दो बेटियों को खोने के दर्द को समाज की बेटियों की ताकत बनाने वाले जोधपुर के भीमराज सैन, जिन्होंने अपनी ‘प्रेम स्मृति बालिका शिक्षण सहायता संस्था’ के माध्यम से 10,000 से अधिक बालिकाओं को शिक्षा से जोड़ा।
दिलीप कुमार पुरोहित. राखी पुरोहित. जोधपुर
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बेटियां ईश्वर वो कृति है जिसे गढ़ने पर खुद उस पर परब्रह्म को अपनी रचना पर गर्व महसूस हुआ होगा। बेटियां जिस घर में होती है वह घर सही मायनों में स्वर्ग के समान होता है। जिसने अपनी बेटियों को खोने का दर्द सहा हो वही जानता है बेटियां नहीं होने का दर्द…आज हम एक ऐसे शख्स से इंटरव्यू करने जा रहे हैं जिन्होंने अपनी दो बेटियों को अल्पआयु में ही खो दिया। वे टूटे, उनका दुनिया से नाता ही टूट गया, मगर उन्होंने अपने आपको संभाला और एक वाकये के बाद उन्होंने प्रण लिया कि समाज की वंचित और कमजोर वर्ग की बेटियों का सहारा बनेंगे, उन्हें पढ़ने में मदद करेंगे और अब यह उनकी दिनचचर्या बन गई है। हालांकि उस शख्स ने मात्र चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के रूप में अपने कार्य की शुरुआत की और तकनकी कर्मचारी के रूप में काजरी से रिटायर्ड हुए मगर उन्होंने अपनी तनख्वाह का बड़ा हिस्सा समाज की कमजोर वर्ग की बेटियों को पढ़ाने में खर्च कर दिया और रिटायरमेंट के बाद भी यह कार्य जारी है। हम चर्चा कर रहे हैं भीमराज सैन की। उनसे राइजिंग भास्कर ने लंबी बातचीत की। यहां प्रस्तुत हैं संपादित अंश-
राइजिंग भास्कर: “सैन साहब, आपकी इस यात्रा की शुरुआत कैसे हुई?”
भीमराज सैन: यह यात्रा मेरे जीवन के सबसे कठिन समय से शुरू हुई। मेरी दूसरी बेटी निर्मला की अल्पायु में बीमारी से मौत हो गई थी और कुछ समय बाद मेरी तीसरी बेटी प्रेमलता एक दुर्घटना में मुझसे हमेशा के लिए बिछड़ गई। उस समय मेरा संसार बिखर गया था। मैंने अपनी दोनों बेटियों को पढ़ा-लिखाकर काबिल बनाने का सपना देखा था, लेकिन वह अधूरा रह गया। उसी अधूरे ख्वाब ने मुझे नई राह दिखाई—मैंने ठान लिया कि अब समाज की हर बेटी में मैं अपनी बेटियों की झलक देखूंगा और उन्हें शिक्षित बनाने की जिम्मेदारी उठाऊंगा।
राइजिंग भास्कर: “संस्था की स्थापना का विचार कब आया?”
भीमराज सैन: एक दिन मैं प्रेमलता के पुराने स्कूल गया। वहां दो कमजोर सी बच्चियां बैठी थीं, गंदे कपड़ों में, बिना स्कूल ड्रेस के। पता चला कि वे पाक विस्थापित मजदूर की बेटियां हैं। उसी क्षण लगा — इन बच्चियों की मदद करना ही मेरी बेटियों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। मैंने उन्हें बाजार ले जाकर ड्रेसें और किताबें दिलाईं। बस, वहीं से ‘प्रेम स्मृति बालिका शिक्षण सहायता संस्था’ की शुरुआत हुई। उस दिन से अब तक यह काम मेरी दिनचर्या बन गया है।
राइजिंग भास्कर : “संस्था किस तरह से काम करती है?”
भीमराज सैन: हम सीधी आर्थिक सहायता नहीं देते, बल्कि शिक्षा से जुड़ी वस्तुएं—किताबें, कॉपियाँ, पेंसिल, ड्रेस, बैग आदि देते हैं। जो छात्रा प्रथम स्थान प्राप्त करती है, उसे और जिस घर में बेटी का जन्म होता है, उसकी माँ को मैं चाँदी का सिक्का भेंट करता हूँ। यह केवल मदद नहीं, बल्कि समाज को संदेश है कि बेटी बोझ नहीं, सम्मान है।
राइजिंग भास्कर : “अब तक कितनी बालिकाओं तक पहुंची आपकी मुहिम?”
भीमराज सैन : साल 2001 से लेकर 2025 तक, मेरी संस्था ने 10,000 से अधिक बालिकाओं को शिक्षण सामग्री व प्रेरणा प्रदान की है। लूनी, भोपालगढ़, ओसियां, बिलाड़ा, सवाई माधोपुर, बाड़मेर, जालौर — इन सब जगहों के विद्यालयों में मैं स्वयं जाकर बच्चियों का स्वागत करता हूँ, तिलक लगाता हूँ और उन्हें सामग्री प्रदान करता हूँ। जब 2015 में जैसलमेर के लूणार गाँव की बेटी पूजा ने 10वीं पास की, तो मैं उसे चाँदी का सिक्का देने वहाँ तक गया। उसके चेहरे की मुस्कान आज भी मेरे लिए प्रेरणा है।
राइजिंग भास्कर : “आपने पर्यावरण संरक्षण को भी अपनी मुहिम से जोड़ा है, कैसे?”
भीमराज सैन: मैं मानता हूं कि शिक्षा और पर्यावरण दोनों ही समाज की नींव हैं। इसलिए हर साल विद्यालयों में पौधरोपण करता हूँ। अब तक 6,000 से अधिक पौधे लगाए जा चुके हैं। हर पौधे की जिम्मेदारी एक छात्रा को दी जाती है ताकि उनमें प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी की भावना विकसित हो। विद्यालयों में बैठने के लिए दरी-पट्टी, वाटर कूलर, शौचालय, इलेक्ट्रिक घंटी—इन सब चीज़ों की भी व्यवस्था करवाई है।
राइजिंग भास्कर : “कोरोना काल में आपकी भूमिका विशेष रही। उस समय आपने क्या किया?”
भीमराज सैन: कोरोना काल में जब लोग अपने घरों से निकलने से डरते थे, तब मैंने अपनी संस्था के माध्यम से दर्जी बैठाकर हज़ारों मास्क बनवाए और स्कूल के बच्चों में घर-घर जाकर वितरित किए। बालिकाओं को यह समझाना ज़रूरी था कि सुरक्षा ही सबसे बड़ी ताकत है। सोशल मीडिया के ज़रिए भी उन्हें सतर्क रहने और पढ़ाई जारी रखने के लिए संदेश भेजे।
राइजिंग भास्कर : “सरकारी सेवा में रहते हुए इतना बड़ा सामाजिक काम कैसे संभव हुआ?”
भीमराज सैन : मैंने 1984 में काजरी कार्यालय में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के रूप में कार्य शुरू किया और 2024 में तकनीकी कर्मचारी पद से सेवानिवृत्त हुआ। अपनी कमाई का अधिकांश भाग मैंने बालिका शिक्षा पर लगाया। मेरे कुछ वैज्ञानिक सहकर्मी भी इस मुहिम से जुड़े। मुझे यह नहीं लगता कि मदद के लिए बहुत धन चाहिए—बस एक सच्चा इरादा होना चाहिए।
राइजिंग भास्कर : “आपके इस कार्य को समाज ने कैसे देखा?”
भीमराज सैन: मुझे जोधपुर जिला कलेक्टर द्वारा 2016 में प्रशस्ति पत्र से सम्मानित किया गया, और कई सामाजिक संस्थाओं, विद्यालयों और पंचायतों से भी सराहना मिली। लेकिन मेरे लिए असली पुरस्कार वह मुस्कान है जो किसी बच्ची के चेहरे पर तब आती है जब वह कहती है — “साहब, अब मैं भी पढ़ूंगी।”
राइजिंग भास्कर : “आख़िर में, आपकी इस यात्रा का मूल संदेश क्या है?”
भीमराज सैन: मेरा मानना है — “बेटी को पढ़ाना सिर्फ एक परिवार नहीं, पूरे समाज को उजाला देना है।”
मैंने अपनी दो बेटियों को खोया, लेकिन अब हर बेटी में उन्हीं की झलक देखता हूँ। जब कोई बच्ची स्कूल जाती है, तो मुझे लगता है मेरी बेटियाँ मुस्कुरा रही हैं। बस यही मेरे जीवन का सच्चा सुख है।
व्यक्तिगत दुख से भी निकल सकती है सेवा की राह
भीमराज सैन की यह कहानी इस बात का जीवंत उदाहरण है कि व्यक्तिगत दुख भी समाज के लिए प्रेरणा बन सकता है। उन्होंने अपने आंसुओं को सेवा में बदला और अपनी बेटियों की स्मृति को हज़ारों बच्चियों की रोशनी बना दिया। आज जोधपुर और आसपास के क्षेत्रों में जब कोई बच्ची स्कूल का पहला कदम रखती है, तो कहीं न कहीं भीमराज सैन की दुआ उसके साथ चलती है — “पढ़ो बेटी, बढ़ो बेटी।”














