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Thursday, April 23, 2026, 9:57 pm

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‘विश्व पुस्तक दिवस’ के अवसर पर पुस्तक प्रदर्शनी का आयोजन हुआ

ऐसी प्रदर्शनी से पुस्तक संस्कृति को बल मिलता है-कमल रंगा
राइजिंग भास्कर. बीकानेर
प्रज्ञालय संस्थान द्वारा आज ‘विश्व पुस्तक दिवस’ के अवसर पर विशेष रूप से हिन्दी-राजस्थानी साहित्य की विभिन्न विधाओं की पुस्तकों की प्रदर्शनी एवं  पुस्तक-संस्कृति पर केन्द्रित चर्चा का आयोजन प्रातः लक्ष्मीनारायण रंगा सृजन-सदन में किया गया।
पुस्तक प्रदर्शनी का अवलोकन नई पीढ़ी के अनेकों बालक-बालिकाओं ने बड़े उत्साह एवं उमंग के साथ करते हुए अनौपचारिक चर्चा के दौरान एक पाठक के रूप में कहा कि पुस्तकें हमारी असल में मित्र हैं। वर्तमान युग में नई पीढ़ी ई-बुक्स के माध्यम से पढ़ती है, परन्तु आज हमें लगा कि पुस्तक को छपी हुई स्थिति में पढ़ना एक सुखद अनुभव है।
कार्यक्रम में राजस्थानी के वरिष्ठ साहित्यकार कमल रंगा ने विशेष तौर से कहा कि ऐसे आयोजन से जहां एक ओर पुस्तक संस्कृति को बल मिलता है, वहीं वर्तमान दौर में पाठक संकट से उभरने का भी एक अवसर भी होता है। रंगा ने आगे कहा कि पुस्तकें हमारे अतीत, वर्तमान एवं भविष्य से जुडे़ अनेक पहलूओं, जीवन के यथार्थ एवं समय के सच को उद्घाटित करती हैं।
प्रारंभ में पुस्तक प्रदर्शनी के महत्व को रेखांकित करते हुए वरिष्ठ शिक्षाविद् भवानी सिंह राठौड़ ने कहा कि ऐसे आयोजन होना अपने आप में महत्वपूर्ण है, क्योंकि आज के दौर में पुस्तक संस्कृति को समृद्ध करना जरूरी है। वरिष्ठ शायर क़ासिम बीकानेरी ने चर्चा के दौरान कहा कि पुस्तकें ज्ञान का भंडार होती हैं और पुस्तकों से अच्छी शिक्षा ग्रहण करके जीवन को सफल बनाया जा सकता है।
वरिष्ठ शिक्षाविद् राजेश रंगा ने कहा कि केवल नई पीढ़ी ही नहीं वरन् प्रत्येक मनुष्य को अच्छी पुस्तकें पढ़ने से लाभ प्राप्त होता है, क्योंकि उससे हमारा ज्ञान, तर्क शक्ति एवं बौद्धिक क्षमता बढ़ती है। कवि गिरिराज पारीक ने बताया कि 23 अप्रैल, 1995 से प्रारंभ विश्व पुस्तक दिवस को कॉपीराईट दिवस के नाम से भी जाना जाता है। ऐसे आयोजन के माध्यम से विशेष तौर से नई पीढ़ी के साथ हम सभी को पुस्तक से और गहरा रिश्ता जोड़ने का अवसर मिलता है। चर्चा में नई पीढ़ी के अनेक प्रतिनिधि बालक-बालिकाओं ने अपनी बात रखते हुए कहा कि ऐसे आयोजन से हमें साहित्य की पुस्तकों से विशेष रूझान हुआ है। कार्यक्रम का संचालन युवा संस्कृतिकर्मी आशीष रंगा ने किया एवं सभी का आभार हरिनारायण आचार्य ने किया।
Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor