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Thursday, April 16, 2026, 10:15 am

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स्वामी दयानंद सरस्वती ने नारा दिया था- ‘वेदों की ओर लौटो’, और दैनिक भास्कर कहता है- ‘हरियाली की ओर लौटो’

5 जून विश्व पर्यावरण दिवस पर विशेष : दैनिक भास्कर का जीवनदायी अभियान…’एक पेड़ एक जिंदगी’; जिसने दुनिया को मंत्र दिया- हरियाली में ही जीवन है, हरियाली से ही जीवन है

दिलीप कुमार पुरोहित. भोपाल/ दिनेश कुमार पुरोहित. पटना/डीके पुरोहित. जयपुर

दैनिक भास्कर। 12 राज्य। 65 संस्करण। तीन भाषाएं। 14 करोड़ से अधिक पाठकों का इतिहास। भारत में जिस अखबार ने पत्रकारिता के मायने बदलकर रख दिए, जिसने अपने नित-नए प्रयोगों से, अनूठे और क्रांतिकारी आइडिया से, जिसने मंडे पॉजिटिव के वैश्विक सकारात्मक मंच ने एक वैश्विक परिवेश को बदलने का बीड़ा उठाया है। दैनिक भास्कर की आज हम चर्चा करेंगे उसके एक ऐसे अभियान की जिसने दुनिया को हरियाली से खुशहाली का मंत्र दिया। यह अभियान है- एक पेड़, एक जिंदगी…।

एक पेड एक जिंदगी अभियान के माध्यम से दैनिक भास्कर ने क्रांतिकारी बदलाव भारत में लाने का प्रयास किया है। इस अभियान के माध्यम से दैनिक भास्कर ने अनगिनत पौधे लगाए और पूरे देश में हरित चेतना जगाई। 5 जून — यह तारीख अब केवल एक दिन नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी बन चुकी है। विश्व पर्यावरण दिवस हमें हर साल यह याद दिलाने आता है कि इस धरती को सिर्फ उपयोग की वस्तु नहीं, बल्कि एक जीवंत अस्तित्व के रूप में देखा जाना चाहिए। जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, जंगलों की कटाई और जैवविविधता का नाश — यह सब विकास की दौड़ में पीछे छूटती प्रकृति की कराह हैं। लेकिन इसी शोरगुल के बीच एक सकारात्मक स्वर भी है — एक ऐसा प्रयास जो उम्मीद जगाता है। और यह स्वर है- “एक पेड़, एक ज़िंदगी” — दैनिक भास्कर का अभियान, जिसने हरियाली को जन आंदोलन का रूप दे दिया। विश्व में आधुनिकता और विकास के चलते जंगल कट रहे हैं। एक अनुमान के अनुसार पिछले 5 दशक में विकास के नाम पर 45 से 60 प्रतिशत जंगल और पेड़ कट चुके हैं। हमारे प्राकृतिक वातावरण और प्रकृति को जितना नुकसान पहुंचा है उसकी भरपाई नहीं हो सकती। ऐसे में धरती का तापमान बढ़ रहा है। मौसम तंत्र बदल रहा है। कभी बाढ़, कभी सूखा, कभी अत्यंत गर्मी तो कभी अत्यंत सर्दी…ऐसे ही माहौल के साथ क्या हमें जीना होगा?

वैश्विक तापमान वृद्धि, हिमनद पिघल रहे हैं, समुद्र का स्तर बढ़ रहा है। जंगलों की कटाई, जैवविविधता का नुकसान, वन्य जीवों का संकट गहरा रहा है। मौसम का असंतुलन, खेती चौपट, खाद्य संकट, रोगों में वृद्धि, प्रदूषण वायु, जल और मृदा सभी दूषित…। ऐसे ही माहौल में दैनिक भास्कर का अभियान नव प्राण और नव त्राण देता है। पिछले 50 वर्षों में 45-60% जंगल समाप्त हो चुके हैं। यह केवल आंकड़े नहीं, बल्कि पृथ्वी के फेफड़े खोने की दर्दनाक सच्चाई है। “विकास ऐसा हो, जो विनाश का कारण न बने।” शहरों का विस्तार, उद्योगों की वृद्धि, सड़कें, डैम, और खनन — यह सब विकास के नाम पर हुआ, पर प्रकृति की कीमत पर। प्राकृतिक आपदाएं, जैसे अनियमित वर्षा, भीषण गर्मी, बर्फबारी, बाढ़ और सूखा — ये सभी असंतुलित पर्यावरण का परिणाम हैं। ऐसे में दैनिक भास्कर ने अपनी जिम्मेदारी समझी और दुनिया को अनूठा मंत्र दिया। स्वामी दयानंद सरस्वती ने नारा दिया था- वेदों की ओर लौटो और दैनिक भास्कर ने दर्शन दिया है- हरियाली की ओर लौटो…। 

दैनिक भास्कर : पत्रकारिता नहीं, एक पर्यावरण योद्धा का स्वरूप

दैनिक भास्कर, जो वर्षों से सार्थक पत्रकारिता का पर्याय बना हुआ है, अब सिर्फ समाचारों की दुनिया तक सीमित नहीं रहा। उसने अपने सामाजिक दायित्व को समझते हुए, पर्यावरण जैसे गंभीर विषय को केवल शब्दों में नहीं, बल्कि कर्मों में भी पिरोया। ‘एक पेड़, एक ज़िंदगी’ अभियान दैनिक भास्कर की उस सोच का परिणाम है जो मानती है कि “पर्यावरण की रक्षा केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि हर नागरिक का धर्म है।” ‘एक पेड़, एक ज़िंदगी’ अभियान: हरियाली का जन आंदोलन है। इस अभियान की सबसे बड़ी खासियत इसकी सीधी और सरल सोच है — “हर व्यक्ति कम से कम एक पेड़ लगाए और उसकी ज़िम्मेदारी ले।”

अभियान की प्रमुख विशेषताएं 

देशभर में करोड़ों पौधों का रोपण।

स्कूलों, कॉलेजों, ग्राम पंचायतों, मंदिरों, गुरुद्वारों, मस्जिदों, चर्चों तक पहुंच।

आम नागरिकों से लेकर प्रशासनिक अधिकारियों, सेलेब्रिटीज, और किसानों की भागीदारी।

स्थानीय भाषाओं में जागरूकता अभियान।

हर पेड़ को एक ज़िंदगी से जोड़ने की भावनात्मक अपील।

यह कोई प्रचार नहीं, बल्कि धरती के साथ पुनः जुड़ने का भावनात्मक आंदोलन है।

एक अभियान, अनगिनत परिवर्तन

परिवर्तन का क्षेत्र प्रभाव

शहरी क्षेत्र शहरी गर्मी में कमी, हरियाली की वापसी। ग्रामीण क्षेत्र फलदार पौधे और औषधीय वृक्षों से आत्मनिर्भरता। स्कूल/कॉलेज पर्यावरण शिक्षा और व्यावहारिक जुड़ाव। प्रशासनिक सहयोग नीतियों में हरित सोच की झलक। मीडिया व सोशल प्लेटफ़ॉर्म्स हरियाली को ट्रेंड बनाना।

कुछ प्रेरक तथ्य

राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात, छत्तीसगढ़, बिहार, झारखंड जैसे राज्यों में करोड़ों पौधे रोपे गए।

हजारों स्कूलों और ग्राम सभाओं में हर वर्ष पौधरोपण उत्सव के रूप में आयोजन।

अभियान को कई भाषाओं में प्रचारित कर भाषाई विविधता में एकता का संदेश। एक सोच जो हमें दिशा देती है- दैनिक भास्कर का दृष्टिकोण…। “विकास हो, लेकिन प्रकृति के साथ। प्रगति हो, लेकिन हरियाली के साए में।” दैनिक भास्कर यह नहीं कहता कि आधुनिकता गलत है। लेकिन वह यह ज़रूर कहता है कि यदि हम प्रगति की राह में प्रकृति को कुचलते हुए चलेंगे, तो वह दिन दूर नहीं जब प्रगति भी ठहर जाएगी। इसलिए यह अभियान सिर्फ वृक्षारोपण नहीं, बल्कि एक विचार परिवर्तन है। यह लोगों के दिलों में वह बीज बो रहा है जो कल को हरियाली का वटवृक्ष बनेगा।

भारत की सांस्कृतिक जड़ों में पर्यावरण की पूजा

‘एक पेड़, एक ज़िंदगी’ की विचारधारा भारत की आध्यात्मिक परंपराओं से गहराई से जुड़ी है। रामायण में कहा गया है-श्रीराम का वनवास केवल निर्वासन नहीं, बल्कि प्रकृति के सान्निध्य में जीवन जीने की शिक्षा है। वेदों में उल्लेख है-  “वृक्षाय नमः” –
वेदों में वृक्षों को देवतुल्य माना गया है। महाभारत कहती है। युधिष्ठिर का कथन – “जो वृक्षों की रक्षा करता है, वही सच्चा राजा है।” यह संदेश दैनिक भास्कर के अभियान में झलकता है — आधुनिक माध्यम से प्राचीन ज्ञान का पुनर्जागरण।

क्या आप एक ज़िंदगी बचा सकते हैं?

हाँ! एक पौधा लगाकर और उसकी देखभाल करके। दैनिक भास्कर ने यह साबित किया कि कोरोना काल में ऑक्सीजन की कमी से पूरा देश और दुनिया किस तरह त्रस्त रही। जंगल के जंगल कटते गए और पेड़ कटने का नतीजा ऑक्सीजन की कमी के रूप में सामने आई। अब भी समय है। पेड़ लगाकर ही हम हमारी जीवन चेतना को फिर से जागृत कर सकते हैं।

वह वृक्ष किसी का श्वास बन सकता है, छांव बन सकता है, फल दे सकता है। आप क्या कर सकते हैं? अपने जन्मदिन पर पौधा लगाएं। स्कूल या कॉलोनी में वृक्षोत्सव आयोजित करें। पौधों की देखभाल करने वाले व्यक्तियों को सम्मानित करें। बच्चों को ‘पेड़ मित्र’ बनाएं।

क्यों जरूरी है हरियाली?

ऑक्सीजन जीवन का आधार। तापमान नियंत्रण, ग्लोबल वॉर्मिंग पर नियंत्रण। वर्षा जलवायु संतुलन। जैव विविधता, पशु-पक्षियों का संरक्षण।

लोगों की प्रतिक्रियाएं: जन मानस की भावनाएं

“मैंने अपने बेटे के जन्म पर नीम का पौधा लगाया। आज वह पेड़ और बेटा दोनों बड़े हो रहे हैं।” – उर्वशी, माता, भोपाल, मध्य प्रदेश से

“हमारे गांव में इस अभियान से एक सामूहिक चेतना आई है। अब हर घर के सामने एक पेड़ है।” – राजीव, ग्रामीण, मोहनगढ़ राजस्थान

“स्कूल के बच्चों ने जब अपने नाम से पेड़ गोद लिए, तो उनमें प्रकृति के प्रति प्रेम बढ़ा।” – रेहाना, शिक्षिका, पटना, बिहार से

भविष्य की राह : हम कहां जा रहे हैं?

दैनिक भास्कर का यह प्रयास यह बताता है कि मीडिया अगर चाहे तो वह केवल समाचार नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना का वाहक बन सकता है। “अगर हर भारतीय हर साल एक पेड़ लगाए, तो 140 करोड़ पेड़ हर साल — यह किसी क्रांति से कम नहीं।”  पेड़ नहीं लगाए तो ज़िंदगी खतरे में हैं। आज हमें सिर्फ अपने लिए नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए सोचना है। यदि हम आज पेड़ नहीं लगाएंगे, तो कल सांसें भी दुर्लभ हो जाएंगी। दैनिक भास्कर का ‘एक पेड़, एक ज़िंदगी’ अभियान हमें प्रेरणा देता है कि हर हाथ अगर एक पौधा लगाए, तो धरती स्वर्ग बन सकती है। “पेड़ वह कविता है जो धरती आसमान को लिखती है।” तो क्यों न हम सब मिलकर इस कविता को और सुंदर बनाएं? दुनिया के पर्यावरण संरक्षण के उदाहरण देखें तो कोस्टा रिका 98% ऊर्जा नवीनीकरणीय स्रोतों से प्राप्त कर रहा है। नॉर्वे में शत-प्रतिशत इलेक्ट्रिक बसें और गाड़ियां…। भूटान कार्बन निगेटिव देश, जहां हर नागरिक पेड़ लगाता है।
जापान फ़ॉरेस्ट बाथिंग (Shinrin-yoku) जैसी मानसिक स्वास्थ्य और पर्यावरण को जोड़ने वाली अवधारणा। भारत भी इन उदाहरणों से सीखते हुए अपनी परंपराओं को जोड़कर एक नया मॉडल प्रस्तुत कर सकता है।

“अगर आज हम पर्यावरण का ध्यान नहीं रखेंगे, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें क्षमा नहीं करेंगी।” हमें विकास चाहिए, लेकिन ऐसा विकास जो प्रकृति के साथ हो, प्रकृति के खिलाफ नहीं। भारत की समृद्ध परंपरा, आध्यात्मिक दृष्टिकोण और वैज्ञानिक चेतना मिलकर इस दिशा में क्रांति ला सकती है। अब समय आ गया है कि हम “विकास” और “संरक्षण” को एक ही सिक्के के दो पहलू मानकर चलें। “पेड़ लगाएं, जीवन बचाएं। प्रकृति से प्रेम करें, तभी हम स्वयं से प्रेम कर सकेंगे।”

अगर आप भी इस हरियाली की क्रांति से जुड़ना चाहते हैं?‌ पास की नर्सरी से पौधा लाएं। उसे घर, गली, स्कूल या किसी सार्वजनिक स्थान पर लगाएं। उसकी देखभाल करें और नाम रखें। उसकी तस्वीर सोशल मीडिया पर साथ साझा करें। हर वर्ष कम से कम 5 पेड़ लगाएं। बिजली की बचत करें। प्लास्टिक का प्रयोग न करें। प्राकृतिक वस्त्र और उत्पाद अपनाएं। विद्यालय और संस्थान पर्यावरण शिक्षा को अनिवार्य करें। ‘ग्रीन स्कूल’ कार्यक्रम लागू करें। छात्रों के लिए ‘एक पौधा – एक छात्र’ अभियान चलाएं।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor