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Friday, April 17, 2026, 11:41 am

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सड़कों पर नहीं शरीर में बहे खून : करण सिंह राठौड़

(समाज के कर्णधार और रियल हीरो की कहानी हम आपके सामने काल्पनिक रूप में ला रहे हैं। आपको यह फील करवाने के लिए कि आप किसी ऑडिटोरियम में फिल्म देख रहे हैं। यह एक कल्पना जरूर है, मगर इस कहानी का पात्र काल्पनिक नहीं हैं। केवल स्थान और प्रस्तुतिकरण का तरीका काल्पनिक हैं। राइजिंग भास्कर का प्रयास रहता है कि स्टोरी को अपने अनूठे और नए अंदाज में पाठकों के सामने पेश करना। तो इस बार हम आपके और हमारे बीच पिछले तीन दशक से अधिक समय से रक्तदान से लेकर विभिन्न क्षेत्रों में समाजसेवा की मिसाल बनकर उभरे बाबा रामदेव समाज सेवा संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष करण सिंह राठौड़ के जज्बे की कहानी यानी इंटरव्यू को नाटक की स्क्रिप्ट के रूप में आपके सम्मुख रख रहे हैं। इससे मूल कहानी और तथ्यों पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा।)

दिलीप कुमार पुरोहित. जोधपुर 

8302316074 diliprakhai@gmail.com

इंटरव्यू में मैं तीन चीज़ों का खास ध्यान रखा गया है —

  1. लाइव स्टेज जैसा फील — इंटरव्यूअर और राठौड़ के बीच बातचीत, दर्शकों की प्रतिक्रियाएं, हंसी, तालियां।

  2. फ्लैशबैक दृश्य — उनकी बचपन से लेकर आज तक की यात्रा को बीच-बीच में फ़िल्मी अंदाज में दिखाना।

  3. भावनात्मक और प्रेरणादायक क्लाइमेक्स — ताकि पाठक अंत में भावुक और ऊर्जावान महसूस करे।

लाइव इंटरव्यू — “रक्त का महादानी: करणसिंह राठौड़”

(दृश्य शुरू होता है — एक भरे हुए ऑडिटोरियम में, मंच पर लाल शर्ट और ब्लैक कोट, पचरंगी साफा, चेहरे पर राजस्थानी तिलक और चश्मा लगा हुआ बैठे हैं करण सिंह राठौड़…।  उनके सामने लगी कुर्सी में मैं यानी राइजिंग भास्कर के ग्रुप एडिटर दिलीप कुमार पुरोहित बैठे हैं। आंखों में चमक और चेहरे पर वही संतोष भरी मुस्कान लिए करणसिंह राठौड़। दर्शक दीर्घा में सैकड़ों लोग, कुछ कॉलेज के छात्र, कुछ समाजसेवक, कुछ रक्तदाता। स्पॉटलाइट दोनों पर पड़ती है। तालियों की गड़गड़ाहट के बीच इंटरव्यू शुरू होता है।)

मैं (मुस्कुराते हुए) : “दोस्तों, आज हमारे बीच वो शख्स मौजूद हैं, जिन्होंने रक्तदान को सिर्फ एक सेवा नहीं, बल्कि एक जन आंदोलन का रूप दिया है। एक लाख से ज्यादा सदस्य, हजारों रक्तदान शिविर, लाखों ज़िंदगियां बचाना — और यह सब बिना किसी स्वार्थ के। मारवाड़ के इस लाल का नाम है… करणसिंह राठौड़!

(तालियों और सीटी की आवाज़ें गूंज उठती हैं। करणसिंह हल्के से हाथ जोड़ते हैं, मुस्कुराते हैं।)

मैं: “राठौड़ साहब, स्वागत है आपका। सबसे पहला सवाल — अगर मैं कहूं कि आपकी ज़िंदगी एक फिल्म है, तो उसका नाम क्या होगा?”

राठौड़ (हंसते हुए) : “नाम…? शायद ‘चार दिन की ज़िंदगानी, चार दिन की जवानी’… लेकिन कहानी पूरी जिंदगी की होगी।”
(दर्शक हंसते हैं, तालियां बजती हैं।)

फ्लैशबैक 1 — बचपन और परंपरा

(रोशनी थोड़ी धीमी होती है, स्क्रीन पर गांव ऊदट की तस्वीर उभरती है — रेत के टीलों के बीच बसा एक छोटा सा गांव, हवा में ऊंट की घंटियों की आवाज़।)

राठौड़ की आवाज़ बैकग्राउंड में:
“मैं ऊदट गांव में जन्मा, राठौड़ यानी राजपूत परिवार में। हमारे यहां पीढ़ियों से एक परंपरा रही — सबसे छोटा बेटा कुंआरा रहकर सेवा करता है और घर में नहीं रहता।”

(दृश्य में एक किशोर करणसिंह, पैरों में धूल, आंखों में जिद, हाथ में बाबा रामदेव की तस्वीर लिए घर से निकल रहा है।)

राठौड़: “दशकों पहले, मैंने भी अपना घर छोड़ दिया। पढ़ाई ज्यादा नहीं हुई थी… बारहवीं तक ही। लेकिन दिल में एक ही बात ठान ली थी — सेवा ही मेरा धर्म होगा।”

मैं : “मतलब, बहुत कम उम्र में आपने अपना रास्ता चुन लिया था?”

राठौड़ : “हां, और वो रास्ता आसान नहीं था। जोधपुर आया तो छोटे-मोटे काम किए। जेब खाली रहती थी, लेकिन दिल भरा रहता था… सेवा के सपनों से।”

फ्लैशबैक 2 — बाबा रामदेव से आस्था

(स्क्रीन पर रामदेवरा का मेला, रंग-बिरंगे झंडे, ढोल-नगाड़ों की आवाज़।)

राठौड़: “मेरी आस्था बाबा रामदेव में गहरी है। वो मेरे गुरु हैं। साल में दो बार पैदल रामदेवरा जाता हूं… अब तक 31 बार जा चुका हूं।”

(दृश्य में तपती धूप, नंगे पैर चलते श्रद्धालु, बीच में पसीने से भीगे करणसिंह, होंठों पर रामदेव बाबा का भजन।)

मैं: “और यहीं से 7 फरवरी 2007 को आपका सफर शुरू हुआ…”

राठौड़ (गर्व से): “हां, उस दिन मैंने बाबा रामदेव समाज सेवा संस्थान की स्थापना की। शुरुआत सिर्फ रक्तदान के संकल्प से हुई थी।”

फ्लैशबैक 3 — पहला रक्तदान शिविर

(स्क्रीन पर उम्मेद अस्पताल का दृश्य — भीड़, डॉक्टर, कतार में खड़े लोग।)

राठौड़: “8 अगस्त 2007… पहला रक्तदान शिविर किया। 145 यूनिट रक्त एक दिन में। तभी समझ गया कि अगर लोग साथ आ जाएं तो कोई भी लक्ष्य असंभव नहीं।”

मैं: “उसके बाद तो जैसे रिकॉर्ड्स टूटते गए?”

राठौड़ (हंसते हुए) : “हाँ… 2015 में 30 दिन में 30 शिविर, 2016 में 60 दिन में 60, 2017 में 100 दिन में 100, और 2018 में… 365 दिन में 365 शिविर।”

(दर्शक जोरदार तालियां बजाते हैं। स्क्रीन पर इन सालों के शिविरों की असली तस्वीरें चलती हैं — लोगों के मुस्कुराते चेहरे, रक्तदान करते युवा, मरीजों की आंखों में आंसू।)

भजन संध्या और पुरस्कार

(दृश्य बदलता है — रात का रावण का चबूतरा मैदान, हजारों लोग, मंच पर भजन मंडली, करणसिंह माइक पर।)

राठौड़: “32 साल से हर साल ‘एक शाम बाबा रामदेव के नाम’ कर रहा हूं। और 2011 से हमने 21 क्षेत्रों में बाबा रामदेव पुरस्कार देना शुरू किया — शिक्षा, कला, साहित्य, पत्रकारिता, कृषि, समाज सेवा… हर उस इंसान को जो अपने काम से समाज को रोशनी देता है।”

मैं: “भादवा के मेले में आपकी सेवा भी अलग ही होती है…”

राठौड़: “हाँ, दो महीने तक सेवा — भंडारा, मेडिकल, भजन संध्या। 500 लोगों की टीम के साथ। बाबा के जातरुओं को लगता है कि उनका घर यहीं है।”

नशा मुक्ति और वानर सेवा

(स्क्रीन पर गांव-गांव भजन संध्या, लोग हाथ जोड़कर कसम खाते हुए कि नशा छोड़ देंगे।)

राठौड़: “मैंने 365 दिन भजन संध्या करके 8 हजार से ज्यादा लोगों का नशा छुड़वाया। और रोज़ दो घंटे वानरों को फल खिलाता हूं। सेवा सिर्फ इंसानों की नहीं, प्राणी मात्र की होनी चाहिए।”

मैं: “2019 में आपकी ट्रेन वाली मुहिम भी यादगार रही…”

राठौड़ (हंसते हुए) : “हाँ, जोधपुर-Delhi इंटरसिटी का नाम बदलवाकर ‘रुणीचा एक्सप्रेस’ करवा दिया। नाम में भी आस्था होनी चाहिए।”

सरकारी अस्पताल और रक्त जांच

(दृश्य में अस्पताल के बाहर लंबी लाइन, मरीजों के चेहरे पर राहत।)

राठौड़ : “2013 में मैंने निशुल्क रक्त जांच की मुहिम शुरू की। सरकारी अस्पतालों में ये सुविधा शुरू हो गई… हजारों गरीब मरीजों को राहत मिली।”

मैं: “राठौड़ साहब, आप ये सब करते कैसे हैं? थकते नहीं?”

राठौड़ (गंभीर होकर): “थकान तब लगती है जब इंसान अपने लिए जीता है। जब दूसरों के लिए जीते हो, तो हर दिन नई ऊर्जा मिलती है।”
(तालियों की आवाज़)

मैं: “अगर आज कोई युवा आपको सुन रहा है, तो आप उसे क्या कहेंगे?”

राठौड़ (आंखों में चमक) : “युवाओं से बस एक बात — रक्त का कोई विकल्प नहीं है। आपकी एक बूंद किसी की सांसें लौटा सकती है। पढ़ाई करो, मेहनत करो, लेकिन जीवन में एक जगह सेवा के लिए छोड़ो। यही असली कमाई है।”

क्लाइमेक्स — भावनाओं का विस्फोट

(ऑडिटोरियम में सन्नाटा। राठौड़ की आवाज़ धीमी, लेकिन दिल में उतर जाने वाली।)

राठौड़: “जीवन का असली आनंद… दूसरों के जीवन में खुशियां भरने में है। जब तक सांस है, रक्तदान और समाज सेवा का सफर जारी रहेगा।”

(स्क्रीन पर उन मरीजों की तस्वीरें — जो अब स्वस्थ हैं, बच्चों की मुस्कान, बुजुर्गों के आशीर्वाद। बैकग्राउंड में भजन ‘रामसा पीर’ धीरे-धीरे बजने लगता है। दर्शकों की आंखें नम, तालियों की गूंज पूरे हॉल में। करणसिंह राठौड़ हाथ जोड़कर खड़े हैं।)

मैं (मुस्कुराकर) : “दोस्तों, आज हमने सिर्फ एक समाजसेवक की कहानी नहीं सुनी… आज हमने जाना कि इंसान की असली पहचान उसके काम से होती है। और करणसिंह राठौड़ — ये नाम अब सिर्फ एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक आंदोलन है।”

(स्पॉटलाइट धीरे-धीरे फीकी पड़ती है, पर्दा गिरता है, और हॉल तालियों से गूंजता रहता है।)

 

 

 

 

 

 

 

 

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor