नौकरी से ज्यादा सुरक्षा, सम्मान और सामाजिक हैसियत की तलाश—झारखंड के युवाओं का आक्रोश सिर्फ एक परीक्षा का विवाद नहीं
दिलीप कुमार पुरोहित. रांची
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झारखंड में झारखंड लोक सेवा आयोग (JPSC) और झारखंड कर्मचारी चयन आयोग (JSSC) की भर्ती परीक्षाओं को लेकर युवाओं का आंदोलन अब केवल परीक्षा में कथित अनियमितताओं तक सीमित नहीं रह गया है। हजारों अभ्यर्थियों का सड़कों पर उतरना उस बड़े सवाल की ओर इशारा कर रहा है, जिसे भारत लंबे समय से टालता आया है—आखिर सरकारी नौकरी भारतीय युवाओं के लिए इतनी बड़ी मंजिल क्यों बन गई है?
10 अगस्त 2026 को रांची में विधानसभा की ओर मार्च कर रहे प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच टकराव हुआ। पुलिस ने आंसू गैस, पानी की बौछार और लाठी का इस्तेमाल किया। अभ्यर्थी भर्ती प्रक्रिया में कथित गड़बड़ियों की निष्पक्ष जांच और परीक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग कर रहे हैं। आंदोलन 25 जुलाई से चल रहा है और मामला अब राज्य की राजनीति का भी बड़ा मुद्दा बन चुका है।
लेकिन इस पूरे घटनाक्रम को केवल ‘JPSC विवाद’ कहकर खत्म कर देना आसान होगा। असली कहानी इसके कहीं अधिक गहरे भीतर छिपी है।
सरकारी नौकरी आखिर इतनी महत्वपूर्ण क्यों?
भारत में सरकारी नौकरी का अर्थ केवल हर महीने मिलने वाली तनख्वाह नहीं है। यह नौकरी परिवार के लिए स्थायित्व, सामाजिक प्रतिष्ठा, भविष्य की सुरक्षा और आर्थिक भरोसे का प्रतीक बन चुकी है। एक युवा जब सरकारी अफसर बनने की तैयारी शुरू करता है तो उसके सामने सिर्फ एक नौकरी नहीं होती। उसके परिवार को लगता है कि बेटे या बेटी का भविष्य सुरक्षित हो जाएगा। समाज में सम्मान बढ़ेगा। शादी-ब्याह में बेहतर रिश्ते आएंगे। बैंक से ऋण लेना आसान होगा। परिवार की आर्थिक स्थिति सुधरेगी और सबसे महत्वपूर्ण—नौकरी जाने का डर अपेक्षाकृत कम होगा। यही कारण है कि देश के छोटे शहरों और कस्बों में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी एक समानांतर अर्थव्यवस्था बन चुकी है। कोचिंग संस्थान, हॉस्टल, पुस्तकालय, नोट्स, टेस्ट सीरीज और ऑनलाइन पाठ्यक्रम—सब एक ऐसे सपने के आसपास खड़े हैं, जिसका नाम है ‘सरकारी नौकरी’।
लेकिन समस्या सपना देखने में नहीं है
सरकारी अफसर बनने का सपना देखना गलत नहीं है। समस्या तब पैदा होती है जब देश की शिक्षा व्यवस्था और रोजगार व्यवस्था युवाओं को इतने सीमित विकल्प देती है कि लाखों लोग एक ही दरवाजे पर दस्तक देने लगते हैं। JPSC की 2026 की सिविल सेवा परीक्षा में 103 पदों के लिए विज्ञापन जारी हुआ था। प्रारंभिक परीक्षा के बाद 2,204 अभ्यर्थियों को मुख्य परीक्षा के लिए चुना गया। परिणाम की पारदर्शिता, कटऑफ और मेरिट सूची को लेकर अभ्यर्थियों ने सवाल उठाए। कल्पना कीजिए—एक तरफ हजारों युवा वर्षों तक तैयारी करते हैं, दूसरी तरफ उपलब्ध पदों की संख्या सीमित है। ऐसे में परीक्षा प्रक्रिया की निष्पक्षता पर जरा-सा भी संदेह पैदा हो जाए तो अभ्यर्थियों का गुस्सा स्वाभाविक रूप से फूट सकता है। यही JPSC आंदोलन की सबसे महत्वपूर्ण परत है।
एक परीक्षा नहीं, वर्षों की मेहनत दांव पर
प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करने वाला युवा सिर्फ परीक्षा केंद्र में कुछ घंटे नहीं बिताता। उसके पीछे कई वर्षों की मेहनत होती है। कई विद्यार्थी स्नातक की पढ़ाई के बाद प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में लग जाते हैं। कुछ विद्यार्थी नौकरी छोड़कर तैयारी करते हैं। कुछ के परिवार वर्षों तक उनकी आर्थिक मदद करते हैं। गांव से शहर आने वाले विद्यार्थियों के लिए किराया, भोजन, किताबें और कोचिंग का खर्च परिवार उठाता है। इसलिए जब किसी परीक्षा की निष्पक्षता पर सवाल उठता है तो विद्यार्थी इसे केवल एक प्रशासनिक गलती नहीं मानता। उसे लगता है कि उसके जीवन के कई साल खतरे में पड़ गए हैं। यही भावना आंदोलन को जन्म देती है। JPSC-JSSC आंदोलन में प्रदर्शनकारी परीक्षा रद्द करने, कथित अनियमितताओं की जांच और निष्पक्ष प्रक्रिया की मांग कर रहे हैं। विधानसभा में भी यह मुद्दा उठा है और विपक्ष ने जांच की मांग की है।
सरकारी नौकरी के पीछे पांच बड़े कारण
1. नौकरी की सुरक्षा
निजी क्षेत्र में छंटनी और रोजगार की अनिश्चितता के बीच सरकारी नौकरी अधिक सुरक्षित मानी जाती है।
2. सामाजिक प्रतिष्ठा
‘सरकारी अफसर’ आज भी भारतीय समाज में सम्मान और प्रभाव का बड़ा प्रतीक है।
3. परिवार की आर्थिक सुरक्षा
नियमित आय और सेवा संबंधी सुविधाएं परिवार को भविष्य के प्रति भरोसा देती हैं।
4. सीमित निजी रोजगार
छोटे शहरों और कस्बों में गुणवत्तापूर्ण तथा स्थायी निजी नौकरियों के अवसर सीमित हैं।
5. सामाजिक दबाव
परिवार और समाज अक्सर युवाओं से पूछते हैं—‘सरकारी नौकरी का क्या हुआ?’ यह सवाल कई युवाओं की पूरी जिंदगी की दिशा तय कर देता है।
भारत में ‘अफसर’ बनने की मानसिकता कैसे बनी?
भारत का औपनिवेशिक प्रशासनिक ढांचा भी इस मानसिकता को समझने में महत्वपूर्ण है। अफसर का मतलब लंबे समय तक सत्ता और व्यवस्था के केंद्र में बैठा व्यक्ति रहा। स्वतंत्र भारत में भी प्रशासनिक सेवाओं को विशेष महत्व मिला। जिला प्रशासन से लेकर राज्य और केंद्र तक अधिकारियों के पास निर्णय लेने की बड़ी जिम्मेदारियां रहीं। समय के साथ ‘अफसर’ शब्द सिर्फ पद नहीं रहा—यह प्रतिष्ठा का दर्जा बन गया। आज भी किसी छोटे शहर में अगर किसी परिवार का बेटा IAS, IPS, PCS या किसी अन्य प्रतिष्ठित सरकारी सेवा में चयनित हो जाता है तो पूरा परिवार इसे सामाजिक उपलब्धि मानता है। यह गौरव गलत नहीं है। लेकिन सवाल यह है कि क्या हम समाज में सफलता की परिभाषा को केवल सरकारी पदों तक सीमित कर रहे हैं?
युवा नौकरी चाहता है या सम्मान?
यह सवाल भी महत्वपूर्ण है। कई बार युवा सरकारी नौकरी इसलिए नहीं चाहता कि उसे प्रशासन में काम करने का विशेष जुनून है। वह इसलिए चाहता है क्योंकि उसे एक स्थिर जीवन चाहिए। उसे लगता है कि सरकारी नौकरी मिलने के बाद जिंदगी व्यवस्थित हो जाएगी। यह स्थिति देश की अर्थव्यवस्था के लिए एक संकेत है। अगर प्रतिभाशाली युवा उद्यमिता, शोध, विज्ञान, तकनीक, कृषि, उद्योग और नए व्यवसायों के बजाय वर्षों तक केवल सरकारी भर्ती परीक्षाओं की तैयारी में लगे रहें तो अर्थव्यवस्था को उनकी प्रतिभा का पूरा लाभ नहीं मिल पाता। युवा की ऊर्जा प्रतियोगिता में खर्च हो जाती है, निर्माण में नहीं।
‘सरकारी नौकरी’ के सपने की कीमत
एक विद्यार्थी की कीमत केवल परीक्षा शुल्क नहीं है।
- कई साल की तैयारी
- परिवार का आर्थिक खर्च
- कोचिंग और किताबों का खर्च
- नौकरी छोड़ने की संभावित कीमत
- उम्र निकलने का दबाव
- असफलता का मानसिक दबाव
- विवाह और परिवार का सामाजिक दबाव
- बार-बार परीक्षा और परिणाम की प्रतीक्षा
इसलिए भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता सिर्फ प्रशासनिक आवश्यकता नहीं, युवाओं के भविष्य का सवाल है।
परीक्षा व्यवस्था पर भरोसा सबसे जरूरी
किसी भी प्रतियोगी परीक्षा की सबसे बड़ी पूंजी उसका प्रश्नपत्र नहीं, बल्कि विश्वास होता है। अभ्यर्थी यह विश्वास लेकर परीक्षा देता है कि सभी को समान अवसर मिलेगा। उसे भरोसा होता है कि उसकी मेहनत का मूल्यांकन निष्पक्ष तरीके से होगा। अगर यह भरोसा टूटता है तो पूरी व्यवस्था पर प्रश्न खड़ा हो जाता है। इसीलिए परीक्षा में कथित अनियमितताओं के आरोपों की जांच निष्पक्ष, पारदर्शी और समयबद्ध तरीके से होना जरूरी है। आरोप सही हैं या गलत—इसका फैसला जांच से होना चाहिए, सड़क के शोर से नहीं। लेकिन जांच की मांग को दबा देना भी समाधान नहीं है। सरकार और आयोग के लिए सबसे जरूरी काम यही है कि वे अभ्यर्थियों के सवालों का तथ्यों के साथ जवाब दें।
JPSC आंदोलन का दूसरा चेहरा—बेरोजगारी
इस आंदोलन को केवल झारखंड तक सीमित करके देखना भी सही नहीं होगा। देशभर में प्रतियोगी परीक्षाओं को लेकर युवाओं का आक्रोश समय-समय पर सामने आता रहा है। सरकारी नौकरियों के लिए आवेदकों की संख्या बहुत अधिक होती है, जबकि रिक्तियां सीमित होती हैं। झारखंड में हालिया आंदोलन में भी बेरोजगारी और अवसरों की कमी की चिंता प्रमुख पृष्ठभूमि के रूप में दिखाई देती है। युवा पूछ रहा है—पढ़ाई करने के बाद जाएं तो जाएं कहां? यही सवाल सबसे गंभीर है।
सवाल JPSC से बड़ा है
- क्या भारत युवाओं को पर्याप्त रोजगार दे रहा है?
- क्या निजी क्षेत्र सरकारी नौकरी का भरोसेमंद विकल्प बन पाया है?
- क्या छोटे शहरों के युवाओं के लिए समान अवसर हैं?
- क्या प्रतियोगी परीक्षाओं की संख्या और प्रक्रिया समयबद्ध है?
- क्या परीक्षा में गलती होने पर जवाबदेही तय होती है?
- क्या सरकारी नौकरी को सफलता का एकमात्र पैमाना बना दिया गया है?
‘सरकारी अफसर’ बनना लक्ष्य रहे, लेकिन एकमात्र लक्ष्य नहीं
भारत को सरकारी अफसरों की जरूरत है। प्रशासन चलाने के लिए ईमानदार, सक्षम और संवेदनशील अधिकारियों की आवश्यकता हमेशा रहेगी। लेकिन भारत को उतनी ही जरूरत वैज्ञानिकों की है। डॉक्टरों की है। इंजीनियरों की है। शिक्षकों की है। उद्यमियों की है। किसानों की है। कलाकारों की है। पत्रकारों की है। तकनीकी विशेषज्ञों की है। शोधकर्ताओं की है। देश तब मजबूत होगा जब हर प्रतिभा को सम्मान मिलेगा, केवल सरकारी पद को नहीं। युवाओं के लिए सरकारी सेवा एक विकल्प होनी चाहिए—मजबूरी नहीं।
असली सुधार परीक्षा से पहले शुरू होना चाहिए
यदि सरकारें वास्तव में युवाओं का दबाव कम करना चाहती हैं तो केवल परीक्षा व्यवस्था सुधारना पर्याप्त नहीं होगा। उन्हें गुणवत्तापूर्ण रोजगार के अवसर बढ़ाने होंगे। छोटे शहरों में उद्योग और सेवा क्षेत्र विकसित करने होंगे। स्टार्टअप और छोटे कारोबार को वास्तविक समर्थन देना होगा। व्यावसायिक शिक्षा को मजबूत करना होगा। विश्वविद्यालयों में शोध के अवसर बढ़ाने होंगे। और सबसे महत्वपूर्ण—भर्ती प्रक्रिया को कैलेंडर के अनुसार चलाना होगा। परीक्षा समय पर हो, परिणाम समय पर आए, नियुक्ति समय पर हो और यदि किसी कारण से परीक्षा रद्द होती है तो अभ्यर्थियों को स्पष्ट और पारदर्शी जवाब मिले। सरकारी नौकरी के लिए पांच-दस साल इंतजार करता युवा केवल बेरोजगार नहीं रहता; वह अपनी जिंदगी का सबसे उत्पादक समय भी प्रतीक्षा में लगा देता है।
अब सवाल सरकार से ही नहीं, समाज से भी है
- JPSC आंदोलन ने सरकार और भर्ती आयोग के सामने सवाल खड़े किए हैं। लेकिन समाज को भी आईना देखना होगा। हम अपने बच्चों से बार-बार क्यों पूछते हैं—‘सरकारी नौकरी लगी या नहीं?’
- हम यह क्यों नहीं पूछते—‘तुम क्या सीख रहे हो?’
- हम यह क्यों नहीं पूछते—‘तुम क्या नया बना सकते हो?’
- हम नौकरी को सफलता का पैमाना और उद्यमिता को जोखिम क्यों मानते हैं?
- जब तक यह मानसिकता नहीं बदलेगी, तब तक हर प्रतियोगी परीक्षा के बाहर हजारों युवाओं की भीड़ दिखाई देती रहेगी।
JPSC की सड़क से उठी आवाज दूर तक जाएगी
झारखंड में JPSC-JSSC को लेकर चल रहा आंदोलन तत्काल तौर पर परीक्षा की निष्पक्षता और भर्ती प्रक्रिया का सवाल है। लेकिन इसकी गूंज इससे कहीं आगे जाती है। यह उस भारत की तस्वीर है जहां लाखों युवा शिक्षित हो रहे हैं, लेकिन सुरक्षित और सम्मानजनक रोजगार के विकल्पों को लेकर असमंजस में हैं। यह उस परिवार की कहानी है जो अपने बच्चे को वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करवाता है। यह उस युवा की कहानी है जो उम्र, परीक्षा और परिणाम के बीच अपना भविष्य तलाश रहा है। और यह उस व्यवस्था से सवाल है, जिसे अपने युवाओं को केवल यह कहकर संतुष्ट नहीं करना चाहिए कि ‘सरकारी नौकरी के लिए मेहनत करो।’ उसे यह भी सुनिश्चित करना होगा कि मेहनत करने वाले युवा के सामने ईमानदार परीक्षा, पारदर्शी चयन और पर्याप्त रोजगार के अवसर मौजूद हों। क्योंकि सवाल सिर्फ यह नहीं है कि ‘JPSC की परीक्षा सही हुई या नहीं?’
बड़ा सवाल यह है—
“आखिर ऐसा भारत कब बनेगा, जहां युवा सरकारी अफसर बनने का सपना देखे तो खुशी से देखे, लेकिन सरकारी नौकरी न मिलने पर उसे अपना भविष्य अंधकारमय न लगे?”
यही JPSC आंदोलन का सबसे बड़ा संदेश है।
Author: Dilip Purohit
Group Editor


