चर्चा : राजस्थान बार काउंसिल चुनाव 22 अप्रैल को: करीब 60 हजार वकील चुनेंगे 25 सदस्य, युवा अधिवक्ताओं की आय बढ़ाना बनेगा सबसे बड़ा मुद्दा, राइजिंग भास्कर के 19 सुझाव जिससे बढ़ सकती है आय
विडंबना : राजस्थान में 80 प्रतिशत वकीलों की आय कोर्ट के चपरासी से भी कम, नई बार काउंसिल से उम्मीद—19 ठोस सुधारों से बदलेगा अधिवक्ताओं का भविष्य
वकीलों के लोकतंत्र का महत्वपूर्ण चुनाव
दिलीप कुमार पुरोहित. जोधपुर
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राजस्थान में अधिवक्ताओं की सर्वोच्च संस्था बार काउंसिल ऑफ राजस्थान के चुनाव 22 अप्रैल को आयोजित होने जा रहे हैं। लंबे समय के बाद होने वाले इन चुनावों को लेकर प्रदेशभर के वकीलों में उत्साह और उम्मीद दोनों है। राज्य के हजारों अधिवक्ता मतदान कर परिषद के 25 सदस्यों का चयन करेंगे। चुनाव के बाद यही सदस्य परिषद के चेयरमैन, उपाध्यक्ष सहित अन्य पदों का चुनाव करेंगे और अधिवक्ताओं के हित से जुड़े महत्वपूर्ण निर्णय लेंगे।
हालांकि इस बार का चुनाव केवल औपचारिक प्रक्रिया नहीं माना जा रहा, बल्कि यह अधिवक्ताओं के भविष्य से जुड़ा बड़ा मुद्दा बन गया है। इसका कारण है—राजस्थान में बड़ी संख्या में वकीलों की आर्थिक स्थिति का कमजोर होना। इसके अलावा राइजिंग भास्कर एक और मुद्दा बार काउसंल के सामने रखना चाहता है। हाल ही में वकील गोरधन सिंह के प्रकरण के बाद राइजिंग भास्कर का बड़ा मुद्दा यही है कि अगर कोई वकील सच्चाई और न्याय की जंग लग रहा हो तो उसे बार से बर्खास्त या निलंबित करने का अधिकार बार की कार्यकारिणी को डायरेक्ट ना होकर समस्त 60 हजार वकीलों की ऑनलाइन रायशुमारी से यह निलंबन या बर्खास्तगी तय हो। इसलिए बार काउंसिल के संविधान में संशोधन होना चाहिए और इसी मुद्दे पर वकीलों को वोट देना चाहिए। अगर ऐसा होता है तो युवा वकीलों का शोषण रुकेगा और बार के कथित कद्दावर और ताकतवर वकीलों की दादागिरी रुकेगी। इसलिए राइजिंग भास्कर इस मुद्दे पर प्रदेश के वकीलों का ध्यान आकर्षित करना चाहता है कि दो मुद्दों पर यह चुनाव निर्णायक हों। एक तो किसी भी वकील को बर्खास्त या निलंबन का अधिकार बार की कार्यकारिणी को ना होकर समस्त वकीलों की राय पर आधारित हो और युवा वकीलों की आय बढ़ाने के लिए कम से कम 19 ठोस उपायों पर गोर किया जाए जो राइजिंग भास्कर यहां बता रहा है।
कई सर्वेक्षणों और अधिवक्ताओं के अनुभव बताते हैं कि प्रदेश में लगभग 80 प्रतिशत वकीलों की मासिक आय कोर्ट के चपरासी से भी कम है। ऐसे में इस बार चुनाव का सबसे बड़ा मुद्दा युवा वकीलों की आय बढ़ाने और उनके भविष्य को सुरक्षित करने का बन गया है।
राजस्थान में कितने वकील करेंगे मतदान
राजस्थान में बार काउंसिल के साथ पंजीकृत अधिवक्ताओं की संख्या लगातार बढ़ रही है। अनुमान के अनुसार राज्यभर में लगभग 60 हजार से अधिक अधिवक्ता बार काउंसिल में पंजीकृत हैं और इनमें से अधिकांश इस चुनाव में मतदान करने के पात्र होंगे।
इनमें शामिल हैं:
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राजस्थान हाईकोर्ट के अधिवक्ता
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जिला एवं सत्र न्यायालयों के अधिवक्ता
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उपखंड व तहसील स्तर के न्यायालयों में प्रैक्टिस करने वाले अधिवक्ता
मतदान के लिए अधिवक्ता का नाम बार काउंसिल की मतदाता सूची में होना आवश्यक होता है।
बार काउंसिल में कितने सदस्य होते हैं
बार काउंसिल ऑफ राजस्थान में कुल 25 निर्वाचित सदस्य होते हैं।
इसके अतिरिक्त राज्य के एडवोकेट जनरल पदेन सदस्य के रूप में परिषद का हिस्सा होते हैं। इन 25 सदस्यों का चुनाव प्रदेशभर के अधिवक्ता करते हैं और यही परिषद आगे चलकर अपने बीच से प्रमुख पदों का चयन करती है।
चुनाव के बाद किन पदों का होता है चयन
जब परिषद के 25 सदस्य चुने जाते हैं तो बाद में परिषद की बैठक में निम्न पदों का चयन किया जाता है:
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चेयरमैन
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वाइस चेयरमैन
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को-चेयरमैन
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बार काउंसिल ऑफ इंडिया के प्रतिनिधि
ये पद बार काउंसिल के संचालन और नीतिगत निर्णयों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
बार काउंसिल की भूमिका
बार काउंसिल अधिवक्ताओं की नियामक और कल्याणकारी संस्था है। इसका गठन Advocates Act 1961 के तहत किया गया था।
इसके प्रमुख कार्य हैं:
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अधिवक्ताओं का पंजीकरण
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प्रैक्टिस सर्टिफिकेट जारी करना
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अधिवक्ताओं के आचरण की निगरानी
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अनुशासनात्मक कार्रवाई
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वकीलों के लिए कल्याणकारी योजनाएं
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न्याय व्यवस्था में सुधार के लिए सुझाव देना
वकीलों के कल्याण के लिए चल रही योजनाएं
बार काउंसिल अधिवक्ताओं के हित में कई योजनाएं संचालित करती है। इनमें प्रमुख हैं:
1. अधिवक्ता कल्याण कोष
इस योजना के तहत अधिवक्ताओं को आर्थिक सहायता प्रदान की जाती है।
2. मृत्यु सहायता
किसी अधिवक्ता के निधन पर उसके परिवार को आर्थिक सहायता दी जाती है।
3. चिकित्सा सहायता
गंभीर बीमारी के मामलों में अधिवक्ताओं को मेडिकल सहायता दी जाती है।
युवा वकीलों की आर्थिक स्थिति क्यों कमजोर
आज राजस्थान में बड़ी संख्या में युवा अधिवक्ता न्यायालयों में प्रैक्टिस शुरू करते हैं, लेकिन शुरुआती वर्षों में उन्हें कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
प्रमुख कारण
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मुकदमों की सीमित संख्या
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अनुभवी वकीलों का वर्चस्व
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क्लाइंट की कमी
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आर्थिक सुरक्षा का अभाव
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प्रशिक्षण और मार्गदर्शन की कमी
इन कारणों से युवा वकीलों की आय बेहद कम रह जाती है।
युवा वकीलों की आय बढ़ाने के लिए 19 ठोस सुझाव
यदि बार काउंसिल ऑफ राजस्थान ठोस कदम उठाए तो युवा अधिवक्ताओं की आर्थिक स्थिति में बड़ा सुधार हो सकता है।
1. स्टाइपेंड योजना लागू करना
नए अधिवक्ताओं को शुरुआती 3 से 5 वर्षों तक मासिक स्टाइपेंड दिया जाए।
2. सरकारी केस का समान वितरण
सरकारी मुकदमों को कुछ चुनिंदा वकीलों तक सीमित रखने के बजाय युवा वकीलों को भी दिया जाए।
3. लीगल एड केस का विस्तार
मुफ्त कानूनी सहायता वाले मामलों को अधिक संख्या में युवा वकीलों को सौंपा जाए।
4. डिजिटल लॉ प्लेटफॉर्म
बार काउंसिल एक डिजिटल प्लेटफॉर्म बनाए जहां वकील ऑनलाइन केस प्राप्त कर सकें।
5. कॉर्पोरेट और स्टार्टअप लॉ प्रशिक्षण
युवा वकीलों को कॉर्पोरेट कानून, साइबर लॉ और स्टार्टअप कानून की ट्रेनिंग दी जाए।
6. न्यूनतम फीस नीति
कुछ मामलों में न्यूनतम फीस तय की जाए ताकि वकीलों की आय सुरक्षित रहे।
7. मेंटरशिप प्रोग्राम
वरिष्ठ वकीलों को युवा वकीलों के साथ जोड़कर मेंटोरशिप कार्यक्रम शुरू किया जाए।
8. विधिक परामर्श केंद्र
बार काउंसिल शहरों में लीगल कंसल्टेशन सेंटर शुरू करे जहां से वकीलों को केस मिल सकें।
9. सरकारी पैनल में अवसर
सरकारी विभागों के कानूनी पैनल में युवा वकीलों को शामिल किया जाए।
10. डिजिटल कोर्ट ट्रेनिंग
ई-कोर्ट और ऑनलाइन सुनवाई के लिए युवा वकीलों को विशेष प्रशिक्षण दिया जाए।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि युवा वकीलों को आर्थिक रूप से मजबूत नहीं बनाया गया तो न्याय व्यवस्था पर भी इसका असर पड़ेगा।
क्योंकि:
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प्रतिभाशाली युवा इस पेशे को छोड़ सकते हैं
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न्यायिक प्रक्रिया कमजोर हो सकती है
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कानूनी सेवाओं की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है
इसलिए बार काउंसिल को इस दिशा में गंभीर कदम उठाने की जरूरत है।
चुनाव से जुड़ी उम्मीदें
22 अप्रैल को होने वाले चुनाव से अधिवक्ताओं को बड़ी उम्मीदें हैं। प्रदेशभर के वकील चाहते हैं कि नई परिषद केवल औपचारिक काम न करे बल्कि अधिवक्ताओं की वास्तविक समस्याओं को समझकर समाधान निकाले। विशेष रूप से युवा अधिवक्ता चाहते हैं कि उनकी आय और पेशेवर भविष्य को सुरक्षित बनाने के लिए नई नीतियां बनाई जाएं। राजस्थान बार काउंसिल के चुनाव केवल प्रतिनिधियों के चयन तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह अधिवक्ताओं के भविष्य की दिशा तय करने वाला महत्वपूर्ण अवसर है। राज्य के लगभग 60 हजार अधिवक्ता मतदान कर 25 सदस्यीय परिषद का गठन करेंगे। नई परिषद के सामने सबसे बड़ी चुनौती होगी—युवा वकीलों की आर्थिक स्थिति को सुधारना। यदि परिषद ठोस नीतियां बनाकर स्टाइपेंड, प्रशिक्षण, केस वितरण और डिजिटल प्लेटफॉर्म जैसी पहल करती है तो निश्चित रूप से राजस्थान में अधिवक्ताओं की स्थिति बेहतर हो सकती है। और तब यह कहा जा सकेगा कि बार काउंसिल केवल एक संस्था नहीं, बल्कि अधिवक्ताओं के भविष्य को सुरक्षित करने वाली मजबूत व्यवस्था है।
सत्य की जंग में : 60 हजार अधिवक्ता तय करें किसे बर्खास्त या निलंबित करना है…
न्याय व्यवस्था में वकील केवल एक पेशेवर व्यक्ति नहीं होता, बल्कि वह समाज में सत्य और न्याय की लड़ाई लड़ने वाला एक महत्वपूर्ण स्तंभ होता है। जब कोई अधिवक्ता अन्याय, भ्रष्टाचार या सत्ता के दुरुपयोग के खिलाफ खड़ा होता है, तो वह केवल अपने मुवक्किल की नहीं बल्कि व्यापक सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ रहा होता है। लेकिन कई बार ऐसा भी देखने में आया है कि जब कोई वकील सत्ता, बड़े संगठनों या प्रभावशाली संस्थाओं से टकरा जाता है, तो उसके अपने पेशे की संस्थाएं भी उसका साथ छोड़ देती हैं।
इसी संदर्भ में राइजिंग भास्कर मुद्दा अधिवक्ता समुदाय के भीतर एक गंभीर बहस का विषय बन गया है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या किसी भी वकील को निलंबित या निष्कासित करने का अधिकार केवल बार काउंसिल की कार्यकारिणी के हाथ में होना चाहिए, या फिर इस निर्णय में पूरे अधिवक्ता समुदाय की भागीदारी होनी चाहिए।
राजस्थान में लगभग 60 हजार से अधिक अधिवक्ता पंजीकृत हैं। ऐसे में यदि किसी वकील पर अनुशासनात्मक कार्रवाई करनी हो तो क्या यह उचित नहीं होगा कि इसका निर्णय केवल कुछ पदाधिकारियों के बजाय पूरे अधिवक्ता समुदाय की राय से लिया जाए? कई अधिवक्ताओं का मानना है कि यदि बार काउंसिल की कार्यकारिणी को ही अंतिम अधिकार दे दिया जाए तो कई बार यह निर्णय निष्पक्ष नहीं रह पाता। सत्ता, राजनीतिक दबाव या बड़े संगठनों के प्रभाव में कभी-कभी ऐसे फैसले लिए जाने के आरोप भी लगते रहे हैं।
इतिहास गवाह है कि जब भी कोई वकील सत्ता या बड़े आर्थिक हितों से टकराता है, तो उसे कई प्रकार के दबावों का सामना करना पड़ता है। ऐसे मामलों में यदि बार काउंसिल भी उसका साथ छोड़ दे और उसी के खिलाफ कार्रवाई कर दे, तो यह न्याय और लोकतंत्र की भावना के विपरीत माना जा सकता है।
इसी कारण अब यह सुझाव सामने आ रहा है कि किसी भी वकील को निलंबित या निष्कासित करने का अधिकार केवल बार की कार्यकारिणी को नहीं होना चाहिए। इसके बजाय एक ऑनलाइन रायशुमारी प्रणाली लागू की जा सकती है, जिसमें राज्य के सभी पंजीकृत अधिवक्ता अपनी राय दे सकें। यदि लगभग 60 हजार वकीलों की बहुमत राय किसी कार्रवाई के पक्ष में हो तभी उस पर अमल किया जाए। डिजिटल युग में यह प्रक्रिया तकनीकी रूप से कठिन नहीं है। आज ऑनलाइन मतदान या रायशुमारी के माध्यम से पारदर्शी और लोकतांत्रिक निर्णय लेना संभव है। इससे दो बड़े फायदे होंगे। पहला, किसी भी वकील के खिलाफ कार्रवाई पूरी तरह पारदर्शी होगी। दूसरा, यह सुनिश्चित होगा कि किसी एक समूह या कार्यकारिणी की मनमर्जी से किसी अधिवक्ता का करियर प्रभावित न हो।
बेशक यह भी जरूरी है कि पेशे की गरिमा और अनुशासन बनाए रखने के लिए नियमों का पालन हो। लेकिन यह भी उतना ही जरूरी है कि सत्य और न्याय के लिए संघर्ष कर रहे वकीलों को अनुचित दबाव का शिकार न होना पड़े। इसलिए समय की मांग है कि बार काउंसिल की संरचना और नियमों में ऐसे सुधार किए जाएं जिससे निर्णय प्रक्रिया अधिक लोकतांत्रिक, पारदर्शी और निष्पक्ष बन सके। यदि किसी अधिवक्ता के भविष्य का फैसला पूरे अधिवक्ता समुदाय की सामूहिक राय से होगा, तो न केवल संस्थागत विश्वास बढ़ेगा बल्कि यह व्यवस्था न्याय और स्वतंत्रता के मूल सिद्धांतों को भी मजबूत करेगी।








