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Thursday, April 16, 2026, 7:01 am

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 ‘सोनार नगरी’ पर गंदगी का साया: आखिर कब जागेगा प्रशासन?

विश्व प्रसिद्ध पर्यटन शहर जैसलमेर में बदहाल सफाई व्यवस्था, जिला कलेक्टर और नगर परिषद पर उठे गंभीर सवाल

कैलाश बिस्सा, जैसलमेर

स्वर्णनगरी जैसलमेर, जिसे उसकी स्वर्णिम आभा, ऐतिहासिक धरोहरों और विश्व स्तरीय पर्यटन पहचान के कारण “सोनार नगरी” कहा जाता है, आज अपनी मूल पहचान से दूर होती दिखाई दे रही है। कभी सोने सी चमकने वाली यह नगरी अब जगह-जगह फैली गंदगी, बदहाल सफाई व्यवस्था और प्रशासनिक उदासीनता के कारण सवालों के घेरे में है। शहर की सड़कों, कॉलोनियों और सार्वजनिक स्थलों की हालत देखकर यह मानना कठिन हो जाता है कि यही वह शहर है जो देश-विदेश के पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता है।

हर गली में कचरे का ढेर, हर सड़क पर बहता पानी

शहर के अनेक इलाकों में सुबह-सुबह सड़कों पर पानी बहता दिखाई देता है। कहीं टंकियों के पास पाइपलाइन लीकेज से पानी व्यर्थ बह रहा है तो कहीं नालियों की सफाई न होने से गंदा पानी सड़कों पर फैल चुका है। कई कॉलोनियों में तो हालात इतने खराब हैं कि सड़कों पर तालाब जैसे हालात बन गए हैं। कचरे के ढेर खुले में सड़ रहे हैं, जिनसे उठती दुर्गंध स्थानीय लोगों का जीना दूभर कर रही है।

स्वर्णनगरीवासी लगातार वीडियो और फोटो सोशल मीडिया पर साझा कर प्रशासन का ध्यान आकर्षित करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन हालात जस के तस बने हुए हैं। सवाल यह उठता है कि क्या नगर परिषद प्रशासन और जिला प्रशासन को यह सब दिखाई नहीं देता? या फिर जानबूझकर आंखें मूंद ली गई हैं?

पर्यटन नगरी की छवि पर आघात

जैसलमेर की पहचान केवल एक शहर के रूप में नहीं, बल्कि एक विश्व प्रसिद्ध पर्यटन स्थल के रूप में है। यहां का ऐतिहासिक किला, हवेलियां और सांस्कृतिक विरासत दुनिया भर के पर्यटकों को आकर्षित करती हैं। लेकिन यदि शहर की मूलभूत सफाई व्यवस्था ही चरमरा जाए, तो पर्यटकों के मन में कैसी छवि बनेगी?

पर्यटन केवल स्मारकों और आयोजनों से नहीं चलता; शहर की स्वच्छता, बुनियादी सुविधाएं और सुव्यवस्थित व्यवस्थाएं ही उसकी असली पहचान होती हैं। यदि पर्यटक गंदगी, बदबू और जलभराव का सामना करेंगे, तो वे अपने साथ सकारात्मक अनुभव नहीं, बल्कि नकारात्मक संदेश लेकर जाएंगे। इससे न केवल शहर की छवि धूमिल होगी, बल्कि स्थानीय व्यापार और पर्यटन उद्योग को भी नुकसान पहुंचेगा।

नगर परिषद और जिला प्रशासन पर गंभीर प्रश्न

नगर परिषद की प्राथमिक जिम्मेदारी शहर को साफ-सुथरा रखना है। नियमित कचरा संग्रहण, नालियों की सफाई, जल निकासी व्यवस्था और जल संरक्षण—ये सभी मूलभूत कार्य हैं। लेकिन वर्तमान हालात बताते हैं कि इन जिम्मेदारियों के निर्वहन में गंभीर कमी है।

जिला कलेक्टर पर्यटन योजनाओं और बैठकों में सक्रिय नजर आते हैं, लेकिन क्या उन्होंने कभी शहर के वार्डों का औचक निरीक्षण किया? क्या उन्होंने गंदगी और जलभराव की समस्या को प्राथमिकता में रखा? यदि रखा, तो परिणाम क्यों नजर नहीं आते?

यह प्रश्न भी उठता है कि क्या नगर परिषद प्रशासन के पास संसाधनों की कमी है, या फिर इच्छाशक्ति का अभाव? यदि संसाधन नहीं हैं तो राज्य सरकार से मांग क्यों नहीं की जाती? और यदि संसाधन उपलब्ध हैं तो उनका उपयोग प्रभावी ढंग से क्यों नहीं हो रहा?

स्वास्थ्य पर मंडराता खतरा

गंदगी केवल सौंदर्य का प्रश्न नहीं, बल्कि स्वास्थ्य का भी गंभीर मुद्दा है। खुले में पड़ा कचरा और जमा पानी मच्छरों व अन्य कीटों को पनपने का अवसर देता है, जिससे डेंगू, मलेरिया और अन्य संक्रामक बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। आमजन इस स्थिति से त्रस्त हैं। बच्चों, बुजुर्गों और महिलाओं के लिए यह स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक है।

यदि समय रहते इस समस्या का समाधान नहीं किया गया, तो यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट का रूप ले सकती है।

जवाबदेही तय होनी चाहिए

लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रशासन जनता के प्रति जवाबदेह होता है। यदि शहर की स्वच्छता जैसी मूलभूत जिम्मेदारी में विफलता सामने आती है, तो उसकी समीक्षा और जवाबदेही तय होना आवश्यक है। नगर परिषद प्रशासन को स्पष्ट करना चाहिए कि नियमित सफाई अभियान क्यों प्रभावी नहीं हैं? जल निकासी व्यवस्था में सुधार के लिए क्या कदम उठाए गए? और भविष्य की क्या कार्ययोजना है?

जिला प्रशासन को भी यह बताना चाहिए कि पर्यटन नगरी की छवि को बनाए रखने के लिए स्वच्छता के क्षेत्र में क्या ठोस कदम उठाए गए हैं।

राज्य सरकार से अपेक्षा

स्थिति की गंभीरता को देखते हुए राज्य सरकार को इस विषय पर संज्ञान लेना चाहिए। यदि स्थानीय स्तर पर व्यवस्थाएं प्रभावी नहीं हैं, तो उच्च स्तर पर समीक्षा और आवश्यक प्रशासनिक बदलाव पर विचार किया जाना चाहिए। साथ ही, शहर की स्वच्छता के लिए विशेष अभियान, अतिरिक्त संसाधन और निगरानी तंत्र लागू किए जाने चाहिए।

जनता की भागीदारी भी जरूरी

हालांकि प्रशासन की जिम्मेदारी सर्वोपरि है, लेकिन नागरिकों की सहभागिता भी आवश्यक है। कचरा निर्धारित स्थान पर डालना, जल संरक्षण का ध्यान रखना और स्वच्छता के प्रति जागरूक रहना—ये सभी कदम शहर को बेहतर बनाने में सहायक हो सकते हैं। परंतु जब मूलभूत व्यवस्था ही कमजोर हो, तो नागरिकों का प्रयास भी सीमित रह जाता है।

क्या फिर चमकेगी सोनार नगरी?

जैसलमेर की पहचान उसकी स्वर्णिम विरासत है। यह शहर केवल राजस्थान का नहीं, बल्कि पूरे देश का गौरव है। लेकिन वर्तमान हालात चिंता पैदा करते हैं। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो “सोनार नगरी” का यह गौरवशाली नाम केवल स्मृतियों तक सीमित रह जाएगा।

अब समय है कि प्रशासन आत्ममंथन करे, जवाबदेही तय करे और ठोस कार्रवाई के माध्यम से शहर को स्वच्छ और व्यवस्थित बनाने की दिशा में कार्य करे। स्वर्णनगरी को उसकी पुरानी चमक लौटाना केवल एक लक्ष्य नहीं, बल्कि सामूहिक दायित्व है।

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor