाई ने यह भी सिद्ध किया कि सीमाएं अक्सर दिमाग़ में होती हैं। सही मार्गदर्शन और विश्वास मिले, तो संभावनाएं फैल जाती हैं। अक्षय का मिशन तभी पूरा होता है जब उनकी सफलता दूसरों के लिए रास्ता बन जाए।
अंतरराष्ट्रीय पर्वतारोहण दिवस: क्यों ज़रूरी
11 दिसंबर पर्वतारोहण के वैश्विक महत्व की याद दिलाता है—कि यह खेल नहीं, आत्म-निर्माण है। पर्वत पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी देते हैं। पर्वतारोही जानते हैं कि प्रकृति से संघर्ष नहीं, सामंजस्य चाहिए। अक्षय भी अपने अभियानों में इस संवेदनशीलता को प्राथमिकता देते हैं—कम से कम हस्तक्षेप, अधिक सम्मान।
जोधपुर से दुनिया तक
(पतासलू पर 101 फीट तिरंगा फहराकर लौटने के बाद जोधपुर में दिव्यांगों के साथ अक्षय का भव्य स्वागत किया गया। )
रेत, धूप और धैर्य की धरती जोधपुर से निकलकर अक्षय गौड़ ने दुनिया के पर्वतों पर अपनी छाप छोड़ी है। वे राजस्थान ही नहीं, पूरे हिंदुस्तान में जोधपुर का नाम रोशन कर रहे हैं। उनके लिए व्यवसाय जीवन का हिस्सा है, लेकिन उद्देश्य—मानवता, देश और प्रेरणा।
जब ठान लिया तो कुछ भी असंभव नहीं: प्रेरणा की ऊंचाई
अक्षय गौड़ की कहानी हमें याद दिलाती है—पर्वत पर चढ़ना है तो पर्वत-सा हौसला चाहिए। यह हौसला तैयारी से बनता है, अनुशासन से चमकता है और सेवा से अर्थ पाता है। 11 दिसंबर को, जब दुनिया अंतरराष्ट्रीय पर्वतारोहण दिवस मनाए, तो अक्षय जैसे लोगों को याद करना हमें सिखाता है कि असंभव शब्द सिर्फ़ तब तक है—जब तक किसी ने ठान न लिया हो।
जब अगली बार किसी शिखर पर तिरंगा लहराएगा—तो वह सिर्फ़ कपड़ा नहीं होगा। वह विश्वास होगा कि इंसान, अगर चाहे, तो ऊंचाइयों से भी दोस्ती कर सकता है।
Author: Dilip Purohit
Group Editor

















