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Sunday, October 18, 2026, 5:14 am

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सर्वश्रेष्ठ रचना : हनुमान अंश की चमत्कारिक सफलता : Gen X के दादा और Gen Z के पुत्तर के बीच संवाद

-डॉ. अरविंद कुमार पुरोहित-

8290639891 purohitak2016@gmail.com

(डॉ. अरविंद कुमार पुरोहित)
(प्रतियोगिता में डॉ. अरविंद कुमार पुरोहित की रचना सर्वश्रेष्ठ पाई गई। आपको 11 अक्टूबर को मीरा और मोहन साझा संकलन के लोकार्पण समारोह में पुरस्कृत किया जाएगा। )

दादा बरामदे में बैठे अखबार पढ़ रहे थे। सौमित्र पुत्तर मोबाइल हाथ में लिए सामने की कुर्सी पर आकर बैठ गए । दादा ने अखबार से नजर उठाई और मुस्कराते हुए पूछा—

दादा: क्या बात है? आज मोबाइल में बहुत गंभीर शोध चल रहा है?

पुत्तर: दादा, एक तरफ तो हनुमान अंश की चमत्कारिक सफलता की चर्चा है, दूसरी तरफ इंदौर में जेन ज़ी का राहुल गाँधी को ज़बरदस्त सपोर्ट दिख रहा है।

दादा: अच्छा? ये जेन ज़ी होता क्या है ? तुम भी तो जेन ज़ी हो , बताओ जरा।

पुत्तर: अभी लो, (तीन सेकंड बाद ) मेल और मैसेज दोनों देख लो , पूरी टेबल भेज दी है।

पीढ़ीजन्म-वर्ष लगभग2026 में आयु
Silent Generation1928–194581–98
Baby Boomers1946–196462–80
Gen X1965–198046–61
Gen Y / Millennials1981–199630–45
Gen Z1997–201214–29
Gen Alpha2013 onward01–13

दादा: ग्रेट, चैट जीपीटी?
पुत्तर: येस , ऑफ़ कोर्स । एक दम सटीक बताती है। गूगल की भी अम्माँ है।
दादा: लेकिन फैक्ट चेक करते रहना चाहिए। राजनीति में तो अपनी रूचि कभी रही नहीं, फिल्मों , हनुमान जी और नीम करौली बाबा में हमेंशा रही है। इसलिए हनुमान अंश पर बात करते हैं।और हाँ , मैं हमेशा चीजों को और सरल बनाने में यकीन रखता हूँ , इसलिए दादा और पुत्तर , इसमें सब आ गए।
पुत्तर: क्या आप मानते है कि हनुमान अंश की सफलता के पीछे किन्हीं अदृश्य शक्तियों का हाथ है ?
दादा: हाँ, मैं मानता हूँ। लेकिन मेरा मानना न मानना महत्वपूर्ण नहीं है। ये सब व्यक्तिगत अभिरुचियों, अपनी पसंद नापसंद के सवाल हैं। मैं उन सब चीजों को मानता हूँ या मान सकता हूँ जिनमें मानव कल्याण की किंचित भी संभावना विद्यमान हो। चाहे फिर वो तार्किक हो या अतार्तिक।
पुत्तर: मतलब?
दादा: जैसे आध्यात्मिकता। आँखें बंद कर के चुपचाप एक जगह बैठने से क्या लाभ होगा? कोई तार्किक व्यक्ति पूछ सकता है। लेकिन अभी जो आधुनिक मेनिफेस्टेसन गुरु जैसे लुई हे, जो डिस्पेन्ज़ा, जोसफ मर्फी और अंकित नीरव भी कह रहे हैं कि हरेक व्यक्ति को कम से कम आधा घंटा किसी अतार्किक (illogical) गतिविधि में बितानी चाहिए। मेरे हिसाब से किसी आध्यात्मिक पद्दति से जुड़ कर कोई ऐसी क्रिया करें तो ज़्यादा लाभ होता है।
पुत्तर: तो क्या सभी संत नीम करौली की तरह बाबा या साधु संत बन जाएँ?
दादा: ये  बहुत बेसिक सवाल है। आज वर्तमान में जितने भी जागृत आध्यात्मिक गुरु हैं , जैसे सदगुरू जग्गी वासुदेव, श्री श्री रविशंकर, दाजी कमलेश पटेल, सेंसेई इकेदा, गुरुमाई चिद्विलासानन्द कोई भी बाबा बनने को नहीं कहते। वे सभी जीवन के सर्वोच्च को प्राप्त करने की बात करते हैं। गीता पर अपने विचार्रों को व्यक्त करते हुए सबसे स्पष्ट व्याख्या प्रोफेसर हिम्मत सिंह सिन्हा ने की है कि अर्जुन निवृत्ति मार्ग की ओर जा रहा था लेकिन कृष्ण ने उसे रोका और उसे अपने स्व धर्म और गृहस्थ के कर्तव्यों को पूरा करने के प्रवृत्ति मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित किया। बात सही गलत की नहीं है, बात सही समय पर सही चुनाव की है।
पुत्तर: एक और जहां मीडिया में फिल्म की शूटिंग के दौरान अनेक चमत्कारों की चर्चा हो रही है वहीँ कुछ लोगों का मानना है कि जब फिल्म फ्लॉप घोषित होने जा रही थी तब फिल्म बनाने वालों ने मीडिया में पैसा फेंका जिससे प्रचार की दिशा और दशा बदली और फिल्म हिट हुई। सही क्या है?
दादा: कुछ भी संभव है। अँग्रेज़ी में एक कहावत है – नथिंग सक्सीड्स लाइक सक्सेस। सफलता से बड़ा कुछ भी नहीं। कोई बात या व्यक्ति जब सफल हो जाता है तो फिर सब तरह की , अच्छी और बुरी, चर्चाएं होती हैं। 
पुत्तर: हनुमान अंश की सफलता का क्या पैमाना है?
दादा: यही कि एक फिल्म जो दो करोड़ की लागत से बनी आज तीन सौ करोड़ से ज़्यादा की कमाई कर रही है।
पुत्तर: यह तो साफ़ सांसारिक पैमाना है, इसमें आध्यात्मिकता कहाँ है?
दादा: यह दूसरा बेसिक मुद्दा है। जो प्रवृत्ति मार्गी गृहस्थ है, उसके लिए आध्यात्मिकता और सांसारिक सफलता में कोई विरोध नहीं है, एक्सेप्ट वन, कि सम्पदा दैवी होनी चाहिए आसुरी नहीं।
पुत्तर: मतलब?
दादा: जो संपत्ति दस शीश अरस करी रावण शिव पह लीनी।
वही सम्पदा विभीषण कह अति सकुचि सहित प्रभु दीनी। 
विषय लम्बा हो जायेगा। फिलहाल इसका मतलब यह है कि कोई भी जेन हो, एक्स, व्हाई, ज़ेड, अपना स्पष्ट लक्ष्य रखे, लक्ष्य बड़ा रखे और गीता के निष्काम कर्म योग के अनुसार अपने लक्ष्य प्राप्ति के लिए कर्म करे।
पुत्तर: हनुमान अंश वालों ने यही किया ?
दादा: बिलकुल यही किया होगा।
पुत्तर: फिर बाबा की और हनुमान जी की कृपा हुई?
दादा: ऐसा मान सकते हैं। लेकिन निष्काम कर्म योग में जहां जाना है वहां का टिकट खरीद कर वाहन में बैठ जाना है या सो जाना है । फिर वाहन अपने आप आपको गंतव्य तक पहुंचा देता है। महत्वपूर्ण है, गंतव्य तय करना, टिकट खरीदना और वाहन में बैठना।
पुत्तर: आप बहुत कुछ लिख रहे हो, बेच फ्लॉवर , जिन शिन, अंग्रेजी ग्रामर , संस्कृत व्याकरण , गीता, मेनिफेस्टेशन, स्विच वर्ड, साइंस बनाम विज्ञान, कृषि विज्ञान, कहानियां , वार्ताएं, न्यूज़। लेटेस्ट क्या है?
दादा: लेटेस्ट है – डॉ श्री गौरव शुक्ल और डॉ  श्रीमती आरती शुक्ल की बीज मन्त्र टेक्नोलॉजी।
पुत्तर: मन्त्र और टेक्नोलॉजी? कोई दूर दूर तक का रिश्ता नहीं दिखता।
दादा: यही तो बात है। भारत का विज्ञान अगर एक व्यापक साइंस नहीं बन सका तो उसका एक कारण था कि वो प्रायः एक व्यक्तिगत सिद्दी बन कर रह गया। टेक्नोलॉजी न बन सका। टेक्नोलॉजी व्यक्तिगत नहीं, सार्वभौमिक होती है। फिर हम उसकी साइंस या विज्ञान समझें या न समझें उसको मानव कल्याण के लिए उपयोग में ला सकते हैं। जय हनुमान। जय नीम करौली बाबा।
पुत्तर: नीम करौली बाबा को ज़्यादा लोग इस वजह से जानते हैं कि एपल कंपनी के संस्थापक  स्टीव जॉब्स और  फेसबुक के मार्क ज़ुकरबर्ग कैंची धाम आये थे। 
दादा: सही है। राम कृष्ण परमहंस को ज़्यादा लोग उनके शिष्य स्वामी विवेकानंद के कारण जानते हैं और स्वामी विवेकानंद को उनके शिकागो में दिए गए अंग्रेजी व्याख्यान के कारण जानते हैं। उनकी  केवल एक विदेशी शिष्य थी- सिस्टर निवेदिता।   मुझे खुद  यू ट्यूब पर एक फिल्म के माध्यम से पता चला कि तेलुगु के एक भक्त, अन्नमय्या   ने थिरुपति की स्तुति में 32000 भजन लिखे हैं। और अन्नमय्या श्री हरी विष्णु की तलवार के अवतार थे। जब टेक्नोलॉजी का विकास  हुआ, ओशो रजनीश पूरे विश्व, ख़ास कर अमेरिका में छा  गए। आज श्री श्री , सदगुरु , सेंसेई , हार्टफुलनेस, स्वामी योगानंद , स्वामी मुक्तानंद, जो बोलो, सबके अंतर्राष्ट्रीय केंद्र और आश्रम हैं। खुशबू को फैलने की तमन्ना है मगर, चंद हवाओं का सहारा चाहिए। आज टेक्नोलॉजी वह हवा है, जो पहले नहीं थी।
पुत्तर: और जेन ज़ी?
दादा: जेनेरेशन गेप हमेंशा रहा है। एक हज़ार साल पुरानी किताब उठा कर देख लो , लिखा मिल जायेगा – “आज के युवाओं को क्या हो गया है? कुछ समझते ही नहीं।” और कुछ शाश्वत कहावतें – मूळ सूँ ब्याज़ प्यारो, लाडु री कोर म कुण मीठो कुण खारो। 
जाने न जाने गुल ही न जाने बाग़ तो सारा जाने है। पत्ता पत्ता बूटा बूटा ……

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Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor