!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!✍️मुकुल चौधरी🙏🏻
यह अपनी रूह को वापस उसकी छांव में लौटाने जैसा है।ईंटों,सीमेंट और गारे से बनी इमारतें जब समय की मार झेलती हैं, तो वे सिर्फ पुरानी नहीं होतीं, वे उन पलों को सहेज रही होती हैं जो हमने कभी अपने माता-पिता के साथ बिताए थे। जब हमने उस घर को नया रूप दिया, तो हमने केवल दीवारों पर रंग नहीं चढ़ाया, बल्कि उन बिखरी हुई यादों को समेटकर फिर से जीवंत कर दिया।
“यादों का जीवित कोना”:-
पुश्तैनी घर की हर चौखट, हर खिड़की और आंगन का हर कोना किसी न किसी किस्से का गवाह होता है। बचपन में वहां भागना-दौड़ना, माता-पिता का प्यार, डांट, और घर की उस जानी-पहचानी खुशबू का कोई विकल्प नहीं है। जब हम वहां जाते हैं, तो वक्त जैसे ठहर सा जाता है। ऐसा लगता है मानो समय के किसी मोड़ पर माता-पिता आज भी मुस्कुराते हुए हमारा इंतजार कर रहे हैं।
“भौतिक सुख बनाम आत्मिक शांति”:-
शहरों की भागदौड़, कंक्रीट के जंगल और आधुनिक जीवन की सुख-सुविधाएं हमें आराम तो दे सकती हैं, लेकिन वह आत्मिक शांति नहीं दे सकतीं जो अपनी जड़ों से जुड़कर मिलती है। बनारस वाले उस घर में जब आप कदम रखते हैं, तो मन का सारा बोझ और मानसिक थकान एक पल में उतर जाती है। वहां का हर कोना सुरक्षा और अपनेपन का वो अहसास कराता है, जो सिर्फ मां की गोद या पिता के साये में ही महसूस हो सकता है।
“पुश्तैनी धरोहर का सम्मान”:-
अपने पुरखों के बनाए घर को रेनोवेट कराना उनके प्रति हमारी गहरी कृतज्ञता (Gratitude) को दर्शाता है। यह इस बात का प्रतीक है कि जीवन में हम भले ही कितने भी आगे निकल जाएं, लेकिन जहां से हमारी नींव पड़ी थी, उस जमीन को हम कभी नहीं भूलते। घर को संवारना एक तरह से माता-पिता की बनाई उस दुनिया को सम्मान देने का तरीका है।
“एक ऊर्जा का स्रोत”:-
जिंदगी जब कभी थका दे या जब भी मन अशांत हो, तब अपने इस पुश्तैनी घर लौट जाना एक मेडिटेशन (ध्यान) जैसा है। वहां बिताए कुछ दिन भी इंसान को अंदर से नई ऊर्जा और सकारात्मकता से भर देते हैं। ऐसा लगता है जैसे माता-पिता का आशीर्वाद अदृश्य रूप में वहां मौजूद है और हमारे सिर पर अपना हाथ फेर रहा है।
👉🏻यह पहल आपकी आने वाली पीढ़ियों के लिए भी अपनी जड़ों से जुड़े रहने की एक खूबसूरत डोर बनेगी।
पंकज जी का अपनी पुरानी टेबल को निहारना अपने घर को निहारना बहुत सुकून देता है और पंकज जी को निहारना मुझे सुकून देता है 💕

