गजेंद्र सिंह राजपुरोहित. जोधपुर ग्रामीण
जोधपुर जिले के सालवा कलां गांव में 500 से ज्यादा लोग फौज में हैं. यहां के 300 जवान सीमा की रक्षा कर रहे हैं. इस गांव की पांच पीढ़ियां सेना में सेवा दे रही है.वीर सपूतों का सालवा कलां गांव, 300 जवान पाकिस्तान को दे रहे मुंहतोड़ जवाब. यह वीर दुर्गादास की जन्मस्थली है. इनके पिता आसकरण थे. जिनके नाम से आसारनाडा रेलवे स्टेशन बना हुआ है.
जोधपुर के कई युवा कर रहे देश की सेवा
खास है राजस्थान के जोधपुर का सालवा कल्ला गांव
गांव में कई युवा कर रहे देश की सेवा. गांव को कहते हैं वीरों की धरती.जब पूरा देश चैन की नींद सोता है, तब सरहद पर खड़े हमारे जवान दिन-रात दुश्मनों से लोहा ले रहे होते हैं. इसी सिलसिले में मिशन सिंदूर के तहत भारतीय सेना, पाकिस्तान की नापाक हरकतों का करारा जवाब दे रही है. लेकिन इसी बीच राजस्थान के जोधपुर जिले का एक गांव ऐसा है, जो न केवल जागता है, बल्कि भारत की सीमाओं को मजबूत बनाए रखने में अपनी अहम भूमिका निभा रहा है. यह गांव है सालवा कल्ला, जो जनसंख्या में भले ही छोटा हो (लगभग 15000 लोग), लेकिन जज्बे में पूरे देश के लिए प्रेरणा बन गया है. इस गांव की खासियत यह है कि यहां के 500 से ज्यादा लोग फौज में हैं. 300 से ज्यादा जवान वर्तमान में देश की सीमाओं की रक्षा कर रहे हैं, जो मिशन संदूर में अपनी अहम भूमिका निभा रहे है.
जोधपुर जिले का सालवा कल्ला एक ऐसा गांव है जहां का हर एक घर भारतीय सेना से जुड़ा हुआ है. सालवा गांव में किसी भी घर में कदम रखें, तो वहां कोई न कोई सैनिक मिल जाएगा. कोई फौज में है, कोई नेवी में, कोई एयरफोर्स में, तो कोई किसी स्पेशल कमांडो यूनिट का हिस्सा है. जहां देश के अधिकांश माता-पिता चाहते हैं कि उनके बच्चे डॉक्टर, इंजीनियर या अफसर बनें, वहीं सालवा कल्ला गांव के मां-बाप अपने बच्चों को सिर्फ और सिर्फ फौज में भेजना चाहते हैं.
बचपन से दिल में देशभक्ति
यहां हर मां वीर सपूत को जन्म देती है और हर पिता अपने बेटे को वर्दी में देखने का सपना पालता है. इस गांव के बच्चे भारत माता की जय के नारों के बीच बड़े होते हैं और बचपन से ही उनके दिलों में देशभक्ति की लौ जलती है. यह गांव हमेशा अपने बलिदानों के लिए जाना जाता रहा है. यहां के शहीद निम्बाराम डूडी, शहीद नायक पाबुराम थोरी सिंह के नाम से गांव में शहीद स्मारक बना हुआ है. वही शहीद शिवजीराम थोरी का शहीद स्मारक नही है जबकि उन्होंने भारत की आन-बान-शान के लिए अपने प्राणों की आहुति दी. उनके बलिदान ने आने वाली पीढ़ियों को यह दिखा दिया कि देशसेवा सर्वोपरि है. गांव के बुजुर्गों का कहना है कि पांच पीढ़ियों से उनके परिवार सेना में सेवाएं दे रहे हैं. ब्रिटिश शासनकाल से लेकर आजाद हिन्द फौज एवं आजाद भारत तक, यह परंपरा लगातार चली आ रही है. दूसरे विश्व युद्ध, 1962 का चीन युद्ध, 1965 और 1971 की पाकिस्तान से जंग, कारगिल युद्ध और अब मिशन सिंदूर हर युद्ध में सालवा कल्ला गांव के सपूतों ने हिस्सा लिया और दुश्मनों को मुंहतोड़ जवाब दिया. भारत की लगभग हर एक बटालियन में यहां के जवान अपनी सेवाएं दे रहे. मिशन सिंदूर के तहत चल रही सैन्य कार्रवाई में सालवा कल्ला गांव के 300 जवान पाकिस्तान की हर हरकत का मुंहतोड़ जवाब दे रहे है. हाल ही में कुछ जवान छुट्टी पर गांव आए थे, लेकिन जैसे ही मिशन सिंदूर की शुरुआत हुई, उन्हें फिर से मोर्चे पर लौटने का आदेश मिला. बिना देर किए वे वापस सीमा की ओर रवाना हो गए. इस गांव की महिलाएं भी वीरता और त्याग की मिसाल हैं. कई बहनों के पति सीमा पर तैनात हैं. कई बेटे युद्धभूमि में हैं. गर्व के साथ-साथ उनके दिल में चिंता भी है, लेकिन वे जानती हैं कि उनका परिवार देश के लिए लड़ रहा है. वे हर दिन टीवी और अखबारों में अपने परिजनों की खबरें खोजती हैं, आंखों में उम्मीद और दिल में दुआ लेकर.
रिटायर्ड सैनिकों के भी हौसले बुलंद
गांव के रिटायर्ड सैनिकों का हौसला भी आज की युवा पीढ़ी को मात देता है. विश्व युद्ध में भाग लेने वाले पूर्व सैनिक अणदाराम गोदारा कहते हैं कि अगर सरकार कहे तो वे आज भी हथियार उठाने को तैयार हैं. उनका यही जुनून और देशभक्ति की भावना इस गांव को एक मिसाल बनाती है. सालवा कल्ला गांव सिर्फ जोधपुर जिले का नहीं बल्कि पूरे राजस्थान का गौरव है. यह गांव हमें सिखाता है कि देशसेवा क्या होती है, बलिदान का क्या अर्थ है, और भारत मां से प्रेम किसे कहते है. जब-जब देश पर संकट आया है. इस गांव ने अपने बेटों को भेजकर दुश्मनों को जवाब दिया है. आज मिशन सिंदूर में भी यही परंपरा कायम है. सच में, सालवा कल्ला गांव को ‘वीरों की धरती’ कहना गलत नहीं होगा, बल्कि गर्व का प्रतीक है.










