कवि : एनडी निंबावत “सागर”
शिव स्तुति
आँखें मूंदे, ध्यान लगाए।
देखो बैठे हैं शिव शंकर जी।।
जटा से निकले, पावन गंगा।
चाँद सजे है,शिव शंकर जी।।
रुद्राक्ष की माला है गले में।
नागदेव देखे है शिव शंकर जी।।
पास गढ़ा है शस्त्र त्रिशूल जिस पर।
डमरू लटके है शिव शंकर जी।।
चारों तरफ है, हरे वृक्षों की कतार।
फूल खिले हैं, शिव शंकर जी।।
सावन का आज,है सोमवार।
तुम्हे हम पूजे हैं, शिव शंकर जी।।
कवयित्री नीलम व्यास “स्वयंसिद्धा”
शिव मनाइए
ओम नमो शिवा गौरी,
मैं दीन हीन हूँ भोरी,
द्वार तेरे आई आज,
पूज के मनाइए।
धूप दीप आरती से,
आक धतूरा बेल से,
नित अभिषेक करूँ,
शिव गुण गाइए।
भोले मेरे शिव नाथ,
शीश पर रखे हाथ,
शिव नाम रट रही,
रोग को भगाइए।
सावन सोमवार है,
पावन त्योहार है,
व्रत पूजन करती ,
मन बस जाइए।।
शिव से विनय
गिरिजा पति सुन लो,
अवगुण को गुन लो,
निर्मल चित्त करके,
भक्ति जगाइए।
दीन हीन रोगिणी हूँ,
दुख भय की ऋणी हूँ,
मन का संताप हरो,
क्लेश को नशाइए।
आऊँ शिवालय रोज,
पूजन से बढ़े ओज,
सोमवार व्रत करूँ,
भक्ति उर पाइए।
प्रभु सदाशिव मेरे,
मिटते जन्मों के फेरे ,
मुझको तार दो शिव,
दीपक जलाइए।।
आई तेरे द्वार भोले
आई तेरे द्वारे भोले,
भेद जिया के है खोले,
भटक रहा मन है,
भक्ति की है कामना।
सुन ले पुकार दाता,
दीन दुखी दर आता,
मेरी सुध ले लो स्वामी,
पूरण हो साधना।
चित को एकाग्र मांगू,
कीर्तन रात मैं जागू,
सुमिरिनि दिन राती,
शुद्ध मन भावना।
तन का दीपक मानो,
बाती उर की ही जानो ,
ओमकार जाप होता,
संकट में थामना।।
शिव वंदन
खड़ी हूँ हाथ फैलाए,
शिव तेरे द्वार आई,
सच्ची भक्ति देकर के,
जीवन को तारना।
जप तप नहीं जानूँ,
व्रत पूजन ना होते,
साँसों की लय पर ही,
प्राण को है वारना।
अंतःकरण शुद्ध हो,
विषय भोग हो नाश,
मन बसी है मूरत ,
कर्म को सुधारना।
सुनो मेरे भोले नाथ,
तन मन है अर्पण,
भक्त मन की पुकार,
सुन के विचारना।।
शिव स्तुति
शिव भोले अर्ज सुनो,
मन की बातों को गुनो,
रो रो करूँ विनती मैं,
मिलने को आइए।
जीवन लागे सूना क्यों,
मन का संताप हरो,
शिव शरण में ले लो ,
करुणा ही लाइए।
जटा बिच गंग धार,
शिव जीवन आधार,
नित अभिषेक करूँ,
सुख बरसाइए।
हृदय कमल जानो,
आसन मान विराजो,
पल पल सुमिरन ,
नेह उर पाइए।।








