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Thursday, April 16, 2026, 2:20 am

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मिडिल ईस्ट की जंग और मोदी का मौन: क्या यह रणनीति है या कूटनीति का नया संकेत?

जब बोलते नहीं हैं नरेंद्र मोदी तब भी दुनिया सुन रही होती है भारत की विदेश नीति

दिलीप कुमार पुरोहित. नई दिल्ली

9783414079 diliprakhai@gmail.com

मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और युद्ध की आशंकाओं के बीच एक सवाल लगातार उठ रहा है—भारत की प्रतिक्रिया क्या है? कई देशों ने खुलकर बयान दिए, कई ने पक्ष चुना, लेकिन दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र इंडिया के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अब तक अपेक्षाकृत मौन दिखाई दे रहे हैं।

यह मौन कई लोगों के लिए रहस्य है और कई के लिए रणनीति। विपक्ष इसे भारत की “कमजोर विदेश नीति” बताने की कोशिश कर रहा है, जबकि सत्ता पक्ष और कूटनीतिक विशेषज्ञ इसे एक परिपक्व रणनीतिक धैर्य के रूप में देख रहे हैं। इतिहास बताता है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कई बार मौन भी संदेश होता है। खासकर तब, जब मामला मिडिल ईस्ट जैसे जटिल भू-राजनीतिक क्षेत्र का हो।

मिडिल ईस्ट की जंग: आग कैसे भड़की

मिडिल ईस्ट दशकों से वैश्विक तनाव का केंद्र रहा है। यहां धार्मिक, राजनीतिक और सामरिक हितों का टकराव लगातार दिखाई देता रहा है। हाल के वर्षों में इस क्षेत्र में संघर्ष के कई कारण रहे हैं—

  • क्षेत्रीय शक्ति संतुलन की लड़ाई

  • ऊर्जा संसाधनों पर नियंत्रण

  • धार्मिक और वैचारिक संघर्ष

  • वैश्विक शक्तियों की रणनीतिक प्रतिस्पर्धा

जब भी मिडिल ईस्ट में युद्ध की स्थिति बनती है, उसका असर केवल क्षेत्रीय देशों तक सीमित नहीं रहता। दुनिया की अर्थव्यवस्था, ऊर्जा बाजार और वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था भी इससे प्रभावित होती है।

भारत की परंपरा: शांति, लेकिन कमजोरी नहीं

भारत की सभ्यता हजारों वर्षों पुरानी है और इसकी मूल विचारधारा अहिंसा और संतुलन पर आधारित रही है। यह वही देश है जिसने दुनिया को महात्मा गांधी, गौतम बुद्ध और महावीर जैसे महान विचारक दिए। इन सभी ने शांति, करुणा और अहिंसा को मानव जीवन का मूल सिद्धांत बताया। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि भारत अपनी सुरक्षा के सवाल पर चुप रहता है।

भारत का इतिहास बताता है कि वह हिंसा का समर्थक नहीं है, लेकिन आत्मरक्षा में निर्णायक कदम उठाने से भी पीछे नहीं हटता।

मोदी का मौन: रणनीतिक धैर्य की नीति?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश नीति को कई विश्लेषक “रणनीतिक धैर्य” (Strategic Patience) कहते हैं। कूटनीति में हर बयान का अंतरराष्ट्रीय असर होता है। किसी भी संघर्ष में जल्दी प्रतिक्रिया देना कई बार स्थिति को और जटिल बना सकता है। यही कारण है कि भारत अक्सर पहले स्थिति को समझता है, सभी पक्षों से संवाद करता है और फिर अपना रुख स्पष्ट करता है।

मिडिल ईस्ट की वर्तमान स्थिति में भारत का मौन कई संकेत दे सकता है—

  • भारत किसी पक्ष का खुला समर्थन करने से बच रहा है

  • ऊर्जा और व्यापारिक हितों को संतुलित रखना चाहता है

  • क्षेत्रीय स्थिरता को प्राथमिकता दे रहा है

  • कूटनीतिक स्तर पर पर्दे के पीछे संवाद जारी हो सकता है

विपक्ष का सवाल: क्या भारत को बोलना चाहिए?

भारत की घरेलू राजनीति में इस मुद्दे पर बहस शुरू हो चुकी है। विपक्ष सरकार से पूछ रहा है कि भारत का आधिकारिक रुख क्या है।लेकिन विदेश नीति के विशेषज्ञ मानते हैं कि कूटनीति का बड़ा हिस्सा सार्वजनिक नहीं होता। कई बार सरकारें सार्वजनिक मंचों पर कम बोलती हैं, लेकिन पर्दे के पीछे लगातार संवाद और रणनीतिक बातचीत चलती रहती है।

क्या हो सकते हैं मिडिल ईस्ट में नए समीकरण?

मिडिल ईस्ट की जंग केवल दो देशों के बीच का संघर्ष नहीं होती। यह अक्सर वैश्विक शक्तियों के बीच शक्ति संतुलन की लड़ाई भी बन जाती है।

आने वाले समय में कुछ नए समीकरण उभर सकते हैं—

1. क्षेत्रीय गठबंधनों का पुनर्गठन

संभव है कि कई देश अपनी सुरक्षा और आर्थिक हितों को देखते हुए नए सैन्य और रणनीतिक गठबंधन बनाएं।

2. ऊर्जा राजनीति का नया दौर

मिडिल ईस्ट दुनिया के तेल और गैस भंडार का बड़ा हिस्सा नियंत्रित करता है। युद्ध लंबा चला तो ऊर्जा बाजार में बड़े बदलाव हो सकते हैं।

3. वैश्विक शक्ति संतुलन में बदलाव

यह संघर्ष वैश्विक शक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा को और तेज कर सकता है।

युद्ध कितना लंबा खिंच सकता है?

इतिहास बताता है कि मिडिल ईस्ट के युद्ध अक्सर लंबे और जटिल होते हैं।

इसके कई कारण होते हैं—

  • कई देशों की अप्रत्यक्ष भागीदारी

  • धार्मिक और वैचारिक टकराव

  • क्षेत्रीय शक्ति संतुलन की लड़ाई

यदि संघर्ष में बड़े देश सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से शामिल होते हैं तो यह युद्ध महीनों या वर्षों तक भी खिंच सकता है।

अमेरिका क्यों आ सकता है बैकफुट पर?

मिडिल ईस्ट की राजनीति में यूएस लंबे समय से प्रभावशाली भूमिका निभाता रहा है। लेकिन हाल के वर्षों में कई कारणों से उसकी स्थिति पहले जैसी मजबूत नहीं मानी जा रही—

  • घरेलू राजनीतिक दबाव

  • लंबे युद्धों से थकान

  • वैश्विक आर्थिक चुनौतियां

  • नई वैश्विक शक्तियों का उभार

यदि संघर्ष बढ़ता है तो अमेरिका को कई मोर्चों पर संतुलन बनाना पड़ सकता है, जिससे वह कुछ मामलों में बैकफुट पर भी दिखाई दे सकता है।

अगर चीन सक्रिय हुआ तो क्या होगा?

दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था चाइना मिडिल ईस्ट में अपने आर्थिक और रणनीतिक हित लगातार बढ़ा रहा है। यदि चीन सक्रिय भूमिका निभाता है तो उसकी रणनीति संभवतः तीन स्तरों पर हो सकती है—

  1. कूटनीतिक मध्यस्थता

  2. आर्थिक प्रभाव बढ़ाना

  3. वैश्विक शक्ति संतुलन में अपनी भूमिका मजबूत करना

हालांकि चीन आमतौर पर सीधे सैन्य हस्तक्षेप से बचता रहा है और आर्थिक तथा कूटनीतिक प्रभाव का अधिक उपयोग करता है।

रूस की भूमिका क्या हो सकती है?

मिडिल ईस्ट की राजनीति में रसिया भी महत्वपूर्ण खिलाड़ी है। रूस पहले भी क्षेत्रीय संघर्षों में प्रभावी भूमिका निभा चुका है। उसकी रणनीति आमतौर पर तीन पहलुओं पर आधारित होती है—

  • सामरिक साझेदारी

  • ऊर्जा राजनीति

  • वैश्विक शक्ति संतुलन

यदि संघर्ष बढ़ता है तो रूस कूटनीतिक और रणनीतिक दोनों स्तरों पर सक्रिय हो सकता है।

भारत के लिए क्या हैं चुनौतियां?

मिडिल ईस्ट में युद्ध का असर भारत पर कई स्तरों पर पड़ सकता है—

1. ऊर्जा आपूर्ति

भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा मिडिल ईस्ट से आयात करता है।

2. प्रवासी भारतीय

मिडिल ईस्ट में लाखों भारतीय काम करते हैं।

3. व्यापार

इस क्षेत्र के साथ भारत का व्यापार काफी बड़ा है।

4. भू-राजनीतिक संतुलन

भारत को कई देशों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखने होते हैं।

जब भारत बोलेगा तो क्या होगा?

भारत की विदेश नीति का एक खास पहलू यह रहा है कि वह अक्सर संकट की स्थिति में संतुलित और निर्णायक भूमिका निभाता है।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने कई बार दिखाया है कि वह अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी बात प्रभावी ढंग से रख सकता है।यदि भारत इस मुद्दे पर खुलकर सामने आता है तो उसकी भूमिका कई तरह की हो सकती है—

  • शांति पहल की मध्यस्थता

  • मानवीय सहायता

  • कूटनीतिक समाधान की पहल

  • वैश्विक मंचों पर संतुलित प्रस्ताव

जंग केवल सैन्य संघर्ष नहीं, वैश्विक शक्ति संतुलन की परीक्षा भी है 

मिडिल ईस्ट की जंग केवल सैन्य संघर्ष नहीं है; यह वैश्विक शक्ति संतुलन की परीक्षा भी है। ऐसे समय में भारत का मौन कई बार एक सोची-समझी रणनीति हो सकता है। विदेश नीति अक्सर सार्वजनिक बयान से ज्यादा गहरे स्तर पर चलती है। इतिहास बताता है कि जब नरेंद्र मोदी बोलते हैं तो उसका असर केवल भारत तक सीमित नहीं रहता, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी चर्चा का विषय बन जाता है। इसलिए संभव है कि भारत अभी स्थिति का आकलन कर रहा हो। और जब सही समय आएगा, तब भारत की आवाज केवल बयान नहीं बल्कि वैश्विक संतुलन की दिशा तय करने वाला संदेश भी बन सकती है।

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor