1-
लोकतंत्र भाषा के बिना
बटुआ रूपयों के बिना !
हां रहते जेब में ही है।।
2.
पता चले देश की हंसती हुई संसद को
मैं मर चुका हूं ।।
मेरे मरे जिस्म से मांस-नोच कर
खा रहे हैं आरोप
हवाई जहाज कह रहा है कान में
घर में धीमे सांस लो।।
3.
इतने बड़े-बड़े धर्मात्मा
पत्ते तक थिर हो जाते हैं जिनके नाम से
उनके रहते भाषा के प्रश्न अधूरे हैं।
शुक काग कोयल क्या इतने बुरे हैं कि वे सोहम की जगह
मां बहन की गालियां निकलेंगे
अपने ही वतन में कर देंगे गैर
वाह भाषा तेरा प्यार
वाह भाषा तेरा वैर।।
4.
उलगुलान उलगुलान
33 प्रकार के देवताओं की भारत माता
84 लाख योनियां धारण किए
जने तो सही कोई राज के खिलाफ
कोई बागी
उलगुलान उलगुलान
समझ बैठा कोई
आत्ममुग्ध हम सबको
दागी
परिवार परिवार से लड़ रहे हैं भारतीय अजीब चक्कर में पड़ रहे हैं कविता सीख रहे हैं नारों के लिए नाइट हाल्ट बन गए हैं हत्यारों के लिए
प्रेम अब सूने पड़े मकान के महंगे बिस्तरों पर होता है
हीर का किस्सा गलियों में रोता है कवि बछड़े को गोद में लेकर
कविता का पता खोज रहे हैं
और धर्मगुरु बिजली के भगवान की सोच रहे हैं।
कविता और धर्म की राजनीति में ठंन गई है
वोटर लिस्ट दिल्ली पुलिस बन गई है हर कोई तफ्तीश में जुटा है
वोटर कितना होता है घुटा है
हर कोई सत्ताधारी दल की
बॉडी लैंग्वेज को जीवन में ढाल देगा और लोकतंत्र के मायनों को
5 साल आगे उछाल देगा
उलगुलान उलगुलान
कोई अ-वोटर बागी पैदा कर जननी अब यह पहाड़ ज्यादा दोहराया नहीं जाता
जैसे अधिनायक के रंग से हर कोई बौराया
वैसे बोराया नहीं जाता।।
-प्रमोद कुमार शर्मा









