परिवार की जिम्मेदारियों के बीच शिक्षा, समाजसेवा और साहित्य में बनाई विशिष्ट पहचान
दिलीप कुमार पुरोहित. जोधपुर
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कहा जाता है कि इंसान की पहचान उसकी परिस्थितियों से नहीं, बल्कि उन परिस्थितियों से लड़ने की क्षमता से होती है। कुछ लोग जीवन में मिली सुविधाओं के कारण आगे बढ़ते हैं, जबकि कुछ लोग संघर्षों को अपनी ताकत बनाकर नई ऊंचाइयों को छूते हैं। डॉ. अरुणा टाक का जीवन इसी दूसरी श्रेणी का सशक्त उदाहरण है। उनका व्यक्तित्व यह संदेश देता है कि यदि लक्ष्य स्पष्ट हो, आत्मविश्वास अटूट हो और समाज के प्रति सेवा का भाव हो, तो कोई भी बाधा सफलता का मार्ग नहीं रोक सकती।
जोधपुर की धरती पर जन्मी और शिक्षित डॉ. अरुणा टाक ने अपने जीवन की शुरुआत सामान्य पारिवारिक वातावरण से की। विवाह के बाद उन्होंने परिवार और बच्चों की जिम्मेदारियों को पूरी निष्ठा से निभाया। लेकिन उन्होंने अपने भीतर शिक्षा प्राप्त करने की जो ललक संजोकर रखी थी, उसे कभी समाप्त नहीं होने दिया। जब पारिवारिक जिम्मेदारियां कुछ कम हुईं, तब उन्होंने दोबारा पढ़ाई शुरू की और बी.ए., एलएलबी, एलएलएम तथा विधि विषय में पीएचडी जैसी उच्च शैक्षणिक उपलब्धियां हासिल कीं। यह केवल डिग्रियां नहीं, बल्कि दृढ़ इच्छाशक्ति और आत्मविश्वास की मिसाल हैं।
डॉ. अरुणा का कहना है कि संघर्ष के साथ-साथ काबिलियत भी निखरती है। जैसे कागज अपनी किस्मत से उड़ता है और पतंग अपनी काबिलियत से उड़ती है। उसी तरह किस्मत साथ दे ना भी दे, लेकिन काबिलियत जरूर साथ देती है। आप गुप्त दान में विश्वास रखती हैं। जो मनुष्य जीवन में 365 दिन सेवाओं में होनी है । आज जो भी है वे श्री राधे कृष्ण की असीम कृपा के कारण है। मनुष्य वर्ण से नहीं, बल्कि अपने कर्मों से महान बनता है। जन्म से मुट्ठी में धर्म की जड़ है। लकीरें लेकर आता है और अंत मे कर्मों की गठरी अपने सर पर साथ रखकर ले जाता है।
डॉ. टाक का मानना है कि जीवन में सफलता केवल व्यक्तिगत उपलब्धियों तक सीमित नहीं होनी चाहिए। यदि ज्ञान समाज के काम नहीं आए तो उसकी उपयोगिता अधूरी रह जाती है। यही सोच उन्हें समाजसेवा के क्षेत्र में भी सक्रिय बनाती है। उन्होंने कानून की शिक्षा को केवल अपने करियर तक सीमित नहीं रखा, बल्कि जरूरतमंदों तक उसका लाभ पहुंचाने का प्रयास किया। बाल गृह, बालिका गृह तथा विभिन्न वर्गों के लोगों को निःशुल्क कानूनी मार्गदर्शन देना और महिला बंदियों तक कानूनी शिक्षा पहुंचाना उनके सामाजिक सरोकारों का महत्वपूर्ण पक्ष है।
कोरोना काल में जब पूरा समाज कठिन दौर से गुजर रहा था, तब उन्होंने अपने समय का रचनात्मक उपयोग करते हुए अनेक पुस्तकें लिखीं। वर्ष 2024 में उनकी पुस्तकों को ISBN के साथ प्रकाशित किया गया। इसके अतिरिक्त उन्होंने अनेक शोधपत्र और लेख भी प्रकाशित किए, जिन्हें ISSN के साथ मान्यता प्राप्त हुई। इससे स्पष्ट होता है कि उन्होंने साहित्य और शोध दोनों क्षेत्रों में गंभीर योगदान दिया है।
उनके साहित्यिक और सामाजिक योगदान को समय-समय पर अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से सम्मानित किया गया। सावित्रीबाई फुले सम्मान, नेताजी सुभाष चंद्र बोस सम्मान, महात्मा गांधी नेशनल प्राइड अवॉर्ड, रवीन्द्रनाथ टैगोर हॉल ऑफ फेम अवॉर्ड, डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ग्लोबल आइकॉन अवॉर्ड और नारी शक्ति सम्मान जैसे अनेक पुरस्कार उनकी उपलब्धियों के प्रमाण हैं। ये सम्मान केवल उनके व्यक्तिगत प्रयासों की स्वीकृति नहीं, बल्कि समाज के प्रति उनकी प्रतिबद्धता का भी सम्मान हैं।
डॉ. अरुणा टाक विभिन्न सामाजिक और मानवाधिकार संगठनों से भी जुड़ी हुई हैं। वे महिला सशक्तिकरण, मानवाधिकार और सामाजिक जागरूकता के क्षेत्र में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। उनका विश्वास है कि समाज में सकारात्मक परिवर्तन केवल भाषणों से नहीं, बल्कि निरंतर सेवा और सहभागिता से संभव है। यही कारण है कि वे अनेक संस्थाओं में विभिन्न जिम्मेदारियां निभाते हुए समाजहित के कार्यों में निरंतर योगदान दे रही हैं।
उनकी सोच का सबसे प्रेरक पक्ष निस्वार्थ सेवा है। वे मानव सेवा के साथ-साथ पशु-पक्षियों और पर्यावरण के प्रति भी संवेदनशील दृष्टिकोण रखती हैं। उनका मानना है कि प्रत्येक जीव के प्रति करुणा और संवेदना ही सच्चे अर्थों में मनुष्यता की पहचान है। यह दृष्टिकोण आज के समय में और अधिक प्रासंगिक हो जाता है, जब समाज को सह-अस्तित्व और संवेदनशीलता की आवश्यकता है।
डॉ. टाक का जीवन यह भी सिखाता है कि विवाह या पारिवारिक जिम्मेदारियां शिक्षा की राह में अंतिम बाधा नहीं होतीं। यदि संकल्प मजबूत हो, तो जीवन के किसी भी पड़ाव पर नई शुरुआत की जा सकती है। उन्होंने यह साबित किया कि सीखने की कोई आयु नहीं होती और ज्ञान की यात्रा कभी समाप्त नहीं होती।
आज के युवाओं, विशेषकर महिलाओं के लिए उनका जीवन प्रेरणा का स्रोत है। वे यह संदेश देती हैं कि आत्मनिर्भरता केवल आर्थिक नहीं, बल्कि बौद्धिक और सामाजिक भी होनी चाहिए। शिक्षा, सेवा और संस्कार—इन तीन मूल्यों के समन्वय से ही व्यक्ति समाज में स्थायी पहचान बना सकता है।
उनकी जीवन यात्रा का सार यही है कि सफलता केवल पद, प्रतिष्ठा या पुरस्कारों में नहीं, बल्कि समाज पर छोड़ी गई सकारात्मक छाप में निहित होती है। डॉ. अरुणा टाक ने अपने कार्यों से यह सिद्ध किया है कि संघर्ष से निकली हुई सफलता सबसे अधिक प्रेरणादायी होती है और सेवा से जुड़ा हुआ ज्ञान ही वास्तव में सार्थक ज्ञान कहलाता है।
डॉ. अरुणा टाक की प्रमुख उपलब्धियां
- विधि विषय में पीएचडी।
- बी.ए., एलएलबी एवं एलएलएम की उच्च शिक्षा।
- अनेक पुस्तकें ISBN के साथ प्रकाशित।
- शोधपत्र एवं लेख ISSN के साथ प्रकाशित।
- राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अनेक सम्मान प्राप्त।
समाजसेवा के प्रमुख आयाम
- निःशुल्क कानूनी परामर्श।
- बाल गृह एवं बालिका गृह में सेवा।
- महिला बंदियों को कानूनी शिक्षा।
- महिला सशक्तिकरण और मानवाधिकार गतिविधियों में सहभागिता।
- पशु-पक्षियों और पर्यावरण संरक्षण के प्रति संवेदनशील दृष्टिकोण।
जीवन से मिलने वाली पांच प्रेरणाएं
- परिस्थितियां नहीं, संकल्प सफलता तय करता है।
- शिक्षा की कोई आयु नहीं होती।
- ज्ञान का सर्वोत्तम उपयोग समाजसेवा है।
- संघर्ष व्यक्ति को मजबूत बनाता है।
- विनम्रता, सेवा और निरंतर सीखने की भावना ही स्थायी सफलता का आधार है


