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Thursday, April 16, 2026, 12:12 pm

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आँसुओं से आत्मविश्वास तक: मंजू मेघवाल की अदम्य संघर्षगाथा

विपरीत परिस्थितियों को मात देकर पटवारी बनी तिलवासनी की बेटी

दिलीप कुमार पुरोहित, जोधपुर

9783414079 diliprakhai@gmail.com

राजस्थान की मिट्टी में संघर्ष की कहानियाँ नई नहीं हैं, लेकिन कुछ दास्तानें ऐसी होती हैं जो दिल को छू जाती हैं और समाज को आईना दिखा जाती हैं। तिलवासनी की बेटी और सोडा खारिया न्यूज सोजत पाली की बहू मंजू मेघवाल की कहानी भी ऐसी ही है—जहाँ दर्द ने उन्हें तोड़ा नहीं, बल्कि गढ़ा।

कम उम्र में विवाह, फिर असमय पति का निधन, और उसके कुछ समय बाद इकलौते भाई को खो देने का दोहरा आघात—यह सब किसी भी महिला को भीतर तक झकझोर सकता है। लेकिन मंजू ने अपने आँसुओं को ताकत में बदला और नौ वर्षों के अथक संघर्ष के बाद 2024 में पटवारी बनकर न केवल अपने बच्चों का भविष्य संवार दिया, बल्कि पूरे क्षेत्र के लिए प्रेरणा बन गईं। प्रस्तुत है मंजू मेघवाल से विशेष बातचीत—

“पति की मृत्यु ने सब कुछ बदल दिया”

प्रश्न: आपके जीवन में सबसे बड़ा मोड़ कब आया?

मंजू: मेरा विवाह 20 मई 2013 को हुआ था। जिंदगी सामान्य चल रही थी, लेकिन अगस्त 2016 में मेरे पति का असामयिक निधन हो गया। उस समय मेरे बच्चे बहुत छोटे थे। आर्थिक स्थिति कमजोर थी और समाज की नजरें भी बदल गई थीं। लगा जैसे सब कुछ खत्म हो गया।

पति के निधन के ढाई महीने बाद ही मेरे इकलौते भाई महेंद्र का भी देहांत हो गया। यह दोहरा आघात मेरे लिए असहनीय था। कई रातें ऐसी बीतीं जब नींद नहीं आई, भविष्य अंधकारमय दिखता था।

“विधवा नहीं, विजेता बनना चाहती थी”

प्रश्न: उस दौर में समाज का रवैया कैसा रहा?

मंजू: ग्रामीण परिवेश में एक युवा महिला के लिए विधवा होना आसान नहीं है। लोग सहानुभूति भी देते हैं और सीमाएँ भी तय कर देते हैं। मुझे ‘विधवा’ कहकर दायरे में बांधने की कोशिश की गई। कई लोगों ने कहा—“अब बच्चों का भविष्य क्या होगा?”

लेकिन मैंने तय कर लिया था कि मैं खुद को दया की पात्र नहीं बनने दूँगी। मैंने अपने लिए ‘विधवा’ शब्द नहीं, ‘विजेता’ शब्द चुना।

पढ़ाई को बनाया हथियार

प्रश्न: आपने खुद को संभालने के लिए क्या किया?

मंजू: मैंने पढ़ाई को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया। निजी स्कूल में अध्यापन कार्य किया, ट्यूशन पढ़ाए और किराए के कमरे में रहकर बच्चों की परवरिश की। 2018 में बी.ए. पूरा किया, 2021 में बी.एड., और 2023-24 में बी.एस.टी.सी. की पढ़ाई पूरी की।

इसी दौरान पटवारी, एलडीसी, आरएएस, रीट जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी भी करती रही। कई बार असफल हुई, लेकिन हर असफलता ने मुझे और मजबूत बनाया।

“हर असफलता ने मुझे नया सबक दिया”

प्रश्न: क्या कभी लगा कि अब आगे नहीं बढ़ पाऊँगी?

मंजू: हाँ, कई बार। आर्थिक तंगी, बच्चों की जिम्मेदारी और समाज का दबाव—सब कुछ एक साथ था। लेकिन जब भी टूटने लगती, बच्चों की मुस्कान मुझे फिर खड़ा कर देती। मैंने ठान लिया था कि मेरे बच्चे कभी खुद को कमजोर महसूस नहीं करेंगे।

2024: सपनों को मिली उड़ान

प्रश्न: पटवारी चयन का क्षण कैसा था?

मंजू: 2024 में जब मेरा चयन पटवारी पद पर हुआ और नियुक्ति पत्र हाथ में आया, तो आँखों में खुशी के आँसू थे। यह सिर्फ नौकरी नहीं थी, बल्कि संघर्ष की जीत थी। मुझे लगा कि मेरे पति और भाई की आत्मा भी आज खुश होगी।

आज जब मैं पटवारी के रूप में काम करने जा रही हूँ, तो आत्मविश्वास और जिम्मेदारी दोनों का एहसास होता है।

समाज के सहयोग ने बढ़ाया हौसला
प्रश्न: क्या किसी ने आपका साथ दिया?

मंजू: हाँ, समाज के कुछ संवेदनशील लोगों ने आर्थिक और नैतिक सहयोग दिया। परिवार का भी साथ मिला। यही सहयोग मेरी ताकत बना।

“लड़कियों के साथ-साथ लड़कों के लिए भी सोचें”

प्रश्न: आपने आर्थिक रूप से कमजोर लड़कों के लिए योजनाओं की बात कही है, क्यों?

मंजू: समाज और सरकार लड़कियों के लिए कई योजनाएँ बनाती हैं, जो अच्छी बात है। नवरात्रि में कन्याओं को भोजन करवाया जाता है, छात्रवृत्तियाँ दी जाती हैं। लेकिन कई लड़के भी आर्थिक रूप से कमजोर होते हैं, फिर भी उन्हें उतना समर्थन नहीं मिलता।

हर गरीब बच्चा—चाहे वह लड़की हो या लड़का—समान अवसर का हकदार है। कई होनहार लड़के संसाधनों के अभाव में पीछे रह जाते हैं। उनके लिए भी विशेष योजनाएँ होनी चाहिए।

बदलता समाज, नई सोच

प्रश्न: आपकी सफलता समाज को क्या संदेश देती है?

मंजू: यह कहानी बताती है कि यदि परिवार और समाज सहयोग दें, तो कोई भी महिला अपनी दिशा बदल सकती है। विधवा होना किसी की पहचान नहीं है। पहचान उसके साहस और कर्म से बनती है।

आने वाली पीढ़ी के लिए प्रेरणा

आज पीपाड़ शहर और आसपास के गांवों में मंजू मेघवाल एक प्रेरणा बन चुकी हैं। जिन लोगों ने कभी उन्हें कमजोर समझा था, वे आज उनकी सफलता पर तालियाँ बजा रहे हैं।

उनकी कहानी सिर्फ एक सरकारी नौकरी पाने की दास्तान नहीं, बल्कि आत्मसम्मान, साहस और संकल्प की अमर गाथा है। यह गाथा हर उस महिला को प्रेरित करती है जो विपरीत परिस्थितियों से जूझ रही है, और हर उस युवक को भी संदेश देती है कि संघर्ष कभी व्यर्थ नहीं जाता।

संघर्ष ही असली पहचान

मंजू मेघवाल ने साबित कर दिया कि हालात चाहे कितने भी कठिन क्यों न हों, दृढ़ निश्चय, शिक्षा और मेहनत से हर मुकाम हासिल किया जा सकता है।

उनकी आँखों में आज जो चमक है, वह सिर्फ सफलता की नहीं, बल्कि आत्मविश्वास और सम्मान की है। यह कहानी हमें सिखाती है कि जीवन की असली जीत परिस्थितियों से भागने में नहीं, बल्कि उनका सामना करने में है। मंजू मेघवाल—एक नाम, एक संघर्ष, एक प्रेरणा।

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor