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Thursday, February 19, 2026, 11:42 am

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शादी और नौकरी से पहले अनिवार्य मनोवैज्ञानिक परीक्षण: एक बढ़ती सामाजिक आवश्यकता : डॉ. के. प्रियंका शर्मा

डी के पुरोहित. जोधपुर

बदलते सामाजिक परिदृश्य में युवाओं पर बढ़ते दबाव के कारण मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं में वृद्धि हो रही है, जिसके परिणामस्वरूप आत्महत्या से लेकर हिंसक अपराधों तक की घटनाएं सामने आ रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि मनोवैज्ञानिक परामर्श और मूल्यांकन अब केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि व्यक्तियों, परिवारों और भावी पीढ़ियों की सुरक्षा के लिए एक अनिवार्य आवश्यकता है।

प्रख्यात आपराधिक और फॉरेंसिक मनोवैज्ञानिक डॉ. के. प्रियंका शर्मा (यूएसए) ने विवाह से पहले मनोवैज्ञानिक परीक्षण को अनिवार्य करने की वकालत की है। उनका कहना है, “ऐसे मूल्यांकन न केवल व्यक्ति की मानसिक स्थिति को स्पष्ट करते हैं, बल्कि उनके परिवारों और समाज की सुरक्षा में भी महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं।”

युवाओं में बढ़ती मानसिक अस्थिरता
डॉ. शर्मा के अनुसार, सोशल मीडिया का अत्यधिक उपयोग और अत्यधिक प्रतिस्पर्धी जीवनशैली ने युवाओं में अधीरता और जुनूनी व्यवहार को बढ़ावा दिया है। वे अपनी इच्छाओं की तत्काल पूर्ति चाहते हैं और असफलता की स्थिति में अवसाद या आक्रामकता जैसी नकारात्मक प्रतिक्रियाएं दे सकते हैं। विवाह या करियर जैसे महत्वपूर्ण निर्णय बिना मानसिक स्पष्टता के लिए जाने पर भयावह परिणाम हो सकते हैं।

मानसिक स्वास्थ्य और अपराध का संबंध
हर अपराध के पीछे एक विशेष मानसिक अवस्था होती है, जो जन्मजात हो सकती है, बचपन के किसी आघात से उत्पन्न हो सकती है, या रिश्तों में अस्वीकृति की पीड़ा से उपज सकती है। दुर्लभ मामलों में, मानसिक प्रवृत्ति आनुवंशिक भी हो सकती है। डॉ. शर्मा का कहना है कि समय रहते व्यक्ति की मानसिक स्थिति का मूल्यांकन हो जाए तो कई संभावित अपराधों को रोका जा सकता है।

एक दुखद उदाहरण

2009 में जोधपुर में हुई एक घटना इसकी गंभीरता को दर्शाती है। एक युवती, जो मनोवैज्ञानिक विकार से पीड़ित थी, ने शादी के तीन साल बाद आत्महत्या कर ली। उसके पति को इस बीमारी की जानकारी नहीं थी, क्योंकि युवती के परिवार ने इसे छिपाया था। इस त्रासदी ने न केवल परिवार को तोड़ा, बल्कि उन्हें सामाजिक बदनामी और कानूनी कार्यवाही का सामना भी करना पड़ा। यह घटना दर्शाती है कि मानसिक स्वास्थ्य को छिपाने के कितने गंभीर परिणाम हो सकते हैं।

समाज में संवेदनशीलता और जागरूकता की आवश्यकता

समाज को मानसिक स्वास्थ्य के प्रति कलंक को त्यागना होगा और मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन को जिम्मेदारी और सतर्कता का हिस्सा मानना होगा। माता-पिता को चाहिए कि वे बच्चों पर विवाह या करियर के लिए अनावश्यक दबाव न डालें, बल्कि उनकी मानसिक स्थिति को समझकर ही निर्णय लेने में सहयोग करें।

संभावित समाधान

इस बढ़ती समस्या से निपटने के लिए निम्नलिखित उपाय सुझाए गए हैं:
– विवाह से पहले मूल्यांकन : सभी भावी दूल्हा-दुल्हनों के लिए क्लिनिकल मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन अनिवार्य हो।
– नौकरी से पहले जांच: कर्मचारियों की नियुक्ति से पहले मानसिक स्वास्थ्य परीक्षण अनिवार्य किया जाए।
– शैक्षिक पहल: स्कूलों और कॉलेजों में मानसिक health जागरूकता कार्यक्रम अनिवार्य हों।
– पारिवारिक सहयोग : परिवार और दोस्तों को मानसिक समस्याओं को छिपाने के बजाय परामर्श और उपचार के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए।

डॉ. शर्मा ने जोर देकर कहा, “मानसिक स्वास्थ्य के प्रति एक छोटी सी पहल किसी की जान बचा सकती है। यदि कोई अपनी परेशानी साझा नहीं कर पा रहा, तो परिवार और समाज को आगे आकर मदद करनी होगी। मनोवैज्ञानिक परीक्षण कोई शर्म की बात नहीं, बल्कि एक सामाजिक जिम्मेदारी है।”

जैसे-जैसे मानसिक स्वास्थ्य चुनौतियां बढ़ रही हैं, इन उपायों को अपनाकर एक स्वस्थ, सुरक्षित और संवेदनशील समाज की नींव रखी जा सकती है।

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor