दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन का शुभारंभ
राखी पुरोहित. जोधपुर
जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय के मनोविज्ञान विभाग द्वारा आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन इंडिक हीलिंग सिस्टम. अ हॉलिस्टिक पर्सपेक्टिव ऑन माइंड बॉडी एंड कल्चर के प्रथम दिवस का शुभारंभ भव्य उद्घाटन समारोह के साथ हुआ। भारतीय चिकित्सा प्रणाली को केंद्र में रखकर आयोजित इस सम्मेलन ने परंपरा और आधुनिक मनोविज्ञान के समन्वय का सशक्त मंच प्रस्तुत किया।
कार्यक्रम का स्वागत उद्बोधन विभागाध्यक्ष डॉ. हेमलता जोशी द्वारा दिया गया, जिसमें सम्मेलन की रूपरेखा, उद्देश्य एवं भारतीय ज्ञान परंपरा के वैज्ञानिक पुनर्पाठ की आवश्यकता पर प्रकाश डालते हुए सभी अतिथियों और प्रतिभागियों का स्वागत किया। उद्घाटन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. पवन कुमार शर्मा उपस्थित रहे। विशिष्ट अतिथियों में सरदार पटेल पुलिस, सुरक्षा और आपराधिक न्याय विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. डॉ. आलोक त्रिपाठी, आईपीएस मैसूर विश्वविद्यालय तथा आईसीएसएसआर दिल्ली के सदस्य प्रो किरण कुमार सालग मे, डीन फैकल्टी ऑफ आर्ट्स प्रो. अवतार लाल मीणा, पैट्रन प्रो. एके मलिक के साथ अनेक शिक्षाविद् एवं शोधकर्ता उपस्थित थे।
पैट्रन प्रो. एके मलिक ने अपने संबोधन में होलिष्टिक पर्सपेक्टिव अर्थात समग्र दृष्टिकोण की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने साइकोलॉजिकल वेलबिंग और रेज़िलियन्स को वर्तमान समय की आवश्यकता बताया। प्रो. मलिक ने कॉग्निटिव बिहेवियर थेरेपी के सिद्धांतों को भगवद्गीता से जोड़ते हुए स्पष्ट किया कि भारतीय शास्त्रों में मानसिक संतुलन और विचार.परिवर्तन की वैज्ञानिक आधारभूमि पहले से ही विद्यमान है।
उन्होंने रामायण का उदाहरण देते हुए कहा कि मर्यादा धैर्य और मूल्यों के आधार पर ही श्री राम मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाए जो रेज़िलियन्स का श्रेष्ठ उदाहरण हैं। उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय चिकित्सा प्रणाली हमारी आंतरिक प्रकृति को समझने और मनोविज्ञान की जटिलताओं को सरल करने का मार्ग प्रदान करती है। विकसित भारत 2047 के विज़न को साकार करने के लिए भारतीय ज्ञान प्रणाली को पुनः समझना और अपनाना आवश्यक है।
प्रो. मलिक ने प्रेक्षा ध्यान को मधुमेह, एंजाइटी और डिप्रेशन जैसी समस्याओं के समाधान में प्रभावी पद्धति बताते हुए इसे आत्म.नियंत्रण और मानसिक शुद्धि का सशक्त माध्यम बताया। उद्घाटन सत्र में पुस्तक विमोचन भी किया गया। पुस्तक का लोकार्पण डॉ. अर्पिता कक्कड़ के निर्देशन में किया गया जो कार्यस्थल पर मानसिक स्वास्थ्य के महत्व को समर्पित है। साथ ही डॉ. नीलम कल्ला के काव्य संग्रह का भी विमोचन हुआ जो स्त्री संवेदना और सशक्तिकरण पर आधारित एक काव्य संग्रह है। कीनोट वक्ता डॉ. किरण कुमार ने इवोल्यूशन और स्पिरिचुअल यूनिवर्स की अवधारणाओं पर अपने विचार रखते हुए कहा कि मनुष्य की वास्तविक प्रगति केवल भौतिक विकास में नहीं बल्कि चेतना के विस्तार में निहित है। उन्होंने जीवन को एक समग्र इकाई के रूप में देखने का आग्रह किया।
प्रो. आलोक कुमार त्रिपाठी ने रोग और वेलबीइंग की अमूर्त अवधारणाओं पर विचार व्यक्त किए। कुलपति प्रो. पवन कुमार शर्मा ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में भगवद्गीता में वर्णित गुणों और शास्त्रीय मूल्यों का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय शास्त्र मनुष्य के चरित्र.निर्माण और संतुलित जीवन की आधारशिला हैं। उन्होंने इस प्रकार के सम्मेलनों को भारतीय ज्ञान परंपरा के पुनरुत्थान की दिशा में महत्वपूर्ण पहल बताया। उद्घाटन समारोह ने यह स्पष्ट संदेश दिया कि भारतीय चिकित्सा प्रणाली केवल उपचार की पद्धति नहीं बल्कि जीवन.दर्शन है जो शरीर, मन और आत्मा के संतुलन पर आधारित है। सम्मेलन का प्रथम दिवस शोधकर्ताओं ने अपने शोध पत्र तथा छात्रों ने पोस्टर प्रस्तुतीकरण किया जो ज्ञान, संवाद और सांस्कृतिक आत्मबोध का प्रेरक संगम सिद्ध हुआ। सांस्कृतिक कार्यक्रम के अंतर्गत एक लघु नाटिका का मंचन भी छात्रों द्वारा किया गया।










