सप्ताह में केवल दो घंटे देकर जानें श्रीमद्भगवद्गीता का जीवनोपयोगी ज्ञान, ऑनलाइन और फिजिकल कक्षाओं के लिए रजिस्ट्रेशन शुरू; 550 रुपये शुल्क, कोर्स पूरा करने पर 500 रुपये रिफंड लेने का विकल्प
दिलीप कुमार पुरोहित. जोधपुर
9783414079 diliprakhai@gmail.com
भारतीय संस्कृति, आध्यात्मिक चिंतन और जीवन-दर्शन में श्रीमद्भगवद्गीता का स्थान अद्वितीय है। गीता केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन को समझने, मन को संतुलित रखने, कर्तव्य का बोध कराने और कठिन परिस्थितियों में उचित निर्णय लेने की प्रेरणा देने वाला कालजयी मार्गदर्शन है। इसी ज्ञान को जन-जन तक पहुंचाने के उद्देश्य से गीता परिचय अभियान की ओर से एक वर्षीय गीता कोर्स-2027 के लिए रजिस्ट्रेशन किए जा रहे हैं। अभियान की प्रभारी सुधा गर्ग ने लोगों से आग्रह किया है कि वे अपने व्यस्त जीवन में से थोड़ा समय निकालकर गीता के अध्ययन के लिए अवश्य दें। इस कोर्स के माध्यम से प्रतिभागियों को गीता के श्लोकों के अर्थ, उनके जीवनोपयोगी भाव और व्यावहारिक संदेशों को समझने का अवसर मिलेगा। कोर्स ऑनलाइन तथा फिजिकल, दोनों माध्यमों से उपलब्ध है। सप्ताह में केवल एक दिन दो घंटे का समय देकर एक वर्ष तक इस अध्ययन से जुड़ा जा सकता है। फिजिकल कक्षाओं का आयोजन अग्रसेन भवन और भारत समन्वय धाम में किया जाता है।
समय रहते जीवन के वास्तविक उद्देश्य को पहचानना जरूरी : सुधा गर्ग
गीता परिचय अभियान की प्रभारी सुधा गर्ग ने कहा कि मनुष्य जीवन अनमोल है। जीवन में अनेक कार्य, जिम्मेदारियां और इच्छाएं होती हैं, लेकिन इनके बीच उस उद्देश्य को भूलना उचित नहीं, जिसके लिए हमें यह जीवन मिला है। अक्सर व्यक्ति सोचता है कि आध्यात्मिक अध्ययन, आत्मचिंतन और जीवन के मूल प्रश्नों पर विचार करने के लिए बाद में समय निकालेंगे। यही बाद में कभी-कभी बहुत देर में बदल जाता है। इसलिए जिस अच्छे और कल्याणकारी कार्य को आज किया जा सकता है, उसे अनावश्यक रूप से टालना नहीं चाहिए।
उन्होंने समय की महत्ता को रेखांकित करते हुए कहा कि संतों ने बार-बार मनुष्य को जीवन की क्षणभंगुरता का स्मरण कराया है। इसी भाव को व्यक्त करती प्रसिद्ध पंक्तियां हैं—
“बहुत गई थोड़ी रही, नारायण अब चेत।
काल चिरैया चुग रही, निस दिन आयु खेत॥”
इन पंक्तियों का संदेश है कि जीवन का समय निरंतर बीत रहा है। जिस प्रकार खेत में खड़ी फसल को पक्षी धीरे-धीरे चुग लेते हैं, उसी प्रकार हमारी आयु का प्रत्येक दिन कम होता जाता है। मनुष्य यदि केवल सांसारिक व्यस्तताओं में ही उलझा रहे और आत्मकल्याण के लिए समय न निकाले, तो जीवन के महत्वपूर्ण अवसर हाथ से निकल सकते हैं। इसलिए जागरूक होकर अपने समय का सदुपयोग करना आवश्यक है।
सुधा गर्ग के अनुसार, गीता का अध्ययन इसी जागरूकता की दिशा में एक सार्थक कदम हो सकता है। गीता हमें जीवन से विमुख होना नहीं सिखाती, बल्कि जीवन के बीच रहकर अपने कर्तव्यों को समझने, जिम्मेदारियों का निर्वहन करने और मन को सही दिशा देने की प्रेरणा देती है। इसका ज्ञान परिवार, समाज, कार्यक्षेत्र और व्यक्तिगत जीवन की अनेक परिस्थितियों में उपयोगी हो सकता है।
गीता : जीवन के प्रश्नों का मार्गदर्शन करने वाला कालजयी ग्रंथ
श्रीमद्भगवद्गीता का उपदेश महाभारत के युद्धक्षेत्र में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को दिया था। अर्जुन अपने सामने उपस्थित कठिन परिस्थिति, संबंधों, कर्तव्य और परिणामों को लेकर दुविधा में थे। उनके मन में अनेक प्रश्न थे। वे समझ नहीं पा रहे थे कि ऐसी स्थिति में उन्हें क्या करना चाहिए। तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें आत्मा, कर्म, ज्ञान, भक्ति, विवेक, समत्व और कर्तव्य का बोध कराया।
यह प्रसंग आज भी मनुष्य के जीवन से जुड़ा हुआ है। प्रत्येक व्यक्ति कभी न कभी ऐसे मोड़ पर पहुंचता है, जहां उसे निर्णय लेने में कठिनाई होती है। कभी परिवार की जिम्मेदारियां चिंता का कारण बनती हैं, कभी कार्यक्षेत्र की चुनौतियां मन को विचलित करती हैं और कभी सफलता-असफलता का भय आगे बढ़ने से रोकता है। ऐसी परिस्थितियों में गीता का अध्ययन मनुष्य को अपने विचारों की समीक्षा करने और विवेकपूर्ण दृष्टिकोण विकसित करने का अवसर देता है।
गीता का एक प्रसिद्ध संदेश है—
“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।”
अर्थात मनुष्य का अधिकार कर्म करने में है, उसके फल पर नहीं। इस संदेश का आशय यह नहीं कि परिणामों की योजना या मूल्यांकन न किया जाए, बल्कि यह है कि व्यक्ति परिणाम की अत्यधिक चिंता में उलझकर अपने कर्तव्य से विमुख न हो। उसे अपनी क्षमता, निष्ठा और विवेक के अनुसार श्रेष्ठ प्रयास करना चाहिए।
विद्यार्थियों के लिए यह संदेश पढ़ाई में एकाग्रता और निरंतर प्रयास की प्रेरणा देता है। नौकरीपेशा लोगों के लिए यह अपने कार्य के प्रति जिम्मेदारी और ईमानदारी का भाव मजबूत कर सकता है। परिवार में यह अपने दायित्वों को समझने और संबंधों में संतुलन बनाए रखने की सीख देता है। इसी प्रकार जीवन में कठिन परिस्थितियों का सामना करने वाले व्यक्ति के लिए गीता आत्मचिंतन और मानसिक स्थिरता की दिशा में प्रेरणा का स्रोत बन सकती है।
गीता का अध्ययन केवल श्लोकों को याद करने तक सीमित नहीं है। उसके अर्थ, संदर्भ और भाव को समझना तथा उन्हें अपने व्यवहार में उतारने का प्रयास करना अधिक महत्वपूर्ण है। इसी दृष्टि से गीता परिचय अभियान का एक वर्षीय कोर्स प्रतिभागियों के लिए अध्ययन और आत्मचिंतन का अवसर प्रदान करता है।
एक वर्ष तक नियमित अध्ययन, सप्ताह में केवल दो घंटे
आज की तेज रफ्तार जिंदगी में लोगों के पास काम, परिवार, सामाजिक जिम्मेदारियों और अन्य गतिविधियों के कारण समय की कमी रहती है। ऐसे में आध्यात्मिक अध्ययन को नियमित रूप से जारी रखना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। गीता परिचय अभियान ने इसी बात को ध्यान में रखते हुए एक वर्षीय गीता कोर्स-2027 की व्यवस्था की है, जिसमें सप्ताह में केवल एक दिन दो घंटे देने होंगे।
इस व्यवस्था का उद्देश्य प्रतिभागियों को नियमित अध्ययन के लिए प्रेरित करना है, ताकि वे एक निश्चित समय-सारिणी के अनुसार गीता से जुड़ सकें। एक साथ बहुत अधिक सामग्री पढ़ने के बजाय क्रमबद्ध अध्ययन करने से श्लोकों के अर्थ और उनके भाव को समझने का अवसर मिलता है। प्रतिभागी अध्यायवार विषयों पर विचार कर सकते हैं, अपनी जिज्ञासाएं सामने रख सकते हैं और प्रश्नोत्तर सत्रों के माध्यम से अपनी समझ को स्पष्ट कर सकते हैं।
सुधा गर्ग ने बताया कि यह कोर्स उन लोगों के लिए भी उपयोगी अवसर है, जो लंबे समय से गीता पढ़ना चाहते हैं, लेकिन नियमितता नहीं बना पा रहे हैं। कोर्स के माध्यम से उन्हें अध्ययन का एक व्यवस्थित ढांचा मिलेगा। इसके लिए किसी विशेष आयु वर्ग तक सीमित रहने की जानकारी नहीं दी गई है। इच्छुक व्यक्ति पंजीकरण और पात्रता से संबंधित विवरण अभियान के आधिकारिक ऐप अथवा संबंधित आयोजकों से प्राप्त कर सकते हैं।
श्रद्धेय स्वामी रामसुखदासजी की ‘साधक संजीवनी’ के आधार पर अध्ययन
गीता परिचय अभियान की ओर से उपलब्ध कराई गई जानकारी के अनुसार, इस कोर्स की एक प्रमुख विशेषता यह है कि इसमें गीता के सभी श्लोकों पर जीवनोपयोगी भाव सहित चर्चा की जाएगी। इसके लिए श्रद्धेय स्वामी रामसुखदासजी की गीता टीका ‘साधक संजीवनी’ को आधार बनाया जाएगा।
स्वामी रामसुखदासजी का आध्यात्मिक साहित्य गीता के अध्ययन और उसके साधना-परक भाव को समझने के इच्छुक पाठकों के बीच जाना जाता है। किसी श्लोक का अर्थ समझने के साथ-साथ उसके व्यावहारिक पक्ष पर विचार करना अध्ययन को अधिक सार्थक बना सकता है। गीता के संदेशों को अपने व्यवहार, विचार और निर्णयों से जोड़कर देखना ही उसके अध्ययन को जीवनोपयोगी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
कोर्स में श्लोकों के भाव पर चर्चा से प्रतिभागियों को यह समझने में सहायता मिल सकती है कि गीता में कर्म, ज्ञान, भक्ति, आत्मसंयम, समत्व और कर्तव्य जैसे विषय किस प्रकार प्रस्तुत किए गए हैं। इन विषयों पर विचार करते हुए व्यक्ति अपने जीवन की परिस्थितियों को अधिक स्पष्टता से देखने का अभ्यास कर सकता है।
उदाहरण के लिए, गीता में समत्व का संदेश सुख-दुःख, लाभ-हानि और सफलता-असफलता जैसी स्थितियों में संतुलित दृष्टि रखने की प्रेरणा देता है। इसका अर्थ यह नहीं कि मनुष्य को संवेदनहीन हो जाना चाहिए। बल्कि वह परिस्थितियों को समझते हुए जल्दबाजी, आवेश या अत्यधिक निराशा में निर्णय लेने से बचे और विवेक के साथ अपना कर्तव्य निभाए।
इसी प्रकार गीता में कर्म का महत्व व्यक्ति को सक्रिय रहने और अपनी जिम्मेदारियों को गंभीरता से निभाने की प्रेरणा देता है। भक्ति का संदेश श्रद्धा, समर्पण और आंतरिक संबंध की भावना को समझने का अवसर देता है। आत्मसंयम से संबंधित शिक्षाएं व्यक्ति को अपने विचारों, इच्छाओं और व्यवहार का निरीक्षण करने के लिए प्रेरित करती हैं।
इस प्रकार गीता का क्रमबद्ध अध्ययन केवल ज्ञान अर्जित करने का माध्यम नहीं, बल्कि अपने जीवन को बेहतर ढंग से समझने का अवसर भी बन सकता है।
अध्याय के अंत में विवेचन और प्रश्नोत्तर सत्र
गीता परिचय अभियान के एक वर्षीय कोर्स में प्रत्येक अध्याय के अंत में विवेचन और प्रश्नोत्तर सत्र आयोजित किए जाने की व्यवस्था बताई गई है। अध्ययन के दौरान अनेक प्रश्न सामने आते हैं। कभी किसी श्लोक के शब्दार्थ को समझने की आवश्यकता होती है, तो कभी उसके भाव को जीवन की किसी परिस्थिति से जोड़ने में जिज्ञासा उत्पन्न होती है।
विवेचन सत्र का उद्देश्य अध्याय में प्रस्तुत प्रमुख विचारों पर क्रमबद्ध चर्चा करना है। वहीं प्रश्नोत्तर सत्र में प्रतिभागियों को अपनी शंकाएं रखने और संबंधित विषयों को अधिक स्पष्टता से समझने का अवसर मिलता है। इस तरह अध्ययन केवल सुनने या पढ़ने तक सीमित न रहकर संवाद की प्रक्रिया से भी जुड़ता है।
गीता के उपदेशों को समझने के लिए प्रश्न पूछना और विचार करना महत्वपूर्ण है। अर्जुन ने भी भगवान श्रीकृष्ण के सामने अपनी दुविधाएं रखीं। संवाद के माध्यम से उनकी समझ विकसित हुई और उन्हें अपने कर्तव्य के संबंध में स्पष्टता मिली। यह प्रसंग बताता है कि जिज्ञासा ज्ञान प्राप्ति की प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
कोर्स में अध्यायवार चर्चा और प्रश्नोत्तर की व्यवस्था इसी प्रकार नियमित अध्ययन को सहभागितापूर्ण बनाने में सहायक हो सकती है।
ऑनलाइन और फिजिकल कक्षाओं का विकल्प
वर्तमान समय में डिजिटल माध्यमों ने शिक्षा और अध्ययन को अधिक सुलभ बनाया है। गीता परिचय अभियान का एक वर्षीय कोर्स-2027 भी ऑनलाइन माध्यम से उपलब्ध है। जो लोग घर से अध्ययन करना चाहते हैं या किसी कारणवश नियमित रूप से किसी केंद्र तक नहीं पहुंच सकते, वे ऐप के माध्यम से उपलब्ध विकल्पों की जानकारी लेकर पंजीकरण कर सकते हैं।
इसके अतिरिक्त, अभियान की ओर से फिजिकल कक्षाओं की व्यवस्था भी की गई है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, ये कक्षाएं अग्रसेन भवन और भारत समन्वय धाम में लगाई जाती हैं। प्रत्यक्ष कक्षाओं में प्रतिभागियों को निर्धारित समय पर एक स्थान पर एकत्र होकर अध्ययन करने का अवसर मिलता है।
ऑनलाइन और फिजिकल माध्यमों का विकल्प होने से इच्छुक व्यक्ति अपनी सुविधा, समय और उपलब्धता के अनुसार उपयुक्त व्यवस्था चुन सकते हैं। पंजीकरण करते समय संबंधित माध्यम, उपलब्ध समय-सारिणी और कक्षा की अन्य आवश्यक जानकारियों की पुष्टि करना उचित रहेगा।
अपनी सुविधा के अनुसार चुनें समय
कोर्स की एक अन्य विशेषता सुविधा के अनुसार टाइम स्लॉट चुनने का विकल्प है। व्यस्त दिनचर्या वाले लोगों के लिए अध्ययन का ऐसा समय चुनना उपयोगी होता है, जिसे वे नियमित रूप से दे सकें। सप्ताह में एक दिन दो घंटे निर्धारित करने से पढ़ाई, नौकरी, व्यवसाय और पारिवारिक दायित्वों के बीच संतुलन बनाते हुए गीता अध्ययन जारी रखने की योजना बनाई जा सकती है।
नियमितता किसी भी अध्ययन की सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यदि कोई व्यक्ति प्रतिदिन बहुत अधिक समय नहीं दे सकता, तो भी सप्ताह में एक निश्चित समय निकालकर क्रमबद्ध अध्ययन शुरू कर सकता है। धीरे-धीरे यही अभ्यास जीवन में आत्मचिंतन और ज्ञान के लिए स्थान बनाने में मददगार हो सकता है।
इच्छुक प्रतिभागियों को पंजीकरण के समय उपलब्ध टाइम स्लॉट, ऑनलाइन या फिजिकल कक्षा और भाषा से संबंधित विकल्पों की जानकारी प्राप्त कर अपने अनुकूल विकल्प चुनना चाहिए।
चार भाषाओं में अध्ययन का विकल्प
गीता परिचय अभियान के कोर्स में चार भाषाओं का विकल्प उपलब्ध होने की जानकारी दी गई है। इनमें हिंदी, गुजराती, उड़िया और अंग्रेजी शामिल हैं।
भाषा किसी भी विषय को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। व्यक्ति जिस भाषा में सहजता अनुभव करता है, उसमें अध्ययन करने से विषय के अर्थ और भाव को समझने में सुविधा हो सकती है। अलग-अलग भाषाओं में विकल्प उपलब्ध होने से विविध भाषायी पृष्ठभूमि के लोगों को गीता अध्ययन से जुड़ने का अवसर मिलता है।
इस व्यवस्था से हिंदी के साथ-साथ गुजराती, उड़िया और अंग्रेजी में अध्ययन करना चाहने वाले लोग भी अपने लिए उपयुक्त विकल्प तलाश सकते हैं। पंजीकरण के दौरान इच्छित भाषा का चुनाव करते समय ऐप में उपलब्ध विकल्पों और संबंधित कोर्स की जानकारी की पुष्टि करनी चाहिए।
कोर्स पूरा करने पर ‘गीता ई-प्रशस्ति-पत्र’
अभियान की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार, कोर्स में पठन की परीक्षा उत्तीर्ण करने पर प्रतिभागियों को ‘गीता ई-प्रशस्ति-पत्र’ प्रदान किया जाएगा। यह अध्ययन प्रक्रिया से जुड़ा एक डिजिटल प्रमाणपत्र होगा।
किसी पाठ्यक्रम में नियमित रूप से भाग लेना, निर्धारित विषयों का अध्ययन करना और परीक्षा के माध्यम से अपनी समझ का आकलन करना सीखने की प्रक्रिया को व्यवस्थित बनाता है। ई-प्रशस्ति-पत्र प्रतिभागियों के लिए कोर्स पूरा करने की उपलब्धि का प्रतीक हो सकता है।
हालांकि, गीता के अध्ययन का वास्तविक उद्देश्य केवल प्रमाणपत्र प्राप्त करना नहीं, बल्कि उसके संदेशों को समझना और जीवन में उनके उपयोग पर विचार करना है। प्रमाणपत्र अध्ययन की उपलब्धि को दर्शा सकता है, जबकि ज्ञान का वास्तविक लाभ व्यक्ति के चिंतन, व्यवहार और कर्तव्यबोध में दिखाई देने वाले सकारात्मक बदलावों से जुड़ा है।
इसलिए प्रतिभागियों को परीक्षा की तैयारी के साथ-साथ श्लोकों के अर्थ और भाव को समझने तथा उन्हें अपने जीवन की परिस्थितियों से जोड़कर देखने का प्रयास करना चाहिए।
पूरे वर्ष का शुल्क 550 रुपये, कोर्स पूरा होने पर 500 रुपये रिफंड का विकल्प
गीता परिचय अभियान की ओर से उपलब्ध कराई गई जानकारी के अनुसार, एक वर्षीय गीता कोर्स-2027 का शुल्क पूरे वर्ष के लिए 550 रुपये निर्धारित किया गया है। कोर्स को सफलतापूर्वक पूरा करने पर 500 रुपये रिफंड लेने का विकल्प भी बताया गया है।
यह व्यवस्था उन लोगों के लिए अध्ययन से जुड़ने का अवसर प्रदान करती है, जो सीमित खर्च में नियमित रूप से गीता पढ़ना चाहते हैं। हालांकि, रिफंड की पात्रता, शर्तों, समय-सीमा और उसे प्राप्त करने की प्रक्रिया की पुष्टि पंजीकरण के समय संबंधित आधिकारिक माध्यम से कर लेनी चाहिए।
शुल्क जमा करने से पहले प्रतिभागियों को कोर्स की अवधि, उपलब्ध माध्यम, टाइम स्लॉट, परीक्षा, ई-प्रशस्ति-पत्र और रिफंड संबंधी नियमों को ध्यान से पढ़ना चाहिए। इससे पंजीकरण की प्रक्रिया स्पष्ट रहती है और कोर्स से जुड़ी आवश्यक जानकारी पहले ही प्राप्त हो जाती है।
गीता का ज्ञान : तनाव के बीच संतुलन और कर्तव्य की प्रेरणा
आधुनिक जीवन में सुविधाओं के विस्तार के साथ-साथ प्रतिस्पर्धा, अपेक्षाएं और समय की कमी भी अनेक लोगों के लिए चुनौती बन गई हैं। ऐसे में व्यक्ति के लिए केवल बाहरी सफलता पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं होता; उसे अपने विचारों, भावनाओं और निर्णयों को समझने के लिए भी समय चाहिए।
गीता का अध्ययन व्यक्ति को आत्मनिरीक्षण की दिशा में प्रेरित कर सकता है। यह उसे अपने कर्तव्य, इच्छाओं, अपेक्षाओं और निर्णयों के बीच संबंध को समझने का अवसर देता है। गीता के संदेशों पर विचार करते हुए व्यक्ति यह प्रश्न पूछ सकता है कि क्या वह परिस्थितियों के अनुसार विवेकपूर्ण निर्णय ले रहा है, क्या वह परिणाम की चिंता में अपने वर्तमान कर्तव्य से भटक रहा है और क्या वह दूसरों के प्रति अपने व्यवहार में संयम तथा संवेदनशीलता बनाए रख पा रहा है।
गीता का संदेश जीवन की समस्याओं से भागने के बजाय उनका सामना करने की प्रेरणा देता है। अर्जुन को भी युद्धक्षेत्र छोड़कर दुविधा से दूर जाने के बजाय अपनी परिस्थिति को समझने और कर्तव्य पर विचार करने का मार्ग दिखाया गया। इस दृष्टि से गीता का अध्ययन व्यक्ति को समस्याओं के बीच स्पष्ट सोच विकसित करने में मदद कर सकता है।
इसी तरह गीता में आत्मसंयम और समत्व की शिक्षाएं यह समझने का अवसर देती हैं कि हर परिस्थिति हमारे नियंत्रण में नहीं होती, लेकिन परिस्थितियों के प्रति हमारी प्रतिक्रिया पर विचार किया जा सकता है। असफलता आने पर उससे सीखना, सफलता मिलने पर विनम्र रहना और कठिन समय में भी उचित प्रयास जारी रखना गीता के अध्ययन से मिलने वाली व्यावहारिक प्रेरणाओं में शामिल हो सकता है।
यह ध्यान रखना भी जरूरी है कि आध्यात्मिक अध्ययन प्रत्येक व्यक्ति के लिए व्यक्तिगत अनुभव और समझ की प्रक्रिया है। इसका लाभ नियमितता, मनन और अपने व्यवहार में उपयोग करने के प्रयास से जुड़ा होता है।
गीता का अध्ययन परिवार और समाज के लिए भी उपयोगी
गीता में वर्णित कर्तव्य, संयम, सत्यनिष्ठा, विवेक और समर्पण जैसे विषय केवल व्यक्तिगत साधना तक सीमित नहीं हैं। इन पर विचार परिवार और समाज के प्रति व्यक्ति की जिम्मेदारियों को समझने में भी उपयोगी हो सकता है।
परिवार में अनेक बार विचारों का अंतर या परिस्थितियों का दबाव तनाव पैदा करता है। ऐसे समय में धैर्यपूर्वक सुनना, अपनी प्रतिक्रिया पर नियंत्रण रखना और दूसरे व्यक्ति के दृष्टिकोण को समझने का प्रयास करना संबंधों को बेहतर बनाने में सहायक हो सकता है। गीता का अध्ययन व्यक्ति को अपने व्यवहार की समीक्षा करने और जिम्मेदारी के साथ निर्णय लेने की प्रेरणा दे सकता है।
समाज में भी व्यक्ति की भूमिका केवल अपने हितों तक सीमित नहीं होती। दूसरों के प्रति सम्मान, अपने कार्य के प्रति ईमानदारी और सामूहिक कल्याण की भावना सामाजिक जीवन को मजबूत बनाती है। गीता में कर्म और कर्तव्य पर दिया गया जोर इस दिशा में चिंतन का आधार प्रदान करता है।
विद्यार्थियों के लिए यह अध्ययन अनुशासन, एकाग्रता और निरंतर प्रयास की प्रेरणा बन सकता है। युवाओं को अपने लक्ष्यों के प्रति गंभीर रहते हुए परिणामों के दबाव का संतुलित सामना करने की सीख मिल सकती है। वरिष्ठ नागरिकों के लिए यह आत्मचिंतन, आध्यात्मिक जिज्ञासा और नियमित अध्ययन का माध्यम बन सकता है। अलग-अलग जीवन परिस्थितियों में गीता के संदेशों को समझने का अनुभव अलग हो सकता है, लेकिन अध्ययन की प्रक्रिया व्यक्ति को अपने विचारों पर गंभीरता से विचार करने का अवसर देती है।
मोबाइल ऐप से आसानी से करें रजिस्ट्रेशन
गीता परिचय अभियान की प्रभारी सुधा गर्ग ने इच्छुक लोगों से आग्रह किया है कि वे गीता के एक वर्षीय कोर्स-2027 से जुड़ने के लिए अभियान के मोबाइल ऐप के माध्यम से रजिस्ट्रेशन करें। ऑनलाइन पंजीकरण के लिए मोबाइल के प्रकार के अनुसार नीचे दिए गए लिंक उपलब्ध हैं।
1. सामान्य एंड्रॉयड मोबाइल के लिए ऐप डाउनलोड लिंक:
2. एप्पल मोबाइल (iPhone) के लिए ऐप डाउनलोड लिंक:
इच्छुक प्रतिभागी अपने मोबाइल में संबंधित ऐप डाउनलोड कर उसमें उपलब्ध पंजीकरण प्रक्रिया और कोर्स संबंधी विवरण देखें। रजिस्ट्रेशन के दौरान भाषा, समय-सारिणी, ऑनलाइन या फिजिकल कक्षा तथा शुल्क और रिफंड की शर्तों की जानकारी ध्यान से प्राप्त करें।
जो लोग प्रत्यक्ष कक्षाओं में भाग लेना चाहते हैं, वे अग्रसेन भवन और भारत समन्वय धाम में उपलब्ध कक्षाओं के समय तथा संबंधित व्यवस्थाओं की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। पंजीकरण के बाद कोर्स से संबंधित निर्देशों का पालन करते हुए नियमित अध्ययन जारी रखना उपयोगी होगा।
सुधा गर्ग की अपील : समय निकालें, गीता से जुड़ें और जीवन को समझने का प्रयास करें
सुधा गर्ग ने कहा कि मनुष्य के जीवन में अनेक कार्य आवश्यक होते हैं, लेकिन अपने भीतर झांकने, जीवन के उद्देश्य को समझने और ज्ञान प्राप्त करने के लिए भी समय निकालना चाहिए। यदि सप्ताह में केवल दो घंटे देकर कोई व्यक्ति एक वर्ष तक गीता का नियमित अध्ययन कर सकता है, तो यह उसके लिए आत्मचिंतन की एक सार्थक शुरुआत हो सकती है।
उन्होंने लोगों से आग्रह किया कि वे गीता को केवल पूजा-पाठ तक सीमित न रखें, बल्कि उसके संदेशों को समझने और अपने व्यवहार में उतारने का प्रयास करें। गीता का ज्ञान व्यक्ति को अपने कर्तव्यों, विचारों और जीवन की प्राथमिकताओं पर पुनर्विचार करने का अवसर देता है। इसका अध्ययन किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं, बल्कि उन सभी लोगों के लिए उपयोगी हो सकता है जो जीवन को अधिक गहराई से समझना चाहते हैं।
सुधा गर्ग के अनुसार, जीवन का समय निरंतर आगे बढ़ता रहता है। इसलिए अच्छे कार्यों को अनावश्यक रूप से टालने के बजाय समय रहते शुरुआत करना महत्वपूर्ण है। गीता कोर्स-2027 इसी दिशा में एक अवसर है, जिसमें नियमित अध्ययन, अध्यायवार विवेचन और प्रश्नोत्तर के माध्यम से गीता के संदेशों को समझने का प्रयास किया जा सकता है।
गीता परिचय अभियान की ओर से एक वर्षीय गीता कोर्स-2027 के लिए ऑनलाइन और फिजिकल रजिस्ट्रेशन किए जा रहे हैं। इच्छुक व्यक्ति ऐप के माध्यम से पंजीकरण कर सकते हैं।
निवेदक: सुधा गर्ग, प्रभारी, गीता परिचय अभियान
संपर्क के लिए व्हाट्सऐप नंबर: 6378027172


