बोलना ऐसा हो, जिसमें अहंकार नहीं, आत्मीयता हो; चोट नहीं, चेतना हो; विवाद नहीं, संवाद हो।
राइजिंग भास्कर डेस्क. जोधपुर
बोलना केवल शब्दों का उच्चारण नहीं, बल्कि अपने संस्कारों, विचारों और व्यक्तित्व को प्रकट करने की कला है। इसलिए बोलते समय शब्दों का चयन उतना ही आवश्यक है, जितना भावों की पवित्रता। ऐसा बोलें कि सत्य भी कहा जाए और किसी के सम्मान को ठेस भी न पहुंचे। मधुर वाणी रिश्तों में विश्वास जगाती है, कठोर वाणी दूरी बढ़ाती है। बोलने से पहले विचार करें—क्या यह सत्य है, क्या यह आवश्यक है और क्या इसे प्रेम से कहा जा सकता है? बोलना ऐसा हो, जिसमें अहंकार नहीं, आत्मीयता हो; चोट नहीं, चेतना हो; विवाद नहीं, संवाद हो।