| आइडिया एवं क्यूरेटर : केबी व्यास, दुबई वर्ड्स ऑफ इंटरव्यू : आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस प्रजेंट : दिलीप कुमार पुरोहित. राइजिंग भास्कर |
| ♪ ढम… ढम… टण… टण… टणकार… ♪ घोषणा:आप सुन रहे हैं — ऑन द स्पॉट एफ.एम. 102.4,जहाँ सवाल सीधे पूछे जाते हैं और जवाब इतने टेढ़े मिलते हैं कि सवाल खुद अपने घर लौट जाए! के बी व्यास:नमस्कार सा… राम-राम सा… खम्मा घणी सा! आज हमारे स्टूडियो में पधारे हैं एक ऐसी महान विभूति, जिनके आने से पहले ही स्टूडियो का एयर-कंडीशनर बंद कर दिया गया है। कारण? क्योंकि ये स्वयं की बातें सुना सुना कर हवा में लंबी लंबी छोड़ते हैं कि बिजली विभाग ने कहा है—“इनको अपने पास बैठा लो, ए.सी. की क्या ज़रूरत है!” स्वागत कीजिए—बातों के बादशाह, दावों के सुल्तान, डींगों के अंतरराष्ट्रीय वितरक और हवा में ही बिना बात के फूँ-फ़ाँ करने वाले— श्रीमान फूँ फ़ाँ चंद जी! फूँ फ़ाँ चंद:देखिए व्यास जी, सबसे पहले मैं आपकी एक बात सुधार दूँ। मैं डींग नहीं मारता। मैं केवल अपनी उपलब्धियाँ बताता हूँ। के बी व्यास:लेकिन फूँ-फ़ाँ चंद जी, समस्या यह है कि आपकी उपलब्धियाँ सुनते-सुनते सामने वाला बूढ़ा हो जाता है। फूँ फ़ाँ चंद:बड़ा आदमी हूँ ना! मेरी उपलब्धियाँ भी बड़ी हैं। के बी व्यास:नाम आपका फूँ फ़ाँ चंद कैसे पड़ा? फूँ फ़ाँ चंद:बचपन से ही व्यक्तित्व प्रभावशाली था। जब मैं पैदा हुआ, डॉक्टर ने मुझे देखकर कहा— “वाह! क्या बच्चा है!” मैंने तुरंत कहा— “डॉक्टर साहब, यह तो कुछ भी नहीं, आगे देखिएगा!” के बी व्यास:मतलब पैदा होते ही डींग मारना शुरू? फूँ फ़ाँ चंद:डींग नहीं, आत्मविश्वास! के बी व्यास : ओह, ऐसा क्या ? फूँ फ़ाँ चंद: इस आत्मविश्वास से ही तो रिश्ते में एक नाम मेरे नाम से पड़ा है- फूफा । मुझे कोई पूछता नहीं, इसीलिए तो मुझे हर शादी में मुँह फुलाना पड़ता है। के बी व्यास:अच्छा, आपकी पढ़ाई कहाँ तक हुई? फूँ फ़ाँ चंद:मैंने स्कूल में इतना ज्ञान प्राप्त कर लिया था कि टीचर भी मुझसे परेशान रहते थे। के बी व्यास:कौन-सी कक्षा तक? फूँ फ़ाँ चंद:कक्षा आठवीं तक। के बी व्यास:फिर? फूँ फ़ाँ चंद:फिर मैंने शिक्षा व्यवस्था को स्वतंत्र कर दिया। के बी व्यास:मतलब स्कूल छोड़ दिया? फूँ फ़ाँ चंद:आप पत्रकार लोग हर बात को नकारात्मक तरीके से क्यों कहते हैं? मैंने स्कूल नहीं छोड़ा।मैंने स्कूल को अपने बिना आगे बढ़ने का अवसर दिया। के बी व्यास:वाह! और स्कूल ने खुशी-खुशी वह अवसर स्वीकार कर लिया होगा। फूँ फ़ाँ चंद:प्रधानाचार्य ने तो बाकायदा कहा था— “बेटा, अब तुम बाहर की दुनिया देखो।” के बी व्यास:ये विदाई थी या निष्कासन? फूँ फ़ाँ चंद:शब्दों में मत जाइए, भावना देखिए। के बी व्यास:चंद जी, सुना है आप हर विषय के विशेषज्ञ हैं? फूँ फ़ाँ चंद:बिल्कुल। राजनीति हो, अर्थव्यवस्था हो, क्रिकेट हो, मौसम हो, विवाह हो, तलाक हो, योग हो, शेयर बाज़ार हो—मैं हर विषय पर सलाह देता हूँ। के बी व्यास:कोई आपकी सलाह माँगता भी है? फूँ फ़ाँ चंद:माँगे या ना माँगे, ज्ञान को रोकना पाप है। के बी व्यास:यानि आप चलते-फिरते ‘अनचाहे हवाई सलाह केंद्र’ हैं? फूँ फ़ाँ चंद:आप मज़ाक समझ रहे हैं। पिछले सप्ताह शर्मा जी ने नई कार खरीदी। मैंने तुरंत कहा—“गलत कार खरीदी है।” के बी व्यास:आपको कारों का ज्ञान है? फूँ फ़ाँ चंद:नहीं। के बी व्यास:तो गलत कैसे? फूँ फ़ाँ चंद:इतनी महँगी कार मेरे बिना पूछे खरीदी—गलत तो हुई ना! के बी व्यास:फूँ फ़ाँ चंद जी, आपकी सबसे बड़ी प्रतिभा क्या है? फूँ फ़ाँ चंद:मैं किसी भी विषय पर बिना जानकारी के लगातार दो घंटे बोल सकता हूँ। के बी व्यास:यह प्रतिभा है? फूँ फ़ाँ चंद:आजकल सबसे कामयाब प्रतिभा यही है। कोई जानकारी की आवश्यकता नहीं बस इधर उधर की हवा में बोलते रहें, बीच बीच में विषय का नाम ले लें बस । के बी व्यास:आप सोशल मीडिया पर भी बहुत सक्रिय हैं? फूँ फ़ाँ चंद:बहुत ज़्यादा । सुबह उठकर सबसे पहले पच्चीस लोगों को ज्ञान देता हूँ। “जल्दी उठिए।” “व्यायाम कीजिए।” “मोबाइल कम चलाइए।” “समय का सदुपयोग कीजिए।” के बी व्यास:आप कितने बजे उठते हैं? फूँ फ़ाँ चंद:करीब दस बजे। के बी व्यास:व्यायाम? फूँ फ़ाँ चंद:मोबाइल चार्जर लगाने के लिए बेड से उठता हूँ। के बी व्यास:और मोबाइल कम चलाने वाली पोस्ट? फूँ फ़ाँ चंद:वह मैं दिन में चार-पाँच बार डालता हूँ ताकि लोग याद रखें। के बी व्यास:चंद जी, आपने जीवन में कभी अपनी गलती स्वीकार की? फूँ फ़ाँ चंद:बिल्कुल। के बी व्यास:कब? फूँ फ़ाँ चंद:एक बार मैंने कहा था कि मुझसे गलती नहीं होती। बाद में महसूस हुआ—ऐसा कहना मेरी गलती थी। क्योंकि वास्तव में मुझसे कभी गलती होती ही नहीं। के बी व्यास:ओय तेरी तो ! स्टूडियो में कोई खिड़की खोलो, फूँ-फ़ाँ का स्तर बढ़ता जा रहा है। फूँ फ़ाँ चंद जी, घर में आपकी बात सुनी जाती है? फूँ फ़ाँ चंद:मेरी पत्नी मेरा बहुत सम्मान करती है। के बी व्यास:कैसे? फूँ फ़ाँ चंद:मैं कुछ कहता हूँ तो वह चुप हो जाती है। के बी व्यास:फिर? फूँ फ़ाँ चंद:फिर मैं भी चुप हो जाता हूँ। के बी व्यास:क्यों? फूँ फ़ाँ चंद:क्योंकि वह चुप होकर मुझे जिस तरह देखती है… उसमें बहुत गहरा संदेश होता है। के बी व्यास:हा हा हा बड़े समझदार आदमी हैं आप। फूँ फ़ाँ चंद:देखिए, शादी ने मुझे बहुत कुछ सिखाया है। पहले मैं हर बहस जीतना चाहता था।( और मुस्कुरा के कहते हैं)अब मुझे पता है कि जीवित रहना अधिक महत्वपूर्ण है। के बी व्यास:अंत में हमारे श्रोताओं को कोई संदेश देना चाहेंगे? फूँ फ़ाँ चंद:बस यही कि जीवन में आत्मविश्वास रखिए।अगर आपको किसी विषय की जानकारी नहीं है तो घबराइए मत।थोड़ा ऊँचा बोलिए।दो-चार अंग्रेज़ी शब्द डालिए।चेहरे पर गंभीरता रखिए।और बीच-बीच में कहिए— “आप शायद मेरी बात समझ नहीं रहे हैं।” सामने वाला खुद मान लेगा कि गलती उसी की है। के बी व्यास:वाह फूँ फ़ाँ चंद जी!आज आपने सिद्ध कर दिया कि ज्ञान होना और ज्ञानी दिखाई देना—दो बिल्कुल अलग व्यवसाय हैं। और मित्रों, यदि आपके आसपास भी कोई व्यक्ति बिना पूछे सलाह देता हो, हर विषय का विशेषज्ञ बनता हो, हवा में लंबी लंबी छोड़ता हो, अपनी तारीफ़ स्वयं करता हो और बात-बात पर— “मेरे ज़माने में…” “मैंने तो पहले ही कहा था…” “आपको पता नहीं है…” कहना शुरू कर दे— तो समझ जाइए… फूँ फ़ाँ चंद की आत्मा उसके अंदर प्रवेश कर चुकी है! फूँ फ़ाँ चंद:व्यास जी, एक बात और बताऊँ? के बी व्यास:नहीं फूँ फ़ाँ चंद जी! देश के पास समय सीमित है। ♪ टण… टण… ढम… ढम… ♪ के बी व्यास:आप सुन रहे थे —ऑन द स्पॉट एफ.एम. 102.4 जहाँ मेहमान बोलते हैं…और होस्ट मन ही मन प्रार्थना करते हैं, कि ये कब तक अपनी चरखी चलाते रहेंगे। मैं हूँ आपका अपना— के बी व्यास। फिर मिलेंगे एक और ऐसी शख्सियत के साथ,जिन्हें दुनिया शायद न जानती हो…लेकिन वे स्वयं को पूरी दुनिया से कम भी नहीं मानते! राम-राम सा… खम्मा घणी सा | |
