प्रमुख सचिव सातों संभागों का कर रहे दौरा, 693 बांधों में पिछले साल के मुकाबले करीब 29% कम पानी; दिवाली से पहले तैयार होगी आकस्मिक कार्ययोजना
जयपुर। राजस्थान में मानसून की बेरुखी और बदलते मौसमी हालात के बीच पेयजल संकट से निपटना सरकार के लिए बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। प्रदेश के बांधों में पिछले साल की तुलना में करीब 29 प्रतिशत कम पानी होने से आगामी महीनों में जलापूर्ति व्यवस्था पर दबाव बढ़ने की आशंका है। इसे देखते हुए राज्य सरकार ने जल संसाधनों की स्थिति का आकलन करने और संभावित पेयजल संकट से निपटने के लिए तैयारियां शुरू कर दी हैं।
राज्य सरकार के निर्देश पर जलदाय विभाग के प्रमुख सचिव सातों संभागों का दौरा कर रहे हैं। इस दौरान जल स्रोतों में उपलब्ध पानी, मौजूदा जलापूर्ति व्यवस्था और आगामी महीनों में संभावित मांग का आकलन किया जा रहा है। सरकार का प्रयास है कि दिवाली से पहले संकटग्रस्त क्षेत्रों की पहचान कर आकस्मिक कार्ययोजना तैयार कर ली जाए, ताकि जरूरत पड़ने पर समय रहते वैकल्पिक व्यवस्था की जा सके।
693 बांधों में पिछले साल से कम पानी
प्रदेश के 693 बांधों में उपलब्ध जल संसाधनों के आंकड़े चिंता बढ़ाने वाले हैं। रिपोर्ट के अनुसार, इन बांधों में कुल जलभराव पिछले साल की तुलना में लगभग 29 प्रतिशत कम है। बांधों में पानी की स्थिति का आकलन कर उन क्षेत्रों को प्राथमिकता दी जा रही है, जहां आने वाले समय में पेयजल की किल्लत पैदा हो सकती है। पेयजल के साथ कृषि क्षेत्र की जरूरतों को पूरा करना भी सरकार के सामने चुनौती है। बारिश और अन्य मौसमी परिस्थितियों का असर जल संसाधनों पर पड़ा है। ऐसे में उपलब्ध पानी का नियोजित उपयोग सुनिश्चित करना जरूरी हो गया है।
कई प्रमुख बांधों में जलभराव की स्थिति चिंताजनक
रिपोर्ट में प्रदेश के अलग-अलग बांधों में जलभराव की स्थिति के आंकड़े भी सामने आए हैं। इनमें पाली के जवाई बांध में 18.37 प्रतिशत, जोधपुर में 15.15 प्रतिशत और उदयपुर के 173 बांधों में 46 प्रतिशत जलभराव दर्ज किया गया है। जयपुर के 185 बांधों में 57 प्रतिशत, कोटा के 81 बांधों में 77 प्रतिशत और बांसवाड़ा के 53 बांधों में 67 प्रतिशत जलभराव बताया गया है। इसी तरह बीसलपुर बांध में 71.84 प्रतिशत, राणा प्रताप सागर में 72.21 प्रतिशत और माही बजाज सागर में 65.95 प्रतिशत जलभराव का उल्लेख किया गया है। इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि प्रदेश के अलग-अलग क्षेत्रों में जल उपलब्धता की स्थिति एक जैसी नहीं है। कुछ बांधों में अपेक्षाकृत बेहतर जलभराव है, जबकि कुछ क्षेत्रों में उपलब्ध पानी की स्थिति चिंता बढ़ा रही है। इसलिए क्षेत्रवार जरूरतों के अनुसार जल प्रबंधन की रणनीति बनाना जरूरी होगा।
सातों संभागों में होगा जल संसाधनों का आकलन
प्रमुख सचिव के संभागीय दौरों का उद्देश्य केवल बांधों में उपलब्ध पानी की स्थिति जानना नहीं है, बल्कि आगामी समय में पेयजल की मांग और आपूर्ति के बीच संभावित अंतर का भी आकलन करना है। इसके तहत उन शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों की पहचान की जा रही है, जहां जल स्रोतों में पानी कम होने के कारण नियमित जलापूर्ति प्रभावित हो सकती है। इसके अलावा वैकल्पिक जल स्रोतों, आपूर्ति व्यवस्था और जरूरत पड़ने पर अपनाए जाने वाले अन्य उपायों पर भी विचार किया जा रहा है। सरकार की कोशिश है कि संकट की स्थिति उत्पन्न होने के बाद कदम उठाने के बजाय पहले से तैयारी कर ली जाए। इसके लिए संबंधित अधिकारियों से क्षेत्रवार जानकारी जुटाई जा रही है।
दिवाली से पहले तैयार होगी आकस्मिक कार्ययोजना
मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के निर्देश पर जलदाय विभाग के अधिकारी संभावित संकट वाले क्षेत्रों की पहचान कर रहे हैं। आकलन के बाद जुलाई तक की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए आकस्मिक कार्ययोजना तैयार करने की बात कही गई है। इस योजना में प्रभावित क्षेत्रों की जरूरतों, उपलब्ध जल स्रोतों और संभावित मांग के आधार पर प्राथमिकताएं तय की जाएंगी। जिन क्षेत्रों में पानी की कमी की आशंका अधिक है, वहां समय रहते वैकल्पिक प्रबंध करने पर जोर रहेगा। आकस्मिक कार्ययोजना का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि जल स्रोतों में उपलब्ध पानी का इस्तेमाल व्यवस्थित तरीके से हो और किसी क्षेत्र में गंभीर संकट पैदा होने पर प्रशासन के पास तत्काल कार्रवाई के लिए स्पष्ट योजना मौजूद रहे।
पिछले साल से करीब 29 प्रतिशत कम पानी
जल संसाधन विभाग के आंकड़ों के अनुसार, प्रदेश के 693 बांधों में कुल जलभराव करीब 13,029.99 मिलियन घन मीटर बताया गया है। इनमें लगभग 8,014.55 मिलियन घन मीटर पानी उपलब्ध होने का उल्लेख है। रिपोर्ट में कुल जलभराव की स्थिति पिछले साल के मुकाबले करीब 29 प्रतिशत कम बताई गई है। पानी की उपलब्धता में यह अंतर आने वाले समय में जल प्रबंधन की चुनौती को बढ़ा सकता है। विशेष रूप से उन क्षेत्रों में परेशानी की आशंका है, जहां पेयजल के लिए सीमित जल स्रोतों पर निर्भरता अधिक है।
जल संरक्षण और नियोजन पर रहेगा जोर
राजस्थान जैसे शुष्क जलवायु वाले प्रदेश में जल संसाधनों का प्रभावी प्रबंधन हमेशा महत्वपूर्ण रहा है। ऐसे में कम जलभराव की स्थिति को देखते हुए पानी के विवेकपूर्ण उपयोग, उपलब्ध स्रोतों के संरक्षण और जरूरत के अनुसार वैकल्पिक व्यवस्था पर ध्यान देना जरूरी है। सरकार के सामने चुनौती यह भी है कि पेयजल की जरूरतों के साथ कृषि और अन्य क्षेत्रों की मांग के बीच संतुलन बनाया जाए। इसके लिए वास्तविक उपलब्धता के आधार पर योजना बनाना और संभावित संकट वाले क्षेत्रों की समय रहते पहचान करना महत्वपूर्ण होगा। फिलहाल सरकार का फोकस जल संसाधनों की स्थिति का आकलन कर संभावित पेयजल संकट से पहले तैयारी करने पर है। आने वाले समय में तैयार की जाने वाली कार्ययोजना और उसके क्रियान्वयन से यह तय होगा कि कम जलभराव की स्थिति के बावजूद प्रदेश में पेयजल आपूर्ति को किस हद तक सुचारु रखा जा सकेगा।
