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Thursday, April 16, 2026, 7:46 am

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छतरियों में सजेगी संस्कृति की झांकी तो पर्यटन पकड़ेगा नई उड़ान

गड़सीसर चौराहे की जगमग छतरी को ‘ओपन हेरिटेज गैलरी’ बनाने का युवा हिमांशु शेखर भाटिया का अभिनव सुझाव

दिलीप कुमार पुरोहित | जैसलमेर

स्वर्णनगरी जैसलमेर अपनी पीली धूप, पीत पाषाण की आभा और समृद्ध लोक संस्कृति के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध है। जब भी कोई पर्यटक रेल या बस से इस ऐतिहासिक शहर में प्रवेश करता है, तो सबसे पहले उसकी नजर जिस स्थल पर ठहरती है, वह है विश्व प्रसिद्ध गड़सीसर झील के समीप स्थित चौराहा। हाल ही में यहां परंपरागत राजस्थानी शैली में निर्मित एक भव्य छतरी ने शहर की पहचान में एक और सुनहरा अध्याय जोड़ दिया है।

रात्रि में आकर्षक लाइटिंग से जगमगाती यह छतरी पीले पत्थर की दमकती आभा के साथ पर्यटकों का स्वागत करती है। दूर से ही इसकी नक्काशी और स्थापत्य कला मन मोह लेती है। लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल सुंदर निर्माण ही पर्याप्त है? क्या इसे एक जीवंत सांस्कृतिक केंद्र में बदला जा सकता है?

इन्हीं प्रश्नों का सृजनात्मक उत्तर लेकर सामने आए हैं जैसलमेर के युवा हिमांशु शेखर भाटिया।

युवा सोच, नया विजन

हिमांशु शेखर भाटिया ने जिला प्रशासन को एक अभिनव सुझाव भेजा है। उन्होंने जिला कलेक्टर प्रताप सिंह और नगर परिषद के अधिकारियों को प्रस्ताव दिया है कि इस नव-निर्मित छतरी को केवल स्थापत्य आकर्षण तक सीमित न रखकर इसे “ओपन हेरिटेज गैलरी” के रूप में विकसित किया जाए।

हिमांशु का सुझाव है कि छतरी की केनोपी (अंतरंग छत), दीवारों और आसपास पिक्चर स्टैंड के माध्यम से जैसलमेर की कला, संस्कृति, इतिहास और लोकजीवन से जुड़ी तस्वीरों का चित्रण किया जाए। इन चित्रों के साथ संक्षिप्त विवरण भी अंकित हों, ताकि पर्यटक न केवल दृश्य सौंदर्य का आनंद लें, बल्कि ज्ञानवर्धक जानकारी भी प्राप्त कर सकें।

विशेष बात यह है कि हिमांशु ने एआई तकनीक का उपयोग कर इन संभावित चित्रों का प्रारूप भी तैयार किया है और एक विस्तृत रोडमैप प्रशासन को सौंपा है।

कैसी हो सकती है सांस्कृतिक केनोपी?

हिमांशु के प्रस्ताव के अनुसार—

  • छतरी की अंदरूनी केनोपी में गोलाकार पैनल बनाकर ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृश्यों का चित्रण किया जाए।

  • केंद्र में रेगिस्तान और ऊंट का प्रतीक चिह्न, जो जैसलमेर की पहचान से जुड़ा है।

  • चारों ओर भाटी शासकों के ऐतिहासिक प्रसंग, मरुस्थलीय जीवन और लोक परंपराओं के दृश्य। इसी तरह लोक संगीत की स्वरलहरियां बिखराते कलाकारों के जीवंत दृश्य भी साकार किए जा सकते हैं। हवेलियां और झरोखे भी दर्शाए जा सकते हैं।

इससे छतरी केवल बैठने या फोटो खिंचवाने का स्थान न रहकर एक जीवंत सांस्कृतिक अनुभव बन जाएगी।

वॉल पिक्चर्स में झलके जैसलमेर की आत्मा

यदि छतरी की दीवारों पर भित्ति चित्र उकेरे जाएं तो उनमें निम्न विषय शामिल किए जा सकते हैं—

  • जैसलमेर किला (सोनार किला) का भव्य दृश्य

  • पटवों की हवेली की नक्काशी

  • मरुस्थल में ऊंटों का कारवां

  • कालबेलिया और घूमर जैसे लोक नृत्य

  • मंगनियार और लंगा समुदाय की संगीत परंपरा

  • पारंपरिक वेशभूषा और आभूषण

प्रत्येक चित्र के नीचे हिंदी और अंग्रेजी में 4–5 पंक्तियों का विवरण अंकित हो। आधुनिकता के साथ कदम मिलाते हुए QR कोड भी जोड़े जा सकते हैं, जिनसे पर्यटक अपने मोबाइल पर विस्तृत जानकारी या ऑडियो गाइड सुन सकें।

पिक्चर स्टैंड से बनेगा ‘फोटो और नॉलेज पॉइंट’

छतरी के आसपास सुव्यवस्थित पिक्चर स्टैंड लगाए जाएं। इन पर जैसलमेर के प्रमुख पर्यटन स्थलों, लोक कलाकारों, ऐतिहासिक प्रसंगों और रेगिस्तानी जीवन की तस्वीरें प्रदर्शित हों। यह स्थान पर्यटकों के लिए एक आदर्श “फोटो पॉइंट” बन सकता है। सोशल मीडिया के इस दौर में आकर्षक बैकग्राउंड स्वयं शहर का ब्रांड एंबेसडर बन जाता है।

रोजगार और संरक्षण की दोहरी पहल

हिमांशु का मानना है कि इस परियोजना से स्थानीय कलाकारों, चित्रकारों और शिल्पकारों को रोजगार मिलेगा। जैसलमेर की लोक कला और विरासत को संरक्षण भी मिलेगा।

आज आवश्यकता है कि पर्यटन केवल स्मारकों तक सीमित न रहे, बल्कि सांस्कृतिक अनुभव का माध्यम बने। यदि पर्यटक यहां आकर केवल तस्वीरें ही नहीं, बल्कि इतिहास और परंपराओं से जुड़ी जानकारी भी लेकर जाएं, तो यह शहर की पहचान को और मजबूत करेगा।

रात्रिकालीन आकर्षण का विस्तार

वर्तमान में छतरी रात्रि में लाइटिंग से अत्यंत आकर्षक लगती है। यदि सांस्कृतिक चित्रण भी जोड़ा जाए तो यह प्रभाव कई गुना बढ़ सकता है। पीले प्रकाश में दमकती दीवारों पर उकेरे गए चित्र पर्यटकों को अद्भुत अनुभव देंगे।

शाम के समय हल्की लोक संगीत की धुनें और सप्ताह में एक दिन लोक कलाकारों की लाइव प्रस्तुति इस स्थान को एक सांस्कृतिक चौपाल का रूप दे सकती है।

प्रशासन के पाले में फैसला

हिमांशु शेखर भाटिया का यह सुझाव फिलहाल जिला प्रशासन और नगर परिषद के विचाराधीन है। अभी तक इस पर कोई औपचारिक निर्णय नहीं लिया गया है, लेकिन यदि इसे मंजूरी मिलती है तो यह प्रयोग जैसलमेर के पर्यटन में मील का पत्थर साबित हो सकता है। राइजिंग भास्कर का भी मानना है कि ऐसे जागरूक युवाओं के सुझावों को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। प्रशासन यदि इस इनोवेशन को अपनाता है, तो यह न केवल छतरी की सार्थकता सिद्ध करेगा बल्कि शहर को एक नई पहचान भी देगा।

पर्यटन को ऊंचाई देने का अवसर

आज प्रतिस्पर्धा के दौर में हर पर्यटन स्थल खुद को विशिष्ट बनाने की कोशिश कर रहा है। जैसलमेर के पास ऐतिहासिक धरोहरों की कोई कमी नहीं है, लेकिन प्रस्तुति के नए आयाम जोड़ना समय की मांग है। यदि गड़सीसर चौराहे की यह छतरी सांस्कृतिक गैलरी का रूप लेती है, तो यह शहर में प्रवेश करते ही पर्यटकों को एक अलग अनुभव देगी। यह संदेश जाएगा कि जैसलमेर केवल इतिहास का शहर नहीं, बल्कि जीवंत संस्कृति का केंद्र है।

एक छोटी पहल, बड़ा प्रभाव

हिमांशु शेखर भाटिया का सुझाव केवल एक कलात्मक प्रयोग नहीं, बल्कि पर्यटन विकास की ठोस रणनीति है। छतरियों में केनोपी, वॉल पिक्चर्स और पिक्चर स्टैंड के माध्यम से यदि जैसलमेर की विविधरंगी संस्कृति को प्रदर्शित किया जाता है, तो यह पहल ज्ञान, आकर्षण और रोजगार—तीनों को एक साथ आगे बढ़ाएगी। अब नजर जिला प्रशासन और नगर परिषद के निर्णय पर है। यदि यह योजना साकार होती है तो स्वर्णनगरी के प्रवेश द्वार पर सजी यह छतरी सचमुच जैसलमेर की आत्मा का दर्पण बन जाएगी—जहां हर पर्यटक को इतिहास, कला और संस्कृति का समृद्ध अनुभव मिलेगा।

“स्वर्णनगरी की सांस्कृतिक पहचान को दें नई उड़ान”

राइजिंग भास्कर की जिला कलेक्टर से विशेष अपील

स्वर्णनगरी जैसलमेर की ऐतिहासिक धरोहरें विश्वभर में अपनी अलग पहचान रखती हैं। गड़सीसर झील के समीप नव-निर्मित छतरी ने शहर के प्रवेश द्वार को भव्यता प्रदान की है। रात्रि में इसकी सुनहरी आभा और पारंपरिक स्थापत्य पर्यटकों को आकर्षित कर रहे हैं। यह पहल निश्चित रूप से सराहनीय है।

किन्तु राइजिंग भास्कर का मानना है कि यह केवल शुरुआत है—अभी संभावनाओं का आकाश शेष है।

हम जिला कलेक्टर से विनम्र अपील करते हैं कि युवा हिमांशु शेखर भाटिया द्वारा प्रस्तुत अभिनव सुझाव पर गंभीरता से विचार किया जाए। छतरी की केनोपी, दीवारों और पिक्चर स्टैंड के माध्यम से यदि जैसलमेर की कला, संस्कृति, लोक परंपराओं और ऐतिहासिक धरोहरों का सजीव चित्रण किया जाता है, तो यह स्थान एक “ओपन हेरिटेज गैलरी” के रूप में विकसित हो सकता है।

यह प्रयोग केवल सौंदर्यवर्धन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पर्यटकों के लिए ज्ञानवर्धक और प्रेरणादायी अनुभव बनेगा। आज का पर्यटक केवल दृश्य नहीं, बल्कि कहानी और संदर्भ भी जानना चाहता है। यदि यहां ऐतिहासिक स्थलों, लोक कलाकारों, मरुस्थलीय जीवन, स्थापत्य वैभव और सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़े चित्र व संक्षिप्त विवरण प्रदर्शित हों, तो शहर में प्रवेश करते ही पर्यटक जैसलमेर की आत्मा से परिचित हो सकेंगे।

इस पहल से स्थानीय चित्रकारों, शिल्पकारों और लोक कलाकारों को भी रोजगार के अवसर मिलेंगे। सांस्कृतिक संरक्षण और पर्यटन संवर्धन—दोनों लक्ष्य एक साथ पूरे होंगे। साथ ही, सोशल मीडिया युग में यह स्थान “फोटो और नॉलेज पॉइंट” के रूप में शहर की सकारात्मक छवि को देश-विदेश तक पहुंचाएगा।

राइजिंग भास्कर का यह भी सुझाव है कि इस परियोजना के लिए विशेषज्ञों, इतिहासकारों और स्थानीय कलाकारों की एक छोटी समिति गठित की जाए, जो विषय चयन और प्रस्तुति की रूपरेखा तय करे। QR कोड जैसी आधुनिक तकनीक जोड़कर इसे और भी प्रभावी बनाया जा सकता है।

जिला प्रशासन यदि इस नवाचार को अपनाता है तो यह जैसलमेर के पर्यटन विकास में मील का पत्थर साबित होगा। यह संदेश भी जाएगा कि प्रशासन जागरूक युवाओं के सुझावों को महत्व देता है और शहर की सांस्कृतिक पहचान को सशक्त बनाने के लिए प्रतिबद्ध है।

हम आशा करते हैं कि इस सकारात्मक और दूरदर्शी पहल पर शीघ्र निर्णय लिया जाएगा, ताकि गड़सीसर चौराहे की यह छतरी केवल एक स्थापत्य संरचना न रहकर जैसलमेर की जीवंत संस्कृति का प्रतीक बन सके।

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor