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Sunday, October 18, 2026, 5:14 am

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Lifestyle

ऑन द स्पॉट एफ.एम. 102.4 पर दसवां इंटरव्यू चटर पटर चंद का केबी व्यास के साथ

आइडिया एवं क्यूरेटर : केबी व्यास, दुबई
वर्ड्स ऑफ इंटरव्यू : आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस
प्रजेंट : दिलीप कुमार पुरोहित. राइजिंग भास्कर

ऑन द स्पॉट एफ.एम. 102.4के बी व्यास के साथ—चटर पटर चंद का धमाकेदार इंटरव्यू
(जिंगल बजता है।)
“बातों की रेल, हँसी का सफ़र,यहाँ हर ख़बर में थोड़ा नमक, थोड़ी शक्कर!”
के बी व्यास:नमस्कार सा! राम-राम सा! खम्मा घणी सा!
आप सुन रहे हैं “ऑन द स्पॉट एफ.एम. 102.4”। आज हमारे स्टूडियो में ऐसे मेहमान पधारे हैं, जिनसे बातचीत करने के लिए सवाल नहीं, ब्रेक चाहिए। इनके मोहल्ले में लोग घड़ी देखकर नहीं, इनकी बात ख़त्म होने पर सोते हैं। पिछले मंगलवार की बातचीत अभी तक चल रही है!
स्वागत कीजिए—बोलने के बेताज बादशाह, चुप्पी के कट्टर विरोधी, श्री चटर पटर चंद जी!
(तालियाँ बजती हैं।)
चटर पटर चंद:धन्यवाद, व्यास जी! मगर परिचय थोड़ा छोटा रह गया। आपने मेरी सामाजिक सेवाएँ, पारिवारिक उपलब्धियाँ, बचपन की प्रतिभा और राष्ट्रीय स्तर की—
के बी व्यास:बस सा! बाकी परिचय अगले तीन रविवारों को सुनाएँगे। पहले बताइए, आपका नाम चटर पटर चंद कैसे पड़ा?
चटर पटर चंद:बचपन में मेरा नाम चंद्रप्रकाश था। लेकिन मैं इतना बोलता था कि प्रकाश पीछे रह गया और चटर-पटर आगे निकल गई। माँ कहती थीं, “बेटा, कुछ खा भी लिया कर।” मैं कहता था, “माँ, बीच में मत टोको, अभी पड़ोस वाली घटना अधूरी है।”
के बी व्यास:पहली बार कब बोले थे?
चटर पटर चंद:घरवाले कहते हैं, बहुत जल्दी।
के बी व्यास:पहला शब्द क्या था?
चटर पटर चंद:“दरअसल…”
के बी व्यास:बच्चे तो माँ-पापा बोलते हैं, आपने बोला – दरअसल! 
चटर पटर चंद:वो सामान्य बच्चे होते हैं। मुझे शुरू से अपनी स्थिति स्पष्ट करनी थी।
के बी व्यास:स्कूल में आपकी सबसे बड़ी उपलब्धि?
चटर पटर चंद:पूरी कक्षा को एकजुट करना।
के बी व्यास:वाह! कैसे?
चटर पटर चंद:जैसे ही मैं बोलता था, सब एक साथ कहते थे—“चुप!”
के बी व्यास:अध्यापक क्या कहते थे?
चटर पटर चंद:एक दिन बोले, “चटर पटर, तुम्हारे पास हर बात का जवाब क्यों रहता है?” मैंने कहा, “सर, सवालों के साथ मुझे बचपन से अन्याय होता दिखाई दिया है। बेचारे अकेले खड़े रहते हैं।”
के बी व्यास:फिर?
चटर पटर चंद:उन्होंने मुझे कक्षा के बाहर खड़ा कर दिया। वहाँ दूसरी कक्षा के बच्चों की समस्याएँ सुनने लगा। प्रधानाचार्य आए तो बोले, “यहाँ सभा किसने बुलाई?”

के बी व्यास:सुना है, आपकी शादी में पंडित जी परेशान हो गए थे?
चटर पटर चंद:अरे व्यास जी, मैं तो केवल विधि समझ रहा था। उन्होंने कहा, “वचन दीजिए।” मैंने पूछा, “मौखिक या लिखित? इसकी अवधि क्या है? नियमों में संशोधन कौन करेगा?”
के बी व्यास:आपकी पत्नी ने क्या कहा?
चटर पटर चंद:कहा, “पहले शादी कर लो, बाकी जवाब घर पहुँचकर मिलेंगे।”
के बी व्यास:मिले?
चटर पटर चंद:इतने मिले कि अब मैं घर में केवल आवश्यक सूचनाएँ देता हूँ।
के बी व्यास:जैसे?
चटर पटर चंद:“जी।” “अभी लाया।” “मेरी गलती थी।”
के बी व्यास:गलती किसकी होती है?
चटर पटर चंद:व्यास जी, आप इंटरव्यू कर रहे हैं या मेरा घर तुड़वा रहे हैं?
के बी व्यास:आप बाज़ार में भी बहुत बोलते हैं?
चटर पटर चंद:कल सब्ज़ी लेने गया। पूछा, “टमाटर इतने महँगे क्यों?” दुकानदार बोला, “मौसम की मार है।” मैंने मौसम, खेती, परिवहन और अर्थव्यवस्था पर अपना दृष्टिकोण समझाया।
के बी व्यास:दाम कम हुए?
चटर पटर चंद:उसने दो टमाटर मुफ़्त देकर कहा, “दृष्टिकोण घर जाकर समझाना।”
के बी व्यास:तो आपकी बातों का आर्थिक लाभ भी है!
चटर पटर चंद:बिल्कुल! लेकिन अगले दिन उसने बोर्ड लगा दिया—“चर्चा करने वाले ग्राहकों के लिए अलग दर।”
के बी व्यास:मोबाइल पर आपका व्यवहार कैसा है?
चटर पटर चंद:मैं छोटे वॉइस मैसेज भेजता हूँ।
के बी व्यास:कितने छोटे?
चटर पटर चंद:बारह-तेरह मिनट।
के बी व्यास:यह छोटा है?
चटर पटर चंद:पूरी बात सैंतालीस मिनट की होती है। मैं संपादन करता हूँ।
के बी व्यास:लोग सुनते हैं?
चटर पटर चंद:एक दोस्त ने जवाब दिया—“पहला भाग सुन लिया। दूसरे भाग में अपराधी कौन निकलता है?”
के बी व्यास:आप क्या बता रहे थे?
चटर पटर चंद:कि मैं शाम को चाय पीने नहीं आ पाऊँगा।
के बी व्यास:इतना लंबा संदेश क्यों?
चटर पटर चंद:कारण बताना ज़रूरी है। कारण की पृष्ठभूमि होती है। पृष्ठभूमि का इतिहास होता है। इतिहास में मेरे चाचा—
के बी व्यास:चाचा को वहीं रहने दीजिए सा!
के बी व्यास:क्या कभी आपकी बातों से कोई काम बिगड़ा?
चटर पटर चंद:एक नौकरी का इंटरव्यू था। अधिकारी ने कहा, “अपने बारे में दो मिनट बताइए।”
के बी व्यास:आपने क्या कहा?
चटर पटर चंद:मैंने पूछा, “दो मिनट में केवल प्रस्तावना सुनेंगे या विषय-सूची भी?”
के बी व्यास:नौकरी मिली?
चटर पटर चंद:उन्होंने कहा, “हम आपको फ़ोन करेंगे।”
के बी व्यास:कब की बात है?
चटर पटर चंद:सात साल पहले की। लगता है मेरे परिचय पर अभी विचार चल रहा है।
के बी व्यास:श्रोताओं के लिए कोई उपयोगी सलाह?
चटर पटर चंद:ज़रूर। किसी समारोह में खाना जल्दी चाहिए तो प्लेट लेकर चुपचाप लाइन में लगिए।
के बी व्यास:आप ऐसा करते हैं?
चटर पटर चंद:पहले नहीं करता था। पिछली शादी में पुलाव की लाइन में खड़ा होकर चावल का इतिहास बता रहा था। जब तक इतिहास समाप्त हुआ, पुलाव भी इतिहास बन चुका था।
के बी व्यास:फिर क्या खाया?
चटर पटर चंद:रायता।
के बी व्यास:बस?
चटर पटर चंद:और अपनी गलती का एहसास।
के बी व्यास:आपको सबसे अधिक डर किससे लगता है?
चटर पटर चंद:दाँतों के डॉक्टर से।
के बी व्यास:दर्द के कारण?
चटर पटर चंद:नहीं! मुँह खुला रहता है, फिर भी बोल नहीं सकता। पिछली बार डॉक्टर ने कहा, “आराम से बैठिए।” मैंने पूछा, “आराम से सुनने की भी व्यवस्था है?”
के बी व्यास:क्या जवाब मिला?
चटर पटर चंद:उन्होंने मुँह में रुई रख दी।
के बी व्यास:और आप चुप हो गए?
चटर पटर चंद:नहीं सा, इशारों से समझाने लगा। डॉक्टर बोले, “दाँत का इलाज करूँ या आपकी प्रेस कॉन्फ़्रेंस में प्रश्न पूछूँ?”
के बी व्यास:आप कभी चुप रहने का अभ्यास करते हैं?
चटर पटर चंद:हाँ। एक दिन मौन रखने का संकल्प लिया था।
के बी व्यास:कितनी देर निभाया?
चटर पटर चंद:पूरे ग्यारह मिनट।
के बी व्यास:फिर क्या हुआ?
चटर पटर चंद:पड़ोसी ने पूछ लिया, “आज इतने चुप क्यों हो?” अब संकल्प का उद्देश्य समझाना मेरा नैतिक कर्तव्य था।
के बी व्यास:समझाने में कितना समय लगा?
चटर पटर चंद:वह दोपहर को पूछने आया था। शाम को उसकी पत्नी लेने आई।
के बी व्यास:इतना बोलने के पीछे कोई गंभीर कारण भी है?
चटर पटर चंद:है सा। मुझे खाली बैठे चेहरे अच्छे नहीं लगते। लगता है, कुछ कहूँ तो सामने वाला मुस्कुरा दे। लेकिन अब समझ रहा हूँ कि कभी-कभी उसे मुस्कुराने से पहले अपनी बात कहने का अवसर चाहिए।
के बी व्यास:यह समझ कैसे आई?
चटर पटर चंद:एक दिन मेरा दोस्त उदास था। मैं उसे हँसाने के लिए किस्से सुनाता रहा। आखिर उसने कहा, “चटर पटर, आज मेरी सुन ले।”
मैं चुप हुआ। पहली बार पता चला कि वह कई दिनों से परेशान था। उस दिन मेरी सबसे अच्छी बातचीत वही रही, जिसमें मैंने सबसे कम बोला।
के बी व्यास:तो अब क्या बदलेंगे?
चटर पटर चंद:बातों में थोड़ा विराम दूँगा। सामने वाले की बात पूरी होने दूँगा। हर चुप्पी भरना ज़रूरी नहीं है।
के बी व्यास:बहुत सुंदर सा! आज आपने हँसाया भी और सोचने का अवसर भी दिया। अब आख़िरी प्रश्न—आपके जीवन का मूल मंत्र?
चटर पटर चंद:“बोलिए दिल खोलकर, सुनिए कान खोलकर, और खाना खाइए समय देखकर!”
(हँसी और तालियाँ।)
के बी व्यास:शुक्रिया, चटर पटर चंद जी! श्रोताओं, अब कार्यक्रम समाप्त—
चटर पटर चंद:एक छोटी-सी बात और…
के बी व्यास:कितनी छोटी?
चटर पटर चंद:बस, उसका संदर्भ समझाना पड़ेगा।
के बी व्यास:संगीत लगाइए सा! संदर्भ अगले सप्ताह सुनेंगे!
(जिंगल के बीच चटर पटर चंद की आवाज़ आती है।)
चटर पटर चंद:अरे, मेरी चाय तो मँगवाइए! चुप रहने से गला सूख गया!
के बी व्यास:आपका गला चुप रहने से नहीं सा—चाय को बोलने का अवसर न देने से सूखा है!
(ठहाकों के साथ कार्यक्रम समाप्त।
Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor