तम्बाकू नियंत्रण की जगह, उसकी वैधता को मिली मुहर? सालाना 1000 रुपये में मिलेगा नशे का परमिट, मंत्री पर नशे के विस्तार का आरोप
डी के पुरोहित. जोधपुर
राजस्थान में तम्बाकू नियंत्रण की दिशा में सरकार द्वारा एक ऐसा कदम उठाया गया है, जिसने जनस्वास्थ्य विशेषज्ञों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और आम नागरिकों के बीच गहरी चिंता और रोष पैदा कर दिया है। नगरीय विकास एवं आवासन मंत्री झाबर सिंह खर्रा द्वारा हाल ही में घोषित यह नियम कि अब राज्य में तम्बाकू उत्पाद बेचने के लिए नगर निगम, नगर परिषद या नगरपालिका से लाइसेंस लेना अनिवार्य होगा, सराहनीय प्रतीत होता है, लेकिन इसके भीतर छुपी रणनीति ने गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
मामले की शुरुआत: लाइसेंस अनिवार्य लेकिन कीमत नाममात्र
सरकार ने कहा कि यह कदम तम्बाकू बिक्री को नियंत्रित करने और नाबालिगों को इससे दूर रखने के लिए उठाया गया है। लेकिन जैसे ही इस नियम की असली कीमत सामने आई — सालाना महज 1000 रुपये का शुल्क, तो तात्कालिक रूप से स्पष्ट हो गया कि सरकार ने तम्बाकू को हतोत्साहित नहीं, बल्कि उसे वैधता दी है।
यदि सरकार की मंशा वास्तव में नशे को नियंत्रित करने की होती, तो शुल्क को 1 लाख रुपये या इससे अधिक रखा जाता, जिससे छोटे दुकानदार और गली-नुक्कड़ पर धड़ल्ले से गुटखा, बीड़ी, सिगरेट बेचने वाले लोग इससे दूर रहते।
यह नियम न केवल तम्बाकू व्यापार को एक वैधानिक ढांचा देता है, बल्कि इस बात की भी इजाजत देता है कि अब कोई भी व्यक्ति एक मामूली रकम चुका कर नशे के कारोबार को खुलेआम चला सकता है।
मंत्री झाबर सिंह खर्रा पर लगे सवालों के घेरे: जनस्वास्थ्य से खिलवाड़ या कारोबारी लाभ?
यूडीएच मंत्री झाबर सिंह खर्रा ने इस निर्णय को “तम्बाकू विक्रेताओं पर निगरानी के लिए एक अनुशासनात्मक उपाय” बताया, लेकिन उनके बयान और निर्णय के बीच का अंतर काफी बड़ा दिख रहा है। सवाल उठ रहे हैं कि—
- क्या यह नियम वास्तव में जनस्वास्थ्य के हित में है या सिर्फ राजस्व बढ़ाने का तरीका?
- जब राज्य सरकार शराब की दुकानों को लाइसेंस देकर नियंत्रित करती है, तो क्या उसी तर्ज पर अब तम्बाकू भी एक वैध व्यवसाय माना जा रहा है?
- क्या यह नियम तम्बाकू लॉबी के दबाव में लाया गया है?
- सरकार को तम्बाकू से होने वाले राजस्व की चिंता है या नागरिकों के स्वास्थ्य की?
इन सभी सवालों पर यूडीएच मंत्री की चुप्पी और नीतिगत अस्पष्टता ने उन्हें कठघरे में खड़ा कर दिया है।
नियमों की वास्तविक स्थिति: ज़मीनी हकीकत बेहद भयावह
सरकार ने जो नियम घोषित किए हैं, वे कुछ हद तक सख्त दिखते हैं:
- 18 वर्ष से कम आयु के बच्चों को तम्बाकू बेचना अपराध है।
- स्कूल, कॉलेज, अस्पताल और बस अड्डों के 100 मीटर के दायरे में तम्बाकू उत्पादों की बिक्री प्रतिबंधित है।
- सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान दंडनीय अपराध है।
लेकिन इन नियमों की पालना शायद ही कहीं होती है।
एक सर्वे के अनुसार, राजस्थान के शहरी इलाकों में लगभग 62% पान की दुकानों पर 18 साल से कम उम्र के बच्चे आसानी से गुटखा, सिगरेट, बीड़ी खरीद लेते हैं। अधिकतर दुकानों पर “हम नाबालिगों को तम्बाकू नहीं बेचते” का बोर्ड मात्र एक दिखावे के लिए होता है।
जयपुर, कोटा, जोधपुर, अलवर और भीलवाड़ा जैसे शहरों में स्कूलों के बाहर गुटखा बेचने वाले दुकानदारों की भरमार है। खुद पुलिस और प्रशासन भी मानते हैं कि “मैनपावर की कमी” के चलते इन नियमों की पालना नहीं हो पाती।
तम्बाकू की सामाजिक और आर्थिक त्रासदी:
भारत सरकार के आंकड़ों के अनुसार, भारत में हर साल 13 लाख लोग तम्बाकू से जुड़ी बीमारियों के चलते अपनी जान गंवाते हैं। राजस्थान में यह आंकड़ा प्रतिवर्ष लगभग 80,000 से अधिक है।
WHO की रिपोर्ट बताती है कि भारत में 15 से 24 वर्ष की आयु के 29% युवा किसी न किसी रूप में तम्बाकू का सेवन करते हैं।
ऐसे में तम्बाकू को “लाइसेंस आधारित वैधता” देना क्या इस सामाजिक त्रासदी को बढ़ावा नहीं देना है?
विशेषज्ञों की राय: नीतिगत असफलता
समाजसेवी सरस्वती देवी कहती हैं,
“यह नियम तम्बाकू पर अंकुश लगाने का नहीं बल्कि उसके लिए एक व्यापारिक ढांचा तैयार करने का प्रयास है। अगर सरकार गंभीर होती तो तम्बाकू उत्पादों पर अतिरिक्त टैक्स, लाइसेंस शुल्क में वृद्धि और सख्त प्रवर्तन करती। यहां तो उल्टा किया गया है।”
सामाजिक कार्यकर्ता विजयलक्ष्मी कहती हैं,
“तम्बाकू विक्रेताओं को जब नाममात्र शुल्क पर लाइसेंस मिल जाएगा, तो ये व्यापार और फैल जाएगा। इससे नशे के खिलाफ जंग कमजोर होगी।”
एडवोकेट विजय शर्मा कहते हैं–
कोराना काल मे मेरे निवेदन आग्रह पर राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गेहलोत व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पूरे देश मे कोराना काल अवधी के लिए तम्बाकू की बिक्री सेवन व थूकने हेतु जनहित स्वास्थ व तम्बाकू नशे पर लगाम लगाकर सरकारी एडवाईजरी जारी कर व ऐतिहाासिक निर्णय लेकर कोराना बीमारी को रोकने मे जनहित मे मदद की थी जो सार्थक सिद्ध हुई
अब सरकार इस निर्णय के विरुद्घ जाकर 1000 एक हजार रुपए की नाम मात्र की राशि मे दुकानदार को लाइसेंस देकर खुला तम्बाकू नशा बेचने की प्रवती को बढ़ावा देकर पनाह देने का कार्य करने से तम्बाकू बिक्री पर बिल्कुल लगाम रोकथाम भी नही हो सकेगी.
तम्बाकू बिक्री की असलियत: बस अड्डों से स्कूल तक, सब जगह उपलब्ध
हमने जोधपुर के विभिन्न क्षेत्रों का दौरा किया। अधिकांश बस अड्डों के आसपास, सरकारी स्कूलों और अस्पतालों की दीवारों से सटे दुकानों पर तम्बाकू उत्पाद खुलेआम बिकते मिले।
जोधपुर में RSM स्कूल के पास एक दुकानदार ने कहा:
“हमें कोई नहीं रोकता। पुलिस भी कभी-कभी आती है, वो भी खुद सिगरेट लेकर जाती है।”
एक स्कूल के पास दुकान चला रहे व्यक्ति ने जब 15 साल के बच्चे को गुटखा दिया, और हमने सवाल किया, तो उसने हंसकर कहा:
“सब चलता है, साहब। कौन रोकता है?”
राजनीतिक चुप्पी: विपक्ष भी सवाल पूछने से बच रहा
हैरानी की बात यह है कि इस गंभीर विषय पर अब तक विपक्ष की ओर से कोई स्पष्ट विरोध या धरना-प्रदर्शन नहीं देखा गया है। कांग्रेस पार्टी की ओर से कोई बड़ी प्रतिक्रिया सामने नहीं आई, जबकि अन्य सामाजिक संगठनों और युवा संगठनों ने इस नीति को “जनविरोधी” बताया।
क्या हो सकते थे बेहतर उपाय?
- लाइसेंस शुल्क को 1 लाख रुपये तक बढ़ाया जा सकता था, जिससे गैर-जरूरी विक्रेता बाजार से बाहर हो जाते।
- शहरों में तम्बाकू फ्री ज़ोन बनाए जा सकते थे।
- सप्ताह में एक दिन “नो-तम्बाकू डे” घोषित कर सख्ती से पालन करवाया जा सकता था।
- पुलिस और नगर निगम की संयुक्त निगरानी टीमों का गठन होना चाहिए था।
- पब्लिक हेल्थ कैंपेन और स्कूल-स्तर पर जागरूकता कार्यक्रम अनिवार्य किए जाते।
जनता की राय: यह निर्णय जनस्वास्थ्य के साथ धोखा है
राजस्थान के नागरिक इस निर्णय को लेकर असंतुष्ट हैं। सोशल मीडिया पर भी इसके खिलाफ विरोध बढ़ रहा है।
एक नागरिक ने ट्वीट किया—
“1 हजार में तम्बाकू लाइसेंस? ये सरकार तम्बाकू फ्री राजस्थान बनाएगी या स्मोकिंग ज़ोन वाला राज्य?”
एक अन्य यूजर ने लिखा—
“अगर गुटखा और सिगरेट पर नियंत्रण नहीं कर सकते तो कम से कम उसका लाइसेंस तो मत दो। ये तो नशे का कानून बनाना हुआ।”
राइजिंग भास्कर तत्काल : जनस्वास्थ्य बनाम सरकारी राजस्व
यूडीएच मंत्री झाबर सिंह खर्रा के इस निर्णय ने यह साफ कर दिया है कि सरकार तम्बाकू पर अंकुश लगाने की इच्छुक नहीं है।
बल्कि यह एक ऐसा कानून बन गया है, जो नशे को बढ़ावा देता है, उसे वैधता प्रदान करता है और जनस्वास्थ्य को ताक पर रख देता है।
यदि सरकार सच में नशे के खिलाफ है, तो उसे इस नियम की समीक्षा करनी चाहिए, शुल्क को बढ़ाना चाहिए और सख्त प्रवर्तन नीति अपनानी चाहिए।
वरना वह दिन दूर नहीं जब तम्बाकू की वैधता देकर राजस्थान को “तम्बाकू राज्य” की संज्ञा मिल जाएगी।
तम्बाकू से जुड़ी मौतों के आंकड़े:
| वर्ष | भारत में मौतें | राजस्थान में अनुमानित मौतें |
|---|---|---|
| 2020 | 13 लाख | 75,000 |
| 2022 | 13.5 लाख | 80,000 |
स्कूल और अस्पताल के पास तम्बाकू बिक्री पर प्रतिबंध:
- निषिद्ध क्षेत्र: 100 मीटर की परिधि
- वास्तविक अनुपालन: 80% मामलों में नहीं होता
- निगरानी संस्थान: नगर निगम + पुलिस
- कार्यवाई: नगण्य









