आइडिया एवं क्यूरेटर : केबी व्यास, दुबई
वर्ड्स ऑफ इंटरव्यू : आार्टिफिशियल इंटेलिजेंस
प्रजेंट : दिलीप कुमार पुरोहित. राइजिंग भास्कर
(जिंगल बजता है।)
“बातों में तड़का, हँसी का कमाल,
आज स्टूडियो में आए हैं बवालिया लाल!”
के बी व्यास:
नमस्कार सा! राम-राम सा! खम्मा घणी सा!
आज हमारे मेहमान ऐसे महापुरुष हैं, जिन्होंने अपने परिचय में इतनी उपलब्धियाँ लिखीं कि हमारा प्रिंटर हाथ जोड़कर बोला—“बाकी मौखिक सुन लेना!”
इनका दावा है कि मोहल्ले की हर समस्या का समाधान इनके पास है। हालाँकि मोहल्ले वालों का कहना है कि हर समाधान के बाद एक नई समस्या भी इन्हीं से मिलती है!
स्वागत कीजिए—श्री बड़बोले लाल बवालिया जी!
(तालियाँ।)
बड़बोले लाल:
व्यास जी, तालियाँ थोड़ी कम हैं। मेरे व्यक्तित्व के अनुसार कम से कम तीन मिनट बजनी चाहिए थीं। मेरे आने पर तो घड़ी भी सम्मान में रुक जाती है।
के बी व्यास:
हुजूर यह रेडियो स्टूडियो है। यहाँ बिजली का बिल भी व्यक्तित्व देखकर नहीं आता! और घड़ी रुकती नहीं, शायद आपकी बातों से बचने के लिए बैटरी निकाल लेती है।
बड़बोले लाल:
वैसे बिजली विभाग में मेरी अच्छी पहचान है।
के बी व्यास:
किससे?
बड़बोले लाल:
मीटर पढ़ने वाले से। मुझे देखते ही कहता है—“फिर बिल नहीं भरा?”
के बी व्यास:
यानी पहचान ऐसी है कि वह आपका नाम नहीं, बकाया राशि याद रखता है!
के बी व्यास:
आपके नाम में “बड़बोले” कैसे जुड़ा?
बड़बोले लाल:
बचपन से मेरी सोच बड़ी थी। दूसरे बच्चे कहते थे, “मैं डॉक्टर बनूँगा।” मैं कहता था, “मैं डॉक्टरों को सलाह दूँगा।”
के बी व्यास:
और डॉक्टरों ने आपकी सलाह पर अमल किया?
बड़बोले लाल:
एक डॉक्टर ने किया था। मैंने कहा, “मरीज को आराम चाहिए।” उसने मुझे बाहर बैठा दिया।
के बी व्यास:
लगता है डॉक्टर ने सलाह नहीं, सलाहकार को ही आराम दे दिया!
बड़बोले लाल:
और “बवालिया” समाज द्वारा प्रदान की गई उपाधि है।
के बी व्यास:
किस सेवा के लिए?
बड़बोले लाल:
एक बार मोहल्ले में कहा कि पानी की समस्या मैं चुटकियों में हल कर दूँगा। मुख्य वाल्व खोल दिया।
के बी व्यास:
फिर पानी आया?
बड़बोले लाल:
इतना आया कि समस्या घरों से निकलकर सड़क पर तैरने लगी।
के बी व्यास:
वाल्व बंद क्यों नहीं किया?
बड़बोले लाल:
खोलने का अनुभव था। बंद करने के लिए विशेषज्ञ बुलाना पड़ा।
के बी व्यास:
आपने पानी की समस्या हल नहीं की,लोगों को तैराकी सिखा दी! अच्छा सुना है, स्कूल में भी आपके बड़े चर्चे थे?
बड़बोले लाल:
बिल्कुल! अध्यापक मेरी प्रतिभा से घबराते थे।
के बी व्यास:
कोई उदाहरण?
बड़बोले लाल:
गणित के मास्टर ने पूछा, “पाँच में से दो गए तो कितने बचे?” मैंने कहा, “पहले बताइए, गए कहाँ? लौटने की संभावना है या नहीं?”
के बी व्यास:
मास्टर जी ने क्या कहा?
बड़बोले लाल:
“तुम बाहर जाओ!”
के बी व्यास:
फिर कितने बचे?
बड़बोले लाल:
कक्षा में उनतालीस।
के बी व्यास:
चलो सा, एक सवाल का सही जवाब तो मिला! हालाँकि वह गणित से कम और आपकी अनुपस्थिति की गिनती से ज़्यादा जुड़ा था।
के बी व्यास:
आपकी सबसे बड़ी उपलब्धि क्या है?
बड़बोले लाल:
मैंने एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में भाषण दिया है।
के बी व्यास:
कहाँ?
बड़बोले लाल:
ऑनलाइन। परिवार का समूह था। एक भतीजा कनाडा में, भांजी दुबई में और साला जयपुर में।
के बी व्यास:
विषय क्या था?
बड़बोले लाल:
“परिवार में वरिष्ठ व्यक्तियों के सम्मान का संकट।”
के बी व्यास:
कितनी देर बोले?
बड़बोले लाल:
पैंतालीस मिनट।
के बी व्यास:
प्रतिक्रिया कैसी रही?
बड़बोले लाल:
बहुत अनुशासित श्रोता थे। कोई बीच में नहीं बोला।
के बी व्यास:
आपका माइक खुला था?
बड़बोले लाल:
बाद में पता चला, बंद था। लेकिन भावनाएँ तो पहुँच ही गई होंगी!
के बी व्यास:
भावनाएँ पहुँची होंगी, आवाज़ नहीं। परिवार ने पहली बार तकनीक का सही इस्तेमाल किया—आपको म्यूट करके!
के बी व्यास:
घर में भी आपकी इतनी धाक है?
बड़बोले लाल:
मैं घर का मुखिया हूँ। मेरी अनुमति के बिना पत्ता नहीं हिलता।
(मोबाइल बजता है।)
बड़बोले लाल:
जी… हाँ… धनिया ले आऊँगा… नहीं, पुदीना नहीं… पिछली बार गलती हुई थी… जी, रास्ते में भाषण नहीं दूँगा।
(फ़ोन रखते हैं।)
के बी व्यास:
किसका फ़ोन था?
बड़बोले लाल:
गृह मंत्रालय का।
के बी व्यास:
पत्ता हिलाने की अनुमति मिल गई?
बड़बोले लाल:
धनिए के पत्ते लाने की मिली है। हिलाने का निर्णय घर पहुँचकर होगा।
के बी व्यास:
यानी घर में आप मुखिया हैं, लेकिन धनिया लोकतांत्रिक नियंत्रण में आता है!
के बी व्यास:
आप खेलकूद में भी माहिर हैं?
बड़बोले लाल:
क्रिकेट मेरी नसों में है। हमारी टीम मेरी सलाह से जीती थी।
के बी व्यास:
क्या सलाह दी?
बड़बोले लाल:
कप्तान से कहा, “मुझे बल्लेबाज़ी में सबसे अंत में भेजना।”
के बी व्यास:
क्यों?
बड़बोले लाल:
विरोधी टीम मेरी रणनीति समझ ही नहीं पाएगी।
के बी व्यास:
फिर?
बड़बोले लाल:
मेरी बारी आने से पहले मैच जीत गए।
के बी व्यास:
तो आपका योगदान?
बड़बोले लाल:
मैंने टीम पर अपने प्रदर्शन का अनावश्यक दबाव नहीं डाला।
के बी व्यास:
आपने बल्ला नहीं चलाया, फिर भी टीम को जीतने दिया—इसे ही कहते हैं निष्क्रिय प्रतिभा!
के बी व्यास:
खाना बनाना आता है?
बड़बोले लाल:
मेरे हाथ की खिचड़ी पूरे परिवार को याद है।
के बी व्यास:
इतनी स्वादिष्ट थी?
बड़बोले लाल:
इतनी ऐतिहासिक थी। मैंने सोचा, दाल-चावल तो सब डालते हैं। कुछ नया किया जाए।
के बी व्यास:
क्या डाला?
बड़बोले लाल:
गरम मसाला, सॉस, किशमिश और थोड़ा आत्मविश्वास।
के बी व्यास:
नतीजा?
बड़बोले लाल:
परिवार ने तय किया कि आगे से मेरा आत्मविश्वास रसोई के बाहर रहेगा।
के बी व्यास:
खिचड़ी का क्या हुआ?
बड़बोले लाल:
ढक्कन लगाकर रख दी। शायद भविष्य में उसके उपयोग पर शोध हो।
के बी व्यास:
शोधकर्ता आए?
बड़बोले लाल:
एक बिल्ली आई थी। उसने सूँघकर कहा—“इतिहास में मेरा नाम मत जोड़ना।”
के बी व्यास:
सोशल मीडिया पर आप बहुत सक्रिय हैं?
बड़बोले लाल:
मैं ज्ञान बाँटता हूँ। कल लिखा—“सफलता मेरे कदम चूमती है।”
के बी व्यास:
कितने लोगों ने पसंद किया?
बड़बोले लाल:
दो ने। एक मैं था।
के बी व्यास:
दूसरा?
बड़बोले लाल:
मेरा दूसरा अकाउंट।
के बी व्यास:
कोई टिप्पणी?
बड़बोले लाल:
पत्नी ने लिखा—“कदम चूमने से पहले जूते बाहर उतार देना।”
के बी व्यास:
उस टिप्पणी को कितनी पसंद मिली?
बड़बोले लाल:
व्यास जी, अगले प्रश्न पर चलिए। आँकड़ों से हर बात नहीं समझी जाती।
के बी व्यास:
सही कहा। कुछ बातें तो पत्नी की एक टिप्पणी से ही पूरी तरह समझ आ जाती हैं!
के बी व्यास:
लोग कहते हैं, आप हर विषय के विशेषज्ञ हैं।
बड़बोले लाल:
सही कहते हैं। राजनीति, चिकित्सा, अंतरिक्ष, खेती—जो पूछना हो पूछिए।
के बी व्यास:
मोबाइल का पासवर्ड भूल जाएँ तो?
बड़बोले लाल:
उसके लिए मेरा बारह साल का भतीजा है।
के बी व्यास:
और टीवी का रिमोट?
बड़बोले लाल:
वह भी वही देखता है।
के बी व्यास:
आपकी विशेषज्ञता कहाँ काम आती है?
बड़बोले लाल:
उसे समझाने में कि हमारे ज़माने में ये समस्याएँ नहीं थीं।
के बी व्यास:
क्योंकि ये उपकरण ही नहीं थे?
बड़बोले लाल:
आप मेरी बात की गहराई तक बहुत जल्दी पहुँच जाते हैं!
के बी व्यास:
बड़बोले जी आपकी बातों में गहराई कम और गड्ढे ज़्यादा हैं—फिर भी रास्ता मिल ही जाता है!
के बी व्यास:
कभी आपके बड़े दावे भारी भी पड़े?
बड़बोले लाल:
एक बार बोला कि पचास लोगों का कार्यक्रम अकेला सँभाल लूँगा।
के बी व्यास:
सँभाल लिया?
बड़बोले लाल:
निमंत्रण में समय लिख दिया, स्थान लिखना भूल गया।
के बी व्यास:
फिर लोग कहाँ आए?
बड़बोले लाल:
मेरे घर।
के बी व्यास:
कार्यक्रम हुआ?
बड़बोले लाल:
हाँ। विषय बदल गया। पहले “सामाजिक सहयोग” था, फिर “बड़बोले लाल की जवाबदेही” हो गया।
के बी व्यास:
उस दिन कुछ सीखा?
बड़बोले लाल:
हाँ सा। घोषणा करने में एक मुँह लगता है, निभाने में कई हाथ।
के बी व्यास:
और गलती करने में?
बड़बोले लाल:
एक बड़बोला लाल काफी होता है।
के बी व्यास:
फिर भी लोग आपको बुलाते हैं?
बड़बोले लाल:
क्योंकि काम के समय भागता नहीं हूँ। कुर्सियाँ उठानी हों, चाय बाँटनी हो, सफ़ाई करनी हो—रुकता हूँ।
के बी व्यास:
यह बात पहले क्यों नहीं बताई?
बड़बोले लाल:
इसमें बड़े शब्द नहीं हैं। “मैंने बीस कुर्सियाँ लगाईं” सुनकर कौन प्रभावित होगा?
के बी व्यास:
जिसे बैठने की जगह मिली, वह होगा सा।
बड़बोले लाल:
तो अगली बार कहूँगा—“मैंने बीस नागरिकों को बैठने का संवैधानिक अवसर प्रदान किया!”
के बी व्यास:
कुर्सियाँ लगाइए, संविधान को आराम दीजिए! वरना अगली बार आप झाड़ू लगाने को “शहरी पुनर्निर्माण अभियान” बता देंगे।
के बी व्यास:
अब एक छोटा प्रयोग। तीस सेकंड तक अपनी तारीफ़ किए बिना बात कीजिए।
बड़बोले लाल:
मेरे पड़ोसी बहुत अच्छे हैं। हमेशा सहायता करते हैं। हमारी गली का दूधवाला समय पर आता है। सफ़ाई कर्मचारी मेहनती हैं। और मेरी पत्नी…
के बी व्यास:
हाँ, कहिए।
बड़बोले लाल:
वह मेरी बातों के पीछे छिपे छोटे-से काम को भी पहचान लेती है।
के बी व्यास:
देखिए सा, आपने दूसरों की तारीफ़ की तो आवाज़ कितनी सहज हो गई।
बड़बोले लाल:
सच कहूँ, थोड़ा हल्का भी लग रहा है। हर समय महान बने रहना थकाता बहुत है!
के बी व्यास:
तो आज पहली बार आपकी बातों का वजन कम हुआ और कार्यक्रम की गुणवत्ता बढ़ गई!
के बी व्यास:
श्रोताओं के लिए आख़िरी संदेश?
बड़बोले लाल:
दावे उतने कीजिए, जितने निभा सकें। काम छोटा हो तो भी कीजिए। और किसी को मदद चाहिए तो अपनी जीवनी सुनाने से पहले उसका सामान उठा दीजिए।
के बी व्यास:
वाह सा! लगता है आज बड़बोले लाल के भीतर से एक समझदार आदमी बाहर आया है।
बड़बोले लाल:
वह हमेशा भीतर था।
के बी व्यास:
हाँ, लेकिन आपकी बातों की पार्किंग में फँसा हुआ था!
के बी व्यास:
बहुत बढ़िया! आपका धन्यवाद—
बड़बोले लाल:
अब मेरी याद में स्टूडियो के बाहर एक छोटी-सी पट्टिका लगवा दीजिए।
के बी व्यास:
क्या लिखें?
बड़बोले लाल:
“यहाँ बड़बोले लाल बवालिया पधारे थे।”
के बी व्यास:
नीचे हम जोड़ देंगे—“और बड़ी मुश्किल से विदा हुए थे!”
(ज़ोरदार ठहाके।)
बड़बोले लाल:
व्यास जी, जाते-जाते एक बात—यह कार्यक्रम मेरे आने से ऐतिहासिक हो गया!
के बी व्यास:
बड़बोले साहब पहले धनिया ले जाइए। इतिहास घर पर आपका इंतज़ार कर रहा है! और ध्यान रहे—इस बार पुदीना लेकर मत लौटिए, वरना घर में अगला इंटरव्यू आपका नहीं, गृह मंत्रालय का होगा!
(जिंगल बजता है। कार्यक्रम समाप्त।)


