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Thursday, July 9, 2026, 1:14 am

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“13% बताकर 24% तक वसूली!”—लोन के नाम पर ‘ईएमआई का खेल’, रिड्यूसिंग और फ्लैट ब्याज में बड़ा फर्क उजागर

1 लाख के लोन पर हजारों रुपये का अतिरिक्त बोझ
रिड्यूसिंग बनाम फ्लैट ब्याज: आम आदमी को समझ नहीं आता गणित
उपभोक्ता शिकायतों में बढ़ोतरी, पारदर्शिता पर उठे सवाल

जानिए : सस्ता लोन या महंगा जाल?

दिलीप कुमार पुरोहित. जोधपुर

9783414079 diliprakhai@gmail.com

देश में तेजी से बढ़ते उपभोक्ता लोन के बीच एक चिंताजनक ट्रेंड सामने आ रहा है। कई प्रमुख फाइनेंस कंपनियां कम ब्याज दर का दावा करके ग्राहकों को आकर्षित करती हैं, लेकिन वास्तविक भुगतान के दौरान ग्राहकों को कहीं अधिक राशि चुकानी पड़ती है।

हालांकि कंपनियां नियमों के तहत काम करती हैं, लेकिन उपभोक्ताओं की शिकायत है कि ब्याज की गणना का तरीका स्पष्ट नहीं बताया जाता।

मामला क्या है: 1 लाख के लोन का गणित

एक सामान्य उदाहरण से समझें—

  • लोन राशि: ₹1,00,000
  • अवधि: 36 महीने
  • घोषित ब्याज दर: 13%

रिड्यूसिंग ब्याज (Reducing Balance Method)

इस पद्धति में ब्याज शेष मूलधन पर लगता है, यानी हर EMI के बाद मूलधन कम होता है और ब्याज भी घटता जाता है।

  • EMI: ₹3369
  • पहले महीने का ब्याज: लगभग ₹1083
  • बाद के महीनों में ब्याज घटता जाता है

कुल भुगतान (लगभग):
₹3369 × 36 = ₹1,21,284

यानी कुल ब्याज लगभग ₹21,284 के आसपास बैठता है (घटते क्रम के अनुसार थोड़ा अंतर संभव)।

फ्लैट ब्याज (Flat Rate Method)

इस पद्धति में पूरा ब्याज मूलधन पर ही पूरे समय के लिए जोड़ा जाता है, चाहे आपने कितना भी लोन चुका दिया हो।

  • EMI: ₹3861
  • हर महीने ब्याज: ₹1083 (स्थिर)

कुल भुगतान:
₹3861 × 36 = ₹1,38,996

यानी कुल ब्याज ₹38,996

दोनों में कितना अंतर?

आधार रिड्यूसिंग फ्लैट
EMI ₹3369 ₹3861
कुल भुगतान ₹1,21,284 ₹1,38,996
कुल ब्याज ~₹21,284 ~₹38,996

अंतर: ₹17,000 से अधिक

यानी ग्राहक को लगभग 80% तक अधिक ब्याज देना पड़ सकता है, जबकि उसे बताया जाता है कि ब्याज दर 13% है।

असल समस्या: ब्याज दर नहीं, गणना का तरीका

विशेषज्ञों के अनुसार, असली भ्रम ब्याज दर में नहीं, बल्कि उसके प्रस्तुतिकरण में है।

  • रिड्यूसिंग रेट = वास्तविक दर
  • फ्लैट रेट = दिखने में कम, लेकिन असल में ज्यादा

कई बार फ्लैट 13% का मतलब होता है कि प्रभावी ब्याज दर (Effective Interest Rate) 22%–24% तक पहुंच जाती है।

कंपनियों की भूमिका: पारदर्शिता पर सवाल

बाजार में सक्रिय कई वित्तीय संस्थानों के खिलाफ उपभोक्ताओं की शिकायतें सामने आती रही हैं कि:

  • लोन देते समय फ्लैट और रिड्यूसिंग का अंतर स्पष्ट नहीं बताया जाता
  • EMI तो बताई जाती है, लेकिन कुल ब्याज नहीं समझाया जाता
  • प्रोसेसिंग फीस और अन्य चार्जेस अलग से जोड़े जाते हैं

ग्राहकों का अनुभव: “EMI कम लगी, पर जेब खाली हो गई”

जोधपुर के एक उपभोक्ता (काल्पनिक नाम: रमेश शर्मा) बताते हैं:

“मुझे लगा कि 13% ब्याज पर लोन मिल रहा है, EMI भी manageable थी। लेकिन जब पूरा हिसाब देखा, तो पता चला कि मैंने जरूरत से कहीं ज्यादा पैसा चुका दिया।” ऐसे कई मामलों में ग्राहक EMI देखकर फैसला ले लेते हैं, बिना यह समझे कि कुल भुगतान कितना होगा।

फ्लैट ब्याज क्यों ज्यादा महंगा पड़ता है?

फ्लैट ब्याज में:

  • पूरे 36 महीने के लिए ब्याज पहले ही जोड़ दिया जाता है
  • आप चाहे आधा लोन चुका दें, ब्याज वही रहता है
  • यह वास्तविक ब्याज दर को छिपा देता है

इसके विपरीत, रिड्यूसिंग में:

  • हर EMI के बाद ब्याज घटता है
  • यह अधिक पारदर्शी और न्यायसंगत माना जाता है

क्या यह शोषण है या सिस्टम की खामी?

यह कहना कि सभी कंपनियां जानबूझकर शोषण कर रही हैं, सही नहीं होगा। लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि:

  • जानकारी की कमी का फायदा उठाया जाता है
  • जटिल शर्तों के कारण ग्राहक भ्रमित होते हैं
  • वित्तीय साक्षरता की कमी बड़ी समस्या है

नियामक क्या कहते हैं?

Reserve Bank of India ने कई बार निर्देश दिए हैं कि:

  • ब्याज दर स्पष्ट रूप से बताई जाए
  • Effective Interest Rate (EIR) का खुलासा किया जाए
  • सभी चार्जेस पारदर्शी हों
फिर भी जमीनी स्तर पर इन नियमों का पालन हर जगह समान रूप से नहीं दिखता।

कैसे बचें इस जाल से?

विशेषज्ञ सलाह देते हैं:

  • हमेशा पूछें: Reducing या Flat?
  • Effective Interest Rate (EIR) जानें
  • कुल भुगतान (Total Cost) जरूर देखें
  • सिर्फ EMI देखकर फैसला न लें
  • लोन एग्रीमेंट ध्यान से पढ़ें

डिजिटल युग में नई चुनौती

आजकल ऑनलाइन ऐप्स और इंस्टेंट लोन प्लेटफॉर्म्स के जरिए लोन लेना आसान हो गया है। कंपनियां और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म्स तेजी से लोन प्रोसेस करते हैं, लेकिन कई बार ग्राहक शर्तों को पढ़े बिना ही “Agree” कर देते हैं। यहीं से समस्या शुरू होती है।

जागरूकता ही बचाव है

1 लाख के लोन पर ₹17,000 से ज्यादा का अतिरिक्त भुगतान कोई छोटी बात नहीं है। यह अंतर लाखों ग्राहकों के लिए भारी आर्थिक बोझ बन सकता है। यह जरूरी नहीं कि हर कंपनी गलत कर रही हो, लेकिन यह जरूर है कि सिस्टम जटिल है और पारदर्शिता की जरूरत है।

सबक: “सस्ती EMI हमेशा सस्ता लोन नहीं होती।” जब तक ग्राहक खुद जागरूक नहीं होगा, तब तक यह ‘ईएमआई का खेल’ चलता रहेगा।

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor