न्याय से लेकर व्यापार, चिकित्सा, शिक्षा और पत्रकारिता तक—हर जिम्मेदार काम से पहले सत्यनिष्ठा की शपथ का संवैधानिक प्रावधान क्यों न हो? हर खबर से पहले लिखा जाए- यह खबर तथ्यहीन और द्वेष भावना से नहीं लिखी गई है, इसकी मै शपथ लेता हूं। इस शपथ का दायरा बढ़ाया जाए- इंजीनियर शपथ ले कि वह प्रोजेक्ट गुणवत्ता के साथ बना रहा है, इसकी शपथ लेता है। इसकी भाषा तैयार की जा सकती है। ऐसे करके हम भारत के हर नागरिक को जिम्मेदार बना सकते हैं।
स्पेशल रिपोर्ट. दिलीप कुमार पुरोहित, ग्रुप एडिटर, राइजिंग भास्कर
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अदालत में मुकदमा शुरू होता है। पक्षकार अपनी बात रखते हैं। गवाह को कटघरे में बुलाया जाता है। उससे सत्य बोलने की अपेक्षा की जाती है। कानून ने गवाह के लिए शपथ और प्रतिज्ञान की व्यवस्था की है। शपथ का मूल उद्देश्य यही है कि वह न्यायालय के सामने सत्य बोले और जानबूझकर असत्य न कहे। भारत में न्यायिक शपथ और गवाहों की शपथ के लिए कानून मौजूद हैं। Oaths Act, 1969 में गवाहों आदि के लिए शपथ/प्रतिज्ञान की व्यवस्था है और यह भी स्पष्ट है कि साक्ष्य देने वाले व्यक्ति सत्य बताने के लिए बाध्य हैं।
लेकिन इसी अदालत में एक और व्यक्ति बैठा है—न्यायाधीश।
वह व्यक्ति, जो अंततः उपलब्ध साक्ष्यों, कानून और दलीलों के आधार पर यह तय करेगा कि किसकी बात सही है, किसे न्याय मिलेगा, किसके पक्ष में डिक्री होगी, किसे दोषी या निर्दोष माना जाएगा और किसका अधिकार स्वीकार या अस्वीकार होगा।
तो एक सवाल उठना स्वाभाविक है—
जब न्याय मांगने वाला, गवाही देने वाला और कभी-कभी दस्तावेज देने वाला व्यक्ति सत्य की शपथ ले सकता है, तो फैसला सुनाने वाला न्यायाधीश प्रत्येक मुकदमे की शुरुआत में एक अलग और स्पष्ट सत्यनिष्ठा प्रतिज्ञा क्यों न ले?
यह सवाल किसी जज की नीयत पर संदेह करने के लिए नहीं है। यह सवाल व्यवस्था को और अधिक जवाबदेह बनाने के लिए है। भारतीय संविधान में सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के न्यायाधीशों के लिए पहले से ही पद की शपथ निर्धारित है। जज संविधान और कानून को बनाए रखने तथा बिना भय, पक्षपात, स्नेह या द्वेष के अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने की शपथ लेते हैं। लेकिन यह शपथ पद ग्रहण करते समय होती है।
प्रस्ताव यह है कि इसके साथ एक और व्यवस्था पर देश को विचार करना चाहिए—
हर मुकदमे की सुनवाई शुरू करने से पहले न्यायाधीश एक संक्षिप्त न्यायिक सत्यनिष्ठा प्रतिज्ञा करे कि वह इस विशेष मामले का निर्णय उपलब्ध साक्ष्य, कानून, संविधान और न्याय के सिद्धांतों के आधार पर करेगा तथा किसी भी प्रकार के व्यक्तिगत, राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक या अन्य अनुचित प्रभाव से मुक्त रहकर निर्णय देगा।
क्या यह विचार असंभव है?
नहीं।
क्या इस पर संवैधानिक और कानूनी बहस होनी चाहिए?
निश्चित रूप से।
शपथ का उद्देश्य डर पैदा करना नहीं, जिम्मेदारी जगाना है
शपथ का अर्थ केवल यह नहीं है कि किसी व्यक्ति को अपराध करने पर सजा मिलेगी। शपथ व्यक्ति को उसके कर्तव्य की गंभीरता का अहसास भी कराती है। एक डॉक्टर जब मरीज का इलाज करता है तो उसके सामने केवल एक व्यक्ति नहीं होता, बल्कि उस व्यक्ति का जीवन और परिवार का भविष्य होता है। एक शिक्षक जब किसी बच्चे को पढ़ाता है तो वह केवल पाठ्यक्रम नहीं पढ़ाता, बल्कि उसके भविष्य को आकार देता है। एक इंजीनियर जब पुल बनाता है तो उसकी गणना में गलती सैकड़ों लोगों की जान खतरे में डाल सकती है। एक पत्रकार जब कोई समाचार प्रकाशित करता है तो उसके शब्द किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा बना भी सकते हैं और बिगाड़ भी सकते हैं। एक व्यापारी जब कोई उत्पाद बेचता है तो वह उपभोक्ता के भरोसे के साथ कारोबार करता है। और एक न्यायाधीश जब फैसला सुनाता है तो उसके सामने किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता, संपत्ति, सम्मान, परिवार, व्यवसाय और कभी-कभी पूरा जीवन दांव पर लगा होता है। फिर सवाल यह है कि समाज में जिन-जिन भूमिकाओं में इतनी बड़ी जिम्मेदारी है, क्या उन भूमिकाओं को निभाने वाले व्यक्ति से स्पष्ट सत्यनिष्ठा और जिम्मेदारी की प्रतिज्ञा लेना बुरा विचार है?
हमारा उत्तर है—नहीं।
लेकिन एक जरूरी सुधार: हर बदला हुआ फैसला अपराध नहीं
यहां एक बात बिल्कुल स्पष्ट करनी जरूरी है। यदि हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट ने किसी निचली अदालत के फैसले को बदल दिया, तो इसका अर्थ यह नहीं हो सकता कि निचली अदालत का जज बेईमान था या उसने अपराध किया था। न्याय व्यवस्था में अपील की व्यवस्था इसी कारण बनाई गई है कि कानून की व्याख्या, साक्ष्यों का मूल्यांकन या प्रक्रिया में त्रुटि होने पर ऊपर की अदालत उसे सुधार सके। एक जज का फैसला ऊपरी अदालत द्वारा बदल दिया जाना अपने आप में अपराध नहीं है। इसलिए हमारी प्रस्तावित व्यवस्था का उद्देश्य यह नहीं होना चाहिए कि—
“हर वह जज जिसका फैसला ऊपर की अदालत बदल दे, उसे सजा मिले।” ऐसी व्यवस्था न्यायिक स्वतंत्रता के लिए गंभीर समस्या पैदा कर सकती है। इसके बजाय व्यवस्था यह होनी चाहिए कि यदि किसी जांच या निर्धारित न्यायिक प्रक्रिया से यह सिद्ध हो कि न्यायाधीश ने जानबूझकर कानून की अवहेलना की, भ्रष्ट उद्देश्य से निर्णय दिया, पक्षपात किया, गंभीर कदाचार किया या ऐसी गंभीर और अक्षम्य लापरवाही की जिससे न्याय प्रभावित हुआ, तो उसके लिए कानून के अनुसार जवाबदेही तय हो। यही अंतर इस प्रस्ताव को भावनात्मक मांग से उठाकर गंभीर संवैधानिक सुधार के प्रस्ताव में बदल सकता है।
जज की प्रस्तावित मुकदमा-पूर्व प्रतिज्ञा कैसी हो?
इस दिशा में संसद, विधि आयोग, सुप्रीम कोर्ट और संवैधानिक विशेषज्ञ मिलकर एक मॉडल तैयार कर सकते हैं।
उदाहरण के तौर पर प्रस्तावित प्रतिज्ञा का भाव इस प्रकार हो सकता है—
“मैं इस मामले की सुनवाई करते हुए संविधान, कानून, उपलब्ध साक्ष्यों और न्याय के स्थापित सिद्धांतों के अनुसार निष्पक्ष निर्णय करने का संकल्प लेता/लेती हूं। मैं किसी भय, पक्षपात, स्नेह, द्वेष, व्यक्तिगत हित, आर्थिक लाभ, राजनीतिक प्रभाव अथवा किसी अन्य अनुचित प्रभाव से प्रभावित हुए बिना अपने न्यायिक कर्तव्य का निर्वहन करूंगा/करूंगी। यदि मेरे विरुद्ध कानून सम्मत प्रक्रिया में जानबूझकर किए गए कदाचार, भ्रष्ट आचरण अथवा गंभीर कर्तव्य-उल्लंघन का दोष सिद्ध होता है, तो मैं कानून द्वारा निर्धारित जवाबदेही स्वीकार करूंगा/करूंगी।”
यह प्रतिज्ञा न्यायाधीश को अपील के निर्णय के लिए दंडित करने वाली नहीं, बल्कि जानबूझकर किए गए गलत आचरण के लिए जवाबदेही सुनिश्चित करने वाली होनी चाहिए।
वकील के लिए भी मुकदमे से पहले प्रतिज्ञा क्यों नहीं?
वकील न्याय व्यवस्था के महत्वपूर्ण अंग हैं। उनका काम केवल अपने मुवक्किल को हर हाल में जिताना नहीं है। उनका काम कानून के दायरे में अपने मुवक्किल के हितों की प्रभावी पैरवी करना है। Bar Council of India के मौजूदा पेशेवर नियम पहले से ही वकीलों से कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों की अपेक्षा करते हैं। मसलन, वकील को अदालत के प्रति सम्मान रखना चाहिए, अनुचित साधनों का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए और अपने मुवक्किल को भी अनुचित साधन अपनाने से रोकने का प्रयास करना चाहिए। BCI के नियम वकील को अपने मुवक्किल के हितों को fair and honourable means से आगे बढ़ाने तथा महत्वपूर्ण सामग्री या साक्ष्य को दबाने से बचने जैसे कर्तव्य भी बताते हैं। Advocates Act, 1961 में पेशेवर या अन्य misconduct के मामलों में अनुशासनात्मक कार्रवाई का प्रावधान भी है। फिर भी प्रत्येक मुकदमे से पहले एक छोटी-सी प्रतिज्ञा व्यवस्था को और मजबूत कर सकती है।
मसलन—
“मैं इस मामले में अपने मुवक्किल की पैरवी कानून, सत्य और पेशेवर आचार के दायरे में रहकर करूंगा/करूंगी। मैं न्यायालय को जानबूझकर गुमराह नहीं करूंगा/करूंगी, झूठे या अनुचित साधनों का सहारा नहीं लूंगा/लूंगी और अपने पेशेवर कर्तव्यों का ईमानदारी से पालन करूंगा/करूंगी। सिद्ध कदाचार की स्थिति में कानून के अनुसार जवाबदेही स्वीकार करूंगा/करूंगी।”
यहां भी मुवक्किल का केस हारना वकील का अपराध नहीं माना जाना चाहिए। हार-जीत और पेशेवर धोखाधड़ी दो अलग बातें हैं।
क्या हर पेशे में ऐसी प्रतिज्ञा हो सकती है?
यहीं से यह विचार न्यायालय की चारदीवारी से निकलकर पूरे समाज का प्रश्न बन जाता है।
कल्पना कीजिए—
डॉक्टर कहे—
“मैं मरीज के हित, चिकित्सा विज्ञान और पेशेवर नैतिकता के अनुसार उपचार कर रहा हूं।”
शिक्षक कहे—
“मैं विद्यार्थियों के साथ निष्पक्ष व्यवहार कर रहा हूं और अपने ज्ञान तथा पद का दुरुपयोग नहीं रहा, ऐसा मैं वचन देता हूं।”
इंजीनियर कहे—
“मैंने निर्माण और तकनीकी कार्य में सुरक्षा, मानकों और सत्यनिष्ठा का पालन किया है, मैं वचन देता हूं।”
पत्रकार कहे—
“मैंने प्रकाशित समाचार को सत्यापित करके प्रकाशित किया है और जानबूझकर असत्य या भ्रामक सूचना प्रकाशित नहीं की है।”
व्यापारी कहे—
“मैंने उपभोक्ता को उत्पाद के बारे में जानबूझकर गलत जानकारी नहीं दी है और कानून के अनुरूप व्यापार किया है, इसका मैं वचन देता हूं।”
कंपनी कहे—
“हमने अपने उत्पाद और सेवाओं के संबंध में उपभोक्ता को सही और आवश्यक जानकारी दी है। कानून के उल्लंघन पर निर्धारित जवाबदेही स्वीकार करते हैं।”
क्या इससे हर अपराध समाप्त हो जाएगा? नहीं। लेकिन क्या इससे जिम्मेदारी की संस्कृति मजबूत हो सकती है? निश्चित रूप से।
पत्रकारिता में हर खबर से पहले सत्यनिष्ठा का संकल्प
यह विचार मीडिया के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। आज एक खबर कुछ ही सेकंड में हजारों, लाखों लोगों तक पहुंच सकती है। गलत खबर केवल एक व्यक्ति को नुकसान नहीं पहुंचाती; वह सामाजिक तनाव, आर्थिक नुकसान और सार्वजनिक भ्रम भी पैदा कर सकती है। इसलिए एक आदर्श पत्रकारिता व्यवस्था में प्रत्येक महत्वपूर्ण खबर के साथ एक छोटा-सा “सत्यापन संकल्प” क्यों न हो?
मसलन—
“इस समाचार को उपलब्ध स्रोतों और प्राप्त तथ्यों के आधार पर सत्यापित कर प्रकाशित किया गया है। किसी तथ्य में त्रुटि पाए जाने पर उसे नियमानुसार तत्काल सुधारने/स्पष्ट करने का दायित्व स्वीकार किया जाता है।”
यह व्यवस्था पत्रकार को हर खबर के लिए अपराधी बनाने के लिए नहीं होगी। क्योंकि पत्रकारिता में भी परिस्थितियां बदलती हैं, स्रोत गलत सूचना दे सकते हैं और शुरुआती जानकारी अधूरी हो सकती है। इसलिए जानबूझकर झूठ फैलाना और ईमानदार प्रयास के बावजूद तथ्यात्मक गलती हो जाना—इन दोनों को अलग-अलग माना जाना चाहिए।
व्यापार में भी “सत्य का लेबल” क्यों नहीं?
हम किसी दुकान से सामान खरीदते हैं। पैकिंग पर कंपनी का नाम है। कीमत है। वजन है। निर्माण और समाप्ति की तारीख है। उत्पाद के बारे में कई दावे हैं। लेकिन उपभोक्ता के सामने सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न होता है—क्या जो लिखा है, वह सच है? यदि कंपनियों और विक्रेताओं के लिए एक मजबूत डिजिटल/लिखित सत्यनिष्ठा घोषणा की व्यवस्था हो, जिसमें स्पष्ट हो कि उत्पाद संबंधी अनिवार्य दावे कानून के अनुरूप हैं और गलत पाए जाने पर वैधानिक कार्रवाई स्वीकार होगी, तो उपभोक्ता का भरोसा बढ़ सकता है। यहां भी ध्यान रखना होगा कि हर खराब उत्पाद को बेचने वाला व्यक्ति स्वतः अपराधी नहीं हो जाता। दोष, ज्ञान, लापरवाही, मानक उल्लंघन और धोखाधड़ी की अलग-अलग कानूनी कसौटियां होती हैं। इसलिए प्रस्ताव का आधार होना चाहिए—“सत्य बोलो, सही जानकारी दो और जानबूझकर धोखा देने पर जवाबदेह बनो।”
शपथ से आगे—जवाबदेही की वास्तविक व्यवस्था जरूरी
केवल शपथ दिला देने से व्यवस्था नहीं बदलेगी। यदि शपथ के बाद उल्लंघन पर कोई प्रभावी प्रक्रिया नहीं है तो शपथ केवल औपचारिकता बन जाएगी। इसलिए प्रस्ताव के तीन हिस्से होने चाहिए—
पहला—प्रतिज्ञा
हर महत्वपूर्ण सार्वजनिक/पेशेवर जिम्मेदारी निभाने वाले व्यक्ति को अपनी भूमिका की सत्यनिष्ठा की प्रतिज्ञा।
दूसरा—रिकॉर्ड
प्रतिज्ञा का डिजिटल रिकॉर्ड या केस/लेनदेन/प्रकाशन से जुड़ा रिकॉर्ड।
तीसरा—जवाबदेही
सिर्फ उसी स्थिति में कार्रवाई जब निर्धारित कानून और निष्पक्ष प्रक्रिया से जानबूझकर गलत आचरण, धोखाधड़ी, भ्रष्टाचार, गंभीर कदाचार या अन्य दंडनीय उल्लंघन सिद्ध हो।
क्या इससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता प्रभावित होगी?
यह सबसे बड़ा संवैधानिक प्रश्न होगा। न्यायपालिका की स्वतंत्रता लोकतंत्र की बुनियादी शर्तों में से एक है। यदि हर बार अपील में फैसला बदलने पर जज को दंड का भय रहेगा तो न्यायाधीश स्वतंत्र होकर फैसला नहीं कर पाएगा। इसलिए प्रस्ताव को इस तरह बनाया जाना चाहिए कि—
“गलत निर्णय” और “जानबूझकर गलत निर्णय” में स्पष्ट अंतर रहे। अदालतों में कानून की व्याख्या को लेकर मतभेद होना सामान्य है। एक जज किसी कानून की एक व्याख्या कर सकता है और अपीलीय अदालत दूसरी व्याख्या स्वीकार कर सकती है। इसे अपराध कहना न्याय व्यवस्था के लिए खतरनाक होगा। लेकिन यदि किसी जज पर रिश्वत लेने, जानबूझकर पक्षपात करने, व्यक्तिगत हित के लिए फैसला प्रभावित करने या गंभीर न्यायिक कदाचार का आरोप है और कानून सम्मत प्रक्रिया में वह सिद्ध होता है, तो जवाबदेही का सवाल उठना स्वाभाविक है। इसलिए प्रस्तावित शपथ न्यायिक स्वतंत्रता और न्यायिक जवाबदेही के बीच संतुलन बनाने वाली होनी चाहिए। और आरोप लगते ही जज को न्यायिक व्यवस्था से खुद को अलग कर लेना चाहिए और निर्दोष साबित होने पर ही उसे फिर से सेवा में लिया जाए।
भारत को “शपथ आधारित जवाबदेही” की ओर बढ़ना चाहिए
हमारे संविधान की खूबसूरती यह है कि वह केवल अधिकारों की बात नहीं करता, बल्कि संस्थाओं और पदों की जिम्मेदारी भी तय करता है। लेकिन बदलते समय में केवल पद ग्रहण करते समय शपथ लेना पर्याप्त है या नहीं—इस पर बहस होनी चाहिए। आज प्रशासन डिजिटल है। आज अदालतों में लाखों मामले हैं। आज एक सोशल मीडिया पोस्ट कुछ मिनटों में लाखों लोगों तक पहुंच जाती है। आज किसी कंपनी का उत्पाद देश के किसी भी कोने में बिक सकता है। आज एक डॉक्टर की सलाह इंटरनेट के माध्यम से हजारों लोगों तक पहुंच सकती है।आज एक पत्रकार की खबर का प्रभाव स्थानीय सीमा से बहुत आगे निकल सकता है। ऐसे समय में जिम्मेदारी को भी आधुनिक बनाया जाना चाहिए।
क्या हर नागरिक से शपथ ली जाएगी? नहीं, लेकिन हर जिम्मेदारी से क्यों नहीं?
यह प्रस्ताव किसी सामान्य नागरिक को हर रोज शपथ दिलाने का नहीं है। एक सामान्य व्यक्ति का सामान्य जीवन शपथपत्रों के बोझ तले दबाना लोकतांत्रिक समाज के लिए उचित नहीं होगा। लेकिन जहां व्यक्ति को कानून, जीवन, संपत्ति, सार्वजनिक सूचना, शिक्षा, चिकित्सा, न्याय, उपभोक्ता अधिकार या किसी अन्य महत्वपूर्ण सार्वजनिक जिम्मेदारी का अधिकार दिया गया है, वहां सत्यनिष्ठा की स्पष्ट प्रतिज्ञा पर विचार किया जा सकता है।
यानी—
अधिकार जितना बड़ा, जिम्मेदारी उतनी बड़ी। और जहां जिम्मेदारी बड़ी है, वहां जवाबदेही भी स्पष्ट होनी चाहिए।
राइजिंग भास्कर की मांग: संविधान में व्यापक “जिम्मेदारी और सत्यनिष्ठा” का सिद्धांत जोड़ा जाए
राइजिंग भास्कर की ओर से यह मांग किसी व्यक्ति, संस्था, न्यायपालिका, वकील, पत्रकार, डॉक्टर, व्यापारी या किसी पेशे को कठघरे में खड़ा करने की मांग नहीं है। यह मांग व्यवस्था को मजबूत करने की मांग है। हम चाहते हैं कि केंद्र सरकार, संसद, विधि आयोग, सुप्रीम कोर्ट, बार काउंसिल, चिकित्सा एवं अन्य पेशेवर नियामक संस्थाएं इस विषय पर गंभीर राष्ट्रीय विमर्श शुरू करें। विचार किया जाए कि क्या संविधान, कानूनों और पेशेवर नियमों में ऐसी व्यवस्था बनाई जा सकती है जिसके तहत—
न्यायाधीश—निष्पक्ष न्याय की प्रतिज्ञा लें।
वकील—कानून और सत्यनिष्ठा से पैरवी की प्रतिज्ञा लें।
पुलिस—कानून और नागरिक अधिकारों की रक्षा की प्रतिज्ञा लें।
डॉक्टर—मरीज के हित और चिकित्सा नैतिकता की प्रतिज्ञा लें।
शिक्षक—विद्यार्थी के हित और निष्पक्ष शिक्षा की प्रतिज्ञा लें।
इंजीनियर—सुरक्षा और तकनीकी सत्यनिष्ठा की प्रतिज्ञा लें।
पत्रकार—तथ्य-जांच और सत्यनिष्ठ पत्रकारिता की प्रतिज्ञा लें।
व्यापारी और कंपनियां—उपभोक्ता के प्रति सत्य और पारदर्शिता की घोषणा करें।
और हर क्षेत्र में—
जानबूझकर किए गए गंभीर उल्लंघन पर कानून सम्मत जवाबदेही सुनिश्चित हो।
शपथ डर की नहीं, चरित्र की व्यवस्था बने
भारत को ऐसी व्यवस्था की आवश्यकता नहीं जिसमें हर व्यक्ति सजा के डर से काम करे। भारत को ऐसी व्यवस्था चाहिए जिसमें व्यक्ति अपने कर्तव्य को समझकर काम करे। शपथ उसी दिशा में एक मनोवैज्ञानिक और नैतिक कदम हो सकती है। जब कोई न्यायाधीश मुकदमे की शुरुआत में कहे—
“मैं इस मामले में बिना भय, पक्षपात, स्नेह या द्वेष के न्याय करूंगा।”
जब वकील कहे—
“मैं कानून के दायरे में रहकर ईमानदारी से पैरवी करूंगा।”
जब डॉक्टर कहे—
“मैं मरीज के हित को सर्वोच्च प्राथमिकता दूंगा।”
जब पत्रकार कहे—
“मैं सत्यापन के बाद समाचार प्रकाशित करूंगा।”
जब व्यापारी कहे—
“मैं उपभोक्ता को जानबूझकर धोखा नहीं दूंगा।”
और जब शिक्षक कहे—
“मैं अपने विद्यार्थी के भविष्य के साथ ईमानदारी बरतूंगा।”
तो यह केवल शब्द नहीं होंगे।
यह पूरे समाज के सामने जिम्मेदारी का सार्वजनिक संकल्प होगा।
सवाल शपथ का नहीं, भरोसे का है
आखिर में असली प्रश्न यह नहीं है कि कितनी शपथ होंगी। असली प्रश्न यह है कि—
क्या भारत की व्यवस्था में नागरिक का भरोसा और बढ़ सकता है?
क्या पीड़ित को यह भरोसा हो सकता है कि न्यायालय में उसका मामला निष्पक्ष रूप से सुना जाएगा? क्या मुवक्किल को भरोसा हो सकता है कि उसका वकील उसे कानून के दायरे में पूरी ईमानदारी से सलाह देगा? क्या मरीज को भरोसा हो सकता है कि डॉक्टर उसके स्वास्थ्य को प्राथमिकता देगा? क्या अभिभावक को भरोसा हो सकता है कि शिक्षक उसके बच्चे के भविष्य के साथ ईमानदारी करेगा? क्या पाठक को भरोसा हो सकता है कि पत्रकार खबर को तथ्य के आधार पर प्रकाशित करेगा? क्या ग्राहक को भरोसा हो सकता है कि उत्पाद के बारे में दी गई जानकारी सही है? और क्या नागरिक को यह भरोसा हो सकता है कि बड़ी जिम्मेदारी संभालने वाले व्यक्ति से भी जवाबदेही मांगी जा सकती है? यदि इन सवालों का जवाब “हां” बनाना है, तो अब समय आ गया है कि भारत अधिकारों के साथ जिम्मेदारी और स्वतंत्रता के साथ जवाबदेही पर भी राष्ट्रीय बहस करे।
राइजिंग भास्कर इस बहस की शुरुआत एक सवाल से करता है—
“जब न्याय मांगने वाले को सत्य बोलने की शपथ दिलाई जाती है, तो न्याय देने वाले की प्रत्येक सुनवाई के आरंभ में सत्यनिष्ठा की प्रतिज्ञा क्यों नहीं?”
और यही सवाल अदालत से निकलकर संसद, सरकार, मीडिया, चिकित्सा, शिक्षा, उद्योग और समाज के हर जिम्मेदार क्षेत्र तक जाना चाहिए। क्योंकि लोकतंत्र केवल इस बात से मजबूत नहीं होता कि नागरिकों को कितने अधिकार मिले हैं। लोकतंत्र तब मजबूत होता है, जब अधिकार पाने वाला, अधिकार इस्तेमाल करने वाला और निर्णय लेने वाला—हर व्यक्ति अपनी जिम्मेदारी भी समझता है।
दिलीप कुमार पुरोहित
ग्रुप एडिटर, राइजिंग भास्कर
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