जब कोई वरिष्ठ पत्रकार सोशल मीडिया पर राजनीतिक या वैचारिक टिप्पणी करता है, तब सवाल केवल उसकी व्यक्तिगत राय का नहीं, बल्कि उसके संस्थान की विश्वसनीयता का भी बन जाता है। हाल ही के कुछ समय में दैनिक भास्कर के वरिष्ठ पत्रकार चाहे वो एलपी पंत हो या मुकेश माथुर हो सरकार की आलोचना में अपना पसीना बहा देते हैं, मगर अखबार में एक शब्द नहीं लिखते और सोशल मीडिया के जरिए सरकार को आंख दिखाते हैं। ऐसे पत्रकारों को दैनिक भास्कर से इस्तीफा देकर अपनी कथित स्वस्थ पत्रकारिता करना चाहिए…।
दिलीप कुमार पुरोहित. जयपुर
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पत्रकारिता केवल समाचार लिखने का व्यवसाय नहीं, बल्कि सार्वजनिक विश्वास की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। यही कारण है कि पत्रकार के हर शब्द का मूल्य होता है। आज सोशल मीडिया ने इस जिम्मेदारी को कई गुना बढ़ा दिया है। पहले पत्रकार की पहचान उसके अखबार या चैनल से होती थी, अब उसके निजी सोशल मीडिया अकाउंट भी उसकी सार्वजनिक पहचान का हिस्सा बन चुके हैं।
इसी संदर्भ में वरिष्ठ पत्रकार मुकेश माथुर का एक वीडियो चर्चा में आया। वीडियो में उन्होंने मीडिया, सत्ता और तथाकथित “गोदी मीडिया” जैसे विषयों पर अपने विचार व्यक्त किए। यहां प्रश्न यह नहीं है कि उनके विचार सही हैं या गलत। असली प्रश्न यह है कि जब किसी बड़े मीडिया संस्थान का वरिष्ठ पत्रकार सार्वजनिक मंच पर ऐसी टिप्पणी करता है, तो आम पाठक उसे केवल व्यक्तिगत राय मानता है या उस संस्थान की सोच भी समझता है?
यही वह बिंदु है, जिस पर पूरे मीडिया जगत को गंभीर आत्ममंथन करना चाहिए। भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है। पत्रकार भी इससे अलग नहीं हैं। उन्हें भी अपने निजी विचार रखने और व्यक्त करने का पूरा अधिकार है। लेकिन जितना बड़ा पद, उतनी बड़ी जिम्मेदारी। संपादकीय स्तर पर कार्यरत पत्रकार केवल व्यक्ति नहीं रहते, वे अपने संस्थान के सार्वजनिक प्रतिनिधि भी बन जाते हैं।
यहीं सबसे बड़ा विरोधाभास दिखाई देता है। यदि किसी पत्रकार की निजी राय उसके संस्थान की प्रकाशित संपादकीय दिशा से बिल्कुल अलग दिखाई देती है, तो भ्रम पैदा होना स्वाभाविक है। पाठक यह जानना चाहता है कि वह किस पर विश्वास करे—अखबार में प्रकाशित सामग्री पर या सोशल मीडिया पर व्यक्त विचारों पर?
यह प्रश्न किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं है। आज लगभग हर बड़े मीडिया संस्थान के पत्रकार यूट्यूब, फेसबुक, एक्स और अन्य मंचों पर सक्रिय हैं। कई बार उनके वीडियो और पोस्ट उनके संस्थान की खबरों से अधिक चर्चा में रहते हैं। ऐसे में यह स्पष्ट होना चाहिए कि क्या वे संस्थान की ओर से बोल रहे हैं या पूरी तरह व्यक्तिगत हैसियत से।
लोकतंत्र में असहमति का पूरा सम्मान होना चाहिए। सरकार की आलोचना भी लोकतांत्रिक अधिकार है और सरकार की प्रशंसा भी। लेकिन पत्रकारिता का धर्म न तो अंध-समर्थन है और न ही अंध-विरोध। पत्रकार का पहला दायित्व तथ्यों के प्रति होना चाहिए, किसी विचारधारा के प्रति नहीं।
यदि कोई पत्रकार अपने निजी मंच पर वैचारिक या राजनीतिक टिप्पणी करता है, तो उसके साथ स्पष्ट रूप से यह उल्लेख होना चाहिए कि यह उसकी व्यक्तिगत राय है। इससे भ्रम कम होगा और संस्थान की निष्पक्षता पर भी अनावश्यक प्रश्न नहीं उठेंगे। दुर्भाग्य से आज मीडिया का बड़ा संकट विश्वसनीयता का है। पाठक केवल समाचार नहीं पढ़ता, बल्कि पत्रकार का सोशल मीडिया व्यवहार भी देखता है। यदि दोनों में विरोधाभास दिखाई देता है, तो सबसे पहले विश्वास प्रभावित होता है।
राइजिंग भास्कर का स्पष्ट मत है कि किसी भी पत्रकार की आलोचना उसके विचारों, तर्कों और सार्वजनिक आचरण के आधार पर होनी चाहिए, न कि व्यक्तिगत कटाक्ष या अपमानजनक भाषा के माध्यम से। स्वस्थ लोकतंत्र में बहस होनी चाहिए, लेकिन बहस तथ्यों पर आधारित होनी चाहिए। अब समय आ गया है कि देश के सभी बड़े मीडिया संस्थान अपनी सोशल मीडिया आचार संहिता सार्वजनिक करें। पाठकों को यह जानने का अधिकार है कि उनके वरिष्ठ पत्रकारों के निजी वीडियो और पोस्ट केवल व्यक्तिगत विचार हैं या संस्थान उनसे स्वयं को अलग मानता है। यह बहस किसी एक वीडियो, किसी एक पत्रकार या किसी एक समाचार पत्र की नहीं है। यह भारतीय पत्रकारिता की विश्वसनीयता का प्रश्न है। यदि मीडिया स्वयं पारदर्शिता की अपेक्षा समाज से करता है, तो उसे भी अपनी आंतरिक जवाबदेही और सार्वजनिक आचरण में वही मानक अपनाने होंगे। पत्रकारिता की सबसे बड़ी पूंजी भवन, मशीनें या डिजिटल प्लेटफॉर्म नहीं हैं। उसकी सबसे बड़ी पूंजी जनता का विश्वास है। यदि यह विश्वास कमजोर पड़ता है, तो सबसे बड़ा नुकसान स्वयं पत्रकारिता का होता है।
सबसे बड़ा सवाल
क्या वरिष्ठ पत्रकार की सोशल मीडिया पोस्ट…
- केवल उसकी निजी राय है?
- संस्थान का अप्रत्यक्ष संदेश है?
- या दोनों के बीच की सीमा अब धुंधली हो चुकी है?
मीडिया संस्थानों को क्या करना चाहिए?
सोशल मीडिया नीति सार्वजनिक करें।
निजी और संस्थागत विचारों की स्पष्ट सीमा तय करें।
वरिष्ठ पत्रकारों के लिए आचार संहिता लागू करें।
विवादित मामलों में समय पर आधिकारिक स्पष्टीकरण दें।
पत्रकार की चार जिम्मेदारियां
- तथ्य सर्वोपरि हों।
- निजी विचारों में पारदर्शिता हो।
- संस्थान की साख का ध्यान रखा जाए।
- असहमति हो, लेकिन गरिमा के साथ।
मुकेश माथुर स्पष्ट करे कि वो जो बोल रहे हैं वे दैनिक भास्कर की राय है या व्यक्तिगत?
पत्रकार की कलम जितनी स्वतंत्र होनी चाहिए, उतनी ही उत्तरदायी भी। सोशल मीडिया ने अभिव्यक्ति का दायरा बढ़ाया है, लेकिन इसके साथ जवाबदेही भी उतनी ही बढ़ गई है। लोकतंत्र में स्वतंत्र पत्रकारिता तभी मजबूत होगी, जब व्यक्तिगत विचार और संस्थागत दायित्व—दोनों की सीमाएं स्पष्ट और पारदर्शी हों।

