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Sunday, March 15, 2026, 2:09 pm

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“ठाठ से तपस्या तक : अनीता मेहता की अद्भुत जीवन गाथा”…समाजसेवा, शिक्षा और संस्कार का दीपक जला फैलाया उजास

मैं हार नहीं सकती…ये शब्द अनीता मेहता के लिए ही बने हैं…संस्कृति फाउंडेशन की संस्थापक अध्यक्ष का जीवन कई करवट लेते हुए उस मुकाम पर पहुंच गया है जहां वह समाजसेवा को जीने का मकसद बना चुकी हैं…संपन्न परिवार से होते हुए भी शिक्षाविद बनने की यात्रा और अब प्रखर समाजसेवी…। प्रस्तुत है लाइव रिपोर्ट 

दिलीप कुमार पुरोहित. राखी पुरोहित. जोधपुर

9783414079 diliprakhai@gmail.com

सूर्यदेव अस्ताचल की ओर चल पड़े थे। नीला और सिंदूरी आसमान हल्के बादलों से घिरा था। एक दिन पहले हुई बारिश के निशां सड़कों पर रैंग रहे थे। राइजिंग भास्कर के ग्रुप एडिटर दिलीप कुमार पुरोहित और एडिटर इन चीफ राखी पुरोहित शुभम अस्पताल के करीब से होते हुए अनीता मेहता के आवास पर पहुंचते हैं। अनीता मेहता ड्राइंग रूम में हमारा स्वागत करती हैं। घर ढूंढ़ने में परेशानी तो नहीं हुई? अनीताजी पूछती हैं। जी, बिल्कुल नहीं। जोधपुर के मौसम और बारिश की चर्चा के बाद सिलसिला शुरू हुआ तो चलता ही रहा। अनीता मेहता की कहानी एक ऐसी महिला की कहानी है जो बताती है कि  – “सपनों की कोई सीमा नहीं होती”। यह कहानी है एक ऐसी महिला की, जिसने ठाठ-बाट से भरी जिंदगी को छोड़कर समाज सेवा, शिक्षा और संस्कार का दीपक जलाया।

एक साधारण-सी मुस्कान और आंखों में चमक लिए, वह अपनी ज़िंदगी को याद करती हैं। उनके शब्दों में कभी दर्द छलक पड़ता है, तो कभी गर्व। यह कहानी सिर्फ एक महिला की नहीं, बल्कि उस हर नारी की है जो साबित करना चाहती है कि अगर ठान लो तो कोई भी सपना अधूरा नहीं रहता।

पहला अध्याय : ठाठ-बाट की जिंदगी

अनीता मेहता का जन्म एक ऐसे घर में हुआ, जहां हर सुख-सुविधा मौजूद थीं। उनके पिताजी सज्जन सिंह कोठारी, राजस्थान राज्य विद्युत विभाग में एडिशनल चीफ इंजीनियर थे। घर में शानो-शौकत थी, सम्पन्न परिवार था, अनीता नाज़ों से पली-बढ़ी, जहां हर ख्वाहिश पूरी हो जाती थी।

1981 में उनकी शादी जितेंद्रमल मेहता से हुई। जितेंद्रमल पीडब्ल्यूडी में एईएन थे और चीफ इंजीनियर सेक्रेटरी पद से रिटायर हुए। शादी के बाद भी वही ठाठ, वही वैभव। ससुराल में किसी चीज़ की कोई कमी नहीं थी। अनीता के दिन शाही अंदाज़ में गुजरते थे।

दूसरा अध्याय : ऐसे बदल गया नजरिया

साल 1994। एक सुबह। दरवाज़े पर दस्तक हुई। एक व्यक्ति आया और जितेंद्रमल से विनती की –
“साहब, मेरी पत्नी को बादलचंद सुगनकंवर चौरड़िया बालिका स्कूल में नौकरी दिला दीजिए।”

जब अनीता ने अपने पति से पूछा – “कौन था ये?”
जवाब मिला – “कोई चाहता है कि उसकी पत्नी को स्कूल में टीचर की नौकरी दिला दूँ।”

यह सुनकर अनीता के दिल में तूफ़ान उठ गया। उन्होंने कहा –
“आप दूसरों को नौकरी दिला रहे हो, मुझे ही क्यों नहीं?”

जितेंद्रमल ने समझाया –
“तुम्हें क्या कमी है? सारी सुख-सुविधाएं हैं। अनीता ने कहा कि मैं बाहर की दुनिया को देखना चाहती हूं। अनीता ने आवेदन किया। रिटर्न टेस्ट दिया। इंटरव्यू दिया। और चुन ली गईं। जब वेतन पूछा गया, तो उन्होंने कहा –
“मुझे पैसों से मतलब नहीं, मुझे तो बस काम करना है।”

शुरुआती वेतन था – 2000 रुपये महीना।

यह साल था 1994। उसी समय उनका बेटा चौथी कक्षा और बेटी दूसरी कक्षा में पढ़ते थे। छोटे बच्चों की जिम्मेदारी, घर के काम और नौकरी – सब एक साथ। सुबह बच्चों का टिफिन बनाना, उन्हें तैयार करना, घर समेटना और फिर स्कूल पहुंचना। धीरे-धीरे अनीता ने अपना रूटीन बना लिया। वह अब अच्छी मां, अच्छी पत्नी और अच्छी टीचर – तीनों भूमिकाओं को निभा रही थीं। अनीता के पति जितेंद्रमल मेहता का पूरा सपोर्ट मिलता। उन्होंने कहा कि यह टीचर की नौकरी तुम्हारे लिए सीखने-सिखाने का जरिया है। घर में सभी सुविधाएं पहले की तरह मौजूद थीं। अनीता को कोई कमी नहीं थी। जितेंद्रमल मेहता ने अपने पति होने का फर्ज पूरी तरह निभाया और अनीता को हर मोर्चे पर सपोर्ट किया। गृहस्थी की गाड़ी मिलजुलकर चलती रही। किसी प्रकार की कोई आर्थिक कमी नहीं थी, शिक्षिका की नौकरी अनीता ने अपनी रुचि से करना स्वीकार किया। जितेंद्रमल मेहता की ओर से कभी कोई परेशानी नहीं हुई और ना ही उन्होंने कोई परेशानी आने दी।

तीसरा अध्याय : बदलाव की पहली लहर

स्कूल ने उन्हें एक नई दुनिया दिखाई। यहा बच्चे मध्यमवर्गीय परिवारों से आते थे। बालिकाएं घर का काम करके स्कूल आतीं। उन्हें टिफिन नहीं मिलता। दूध तो सपना ही था। लैंगिक असमानता भी देखने को मिलती थी।

अनीता ने पैरेंट्स को समझाना शुरू किया। बच्चों को प्रेरित किया। उन्हें नेत्रहीन संस्थान ले गईं और दिखाया कि कैसे दृष्टिहीन बच्चे भी कंप्यूटर सीख रहे हैं। इससे बच्चों के अंदर हौसला आया।

निबंध, नृत्य, संगीत – हर गतिविधि में बच्चों को आगे बढ़ाया। ज़िले और राज्य स्तर पर बच्चों ने पुरस्कार जीते। और अनीता अपने खर्च से उन्हें छोटे-छोटे उपहार देतीं।

चौथा अध्याय : सीखने की कोई उम्र नहीं होती

अनीता जब नौकरी में आईं, तब उनके पास सिर्फ एमए (इतिहास) की डिग्री थी। मगर उन्होंने ठान लिया कि पढ़ाई जारी रखनी है। शादीशुदा महिला के लिए पढ़ाई करना आसान नहीं था, मगर अनीता ने ये डिग्रियां भी हासिल कीं। घर में पति का पग-पग पर सपोर्ट मिला। उनके सहयोग और साथ के बगैर अनीता का आगे बढ़ना संभव नहीं था। अनीता ने निम्न डिग्रियां शादी के बाद प्राप्त की।

बीएड (रोहतक से)

एमएड (हिमाचल से)

एमफिल (जोधपुर से)

एमफिल के दौरान परिणाम तकनीकी कारण से होल्ड हो गया। लेकिन जब रिज़ल्ट आया, तो वह फर्स्ट डिवीज़न से पास हुईं। घर में गर्व की लहर दौड़ गई। इतना ही नहीं, उन्होंने प्रयाग समिति से संगीत में विसारद भी किया।

पांचवां अध्याय : समाजसेवा की ओर कदम

2002 में अनीता ने करुणा इंटरनेशनल क्लब की स्थापना की। और 2002 से 2012 तक हर साल उन्हें बेस्ट टीचर अवार्ड मिला।

2013 में उन्होंने संस्कृति फाउंडेशन की नींव रखी। इसका पंजीयन 2023 में करवाया।

यह फाउंडेशन काम करता है –

पर्यावरण संरक्षण (जागरूकता रैली, पौधारोपण, प्रतियोगिताएं)

स्वास्थ्य (नेत्र चिकित्सा शिविर, निशुल्क लेंस प्रत्यारोपण, दिव्यांगों को उपकरण)

महिला एवं बालिका सशक्तिकरण (रोजगार, अधिकार, योजनाओं की जानकारी)

शिक्षा (छात्रवृत्ति, मुफ्त पुस्तकें)

पशु सेवा (सड़क के कुत्ते, गाय, बिल्ली, घायल पक्षी – सबका इलाज व भोजन)।

कोरोना काल में यह काम ज़ोरों पर रहा। मेनका गांधी इस अभियान की मेंटर बनीं।

छठा अध्याय : उपलब्धियां और पहचान

अनीता ने अपनी मेहनत से कई सम्मान पाए –

1- गांधी शांति पीस फाउंडेशन, नेपाल द्वारा सम्मानित किया ।
2- वीर दुर्गादास अवार्ड पूर्व नरेश गज सिंह द्वारा महिला सशक्तिकरण और बालिका शिक्षा के उल्लेखनीय योगदान पर दिया।
3-आचार्य करुणा हस्ती अवार्ड, चेन्नई द्वारा 25,000₹ का चेक एवं प्रशस्ति पत्र से समाज के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान पर दिया गया।

4 अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इंडो नेपाल समरसता आर्गेनाइजेशन की ओर से अवार्ड दिया गया।

5- नारी शिरोमणि महिला सम्मान से नई दिल्ली में सम्मानित किया गया।
6- 2007 नेपाल में समाजसेविका समान से सम्मानित किया गया। ।

7- 2013 लॉयंस क्लब्स इंटरनेशनल के द्वारा समाज सेविका सदस्य वृद्धि पर इंटरनेशनल पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
8-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर USA हार्वर्ड रिकॉर्ड्स पर भी पुरस्कृत किया गया।

9. जीव कल्याण के क्षेत्र पर अखिल भारतीय स्तर पर संस्थान को बनाकर पशु के आहार व दवाई का प्रबंध करना। विशेष उपलब्धि हासिल की इसी को देखते हुए हार्डवर्ड से सम्मानित किया गया।
10- गांधी दर्शन एवं गांधी के विचार स्वरोजगार हस्त कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहित देना एवं उसके क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य के आधार पर गांधी शांति फाउंडेशन के द्वारा ऑनरेरी डॉक्टर की उपाधि से सम्मानित किया गया। यह विशेष उपलब्धि प्राप्त हुई।

11. स्कूल की पत्रिका “संस्कार” का विमोचन भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने किया।

उन्होंने अब तक 12 शोध पत्र लिखे, ऑपरेशन सिंदूर का संपादन किया और लगातार समाज में बदलाव की अलख जगाई।

सातवां अध्याय : बुरा दौर

जिंदगी हमेशा आसान नहीं रही। स्कूल में नौकरी के दौरान ही उनकी हार्ट की सर्जरी हुई। उसी समय उनके पति की भी हार्ट सर्जरी हुई। यह सबसे कठिन दौर था।

अनीता कहती हैं –
“वो दिन याद आते हैं तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं। घर में दो-दो मरीज। ज़िम्मेदारी का बोझ। मगर हिम्मत नहीं हारी।” सबसे बड़ा आघात 2024 में आया, जब उनके पति जितेंद्रमल मेहता का निधन हो गया। अनीता खुद बीमार थीं, मगर अपने आपको संभाला। आज भी उन पलों को याद कर उनकी आंखें भर आती हैं। पर बुरे दौर में बेटा-बेटी ने संभाला और आज भी उनके सपोर्ट से समाजसेवा में संलग्न हैं।

आठवां अध्याय : नई पीढ़ी की उड़ान

अनीता के बेटे राहुल मेहता बेंगलुरु में आईटी कंपनी में कंप्यूटर इंजीनियर हैं।
बेटी मयूरी, विदेश में इलेक्ट्रॉनिकल इंजीनियर। मां के संघर्ष ने बच्चों को उड़ान दी। यही उनके जीवन की सबसे बड़ी पूंजी है। माता-पिता पर जब संकट आया तो बेटा-बेटी उनकी सेवा को तत्पर रहे। बेटा-बेटी पूरी तरह माता-पिता को समर्पित रहे और आज भी मां अनीता का वे पूरा ख्याल रखते हैं।

नौंवां अध्याय : सीखने की कोई उम्र नहीं होती, ना ही कोई सीमा

अनीता आज भी कहती हैं –
“आदमी मरते दम तक सीखता रहता है। सीखने की ना कोई उम्र होती है, ना कोई सीमा। यह सतत प्रक्रिया है।” अनीता का मानना है कि शिक्षित व्यक्ति विनम्र, समझदार होते हैं। उनका नजरिया पॉजिटिव होता है। वे हर चीज को सकारात्मक ढंग से देखते हैं। वे समाज में ज्ञान बांटते हैं और निगेटिविटी से दूर रहते हैं। अनीता का मानना है कि आदमी मरते दम तक सीखता रहता है। सीखने की ना कोई उम्र होती है और ना ही सीखने का कोई दायरा होता है। यह सतत प्रक्रिया है।

संस्कृति फाउंडेशन और समाजसेवा का काम उन्हें संतुष्टि देता है। मगर उनके चेहरे की मुस्कान कहती है –
“सपनों की प्यास कभी खत्म नहीं होती।”

अनीता, एक जीती-जागती प्रेरणा

जोधपुर के बंगले से लेकर स्कूल की चारदीवारी और फिर समाज सेवा तक – अनीता मेहता की यात्रा किसी फिल्म से कम नहीं।

यह कहानी है एक नारी की, जिसने पति के तानों को प्रेरणा बनाया, समाज की कड़वी हकीकत को बदलने का संकल्प लिया और अपने ठाठ को छोड़कर तपस्या का मार्ग चुना।

आज अनीता मेहता सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि संघर्ष, शिक्षा, सेवा और संवेदना का प्रतीक हैं।

अनीता मेहता इन संस्थाओं से भी जुड़ी हैं-

1- अनीता मेहता संस्कृति फाऊंडेशन की डायरेक्टर हैं।
2- महावीर विकलांग समिति की जोधपुर की संबल प्रकोष्ठ की उपाध्यक्ष।
3- रोटरी क्लब की project डायरेक्टर।
4- जायंट्स ग्रुप की चार्टर प्रेसिडेंट।
5- दी एसोसिएशन ऑफ वी क्लब्स ऑफ़ इंडिया क323, Association secretary
6- animal voluntary organisation संस्था की डायरेक्टर।
7-अपनी लेखनी से ऐतिहासिक धार्मिक ऐतिहासिक और नारी शक्ति पर कई लेख लिखती है और राजस्थान दर्शन पत्रिका में महिला डेस्क की संपादक।
8- सच इंडिया में सह संपादक, एफजेआई की सदस्य। उदयपुर की संस्था फोस्टर की ब्रांड एंबेसेडर।
9- जागृति पत्रिका मे सह संपादक। 10. जिला वैश्य संगठन की सदस्य। 11. संबोधी धाम संस्थान की सदस्य।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अनीता की पहचान, संस्कृति फाउंडेशन के कार्य

-अनीता की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान है।  डॉ. ललित नारायण आमेटा राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं मुख्य सचिव नेशनल यूथ पार्लियामेंट ऑफ द भारत द्वारा प्रशंसा मिल चुकी है। जोधपुर निवासी अनीता मेहता एक शिक्षाविद एवं समाजसेविका है, MA M,ED MPHIL कर अपना कैरियर में समाज उत्कृष्ट कार्य एवं श्रेष्ठ योगदान दिया। कई सामाजिक संस्थाओं से जुड़कर तीन सौ प्रशस्ति पत्र तथा 700 से भी अधिक स्मृति चिन्ह उल्लेखनीय कार्य के आधार पर संस्थाओं द्वारा समय-समय पर राज्य स्तर, जिला स्तर, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्राप्त हुआ है।

-जैन फेडरेशन पुणे और फेडरेशन और एजुकेशन इंस्टीट्यूट राजस्थान की सदस्य हैं। राज्य सरकार व केंद्र सरकार के आदेशों का पालन करते हुए विभिन्न संस्थाओं से जुड़कर जोधपुर के ग्रामीण क्षेत्रों में महिला उत्थान के लिए अधिकारों, सरकारी योजनाओं, स्वरोजगार की बारे में जानकारी देना एवं मदद करना, ग्रामीण क्षेत्र मे स्वास्थ्य संबंधी पर्यावरण संबंधी, स्वच्छता संबंधी जानकारी दी जाती है।

-खादी ग्रामोद्योग की प्रदेश सचिव होने के नाते ग्रामीण क्षेत्र में उद्योग धंधे हस्तशिल्प बुनकर को बहुत अधिक प्रोत्साहित करना, कोरोनाकाल मे वर्चुअल बेसिस पर मार्केट प्रोवाइड करने का कार्य युद्ध स्तर पर किया।

-2017 से बुनकर दिवस मनाकर समाज में एक नई मिसाल दी। गांधी दर्शन में विश्वास, स्वराज व हस्तनिर्मित एवं हथकरघा निर्मित वस्तुओं को प्रोत्साहित करने में भूमिका ।

-महिला सशक्तिकरण के लिए महिलाओं को रोजगार से जोड़ने का कार्य निरंतर चल रहा है। दिव्यांगों के लिए भी ट्राई साइकिल के लिए मदद करना और कैंप में अपनी सहभागिता निरंतर चलती रहती है। गांवों में पर्यावरण के क्षेत्र में, स्वास्थ्य के क्षेत्र में विशेष रूप से कार्य किया जा रहा है। गांव में नेत्र परीक्षण व लैंस प्रत्यारोपण शिविर एवं स्वास्थ्य शिविर, डेंटल चेकअप शिविर एवं दिव्यांगों के प्रमाण पत्र बनवाना इसके साथ-साथ एक्यूपंक्चर कैंप भी लगाए गए, जिससे कि सभी लोगों को समय-समय सहायता प्राप्त हो सकें।

-होम्योपैथिक कैंप लगाए। महिलाओं, बच्चों, बुजुर्गों को लाभ पहुंचाया। महिला रोजगार के क्षेत्र में तो लगभग 4000 महिलाओं को फायदा हुआ है और विशेष रूप से जोधपुर के एक गांव सालावास की महिलाओं को जो कि बुनकर महिलाएं हैं हस्तकरघा के कार्य में दक्ष है। ऐसी महिलाओं को जूम पर कोरोना के समय पर आर्थिक लाभ पहुंचाया। कोरोनाकाल में आयुर्वेदिक काढ़ा बनाकर भी दिया गया। काढा निशुल्क रूप से गांव में पिलाया गया।

-400 बुनकर महिलाएं जुड़ी हुई हैं जिन्हें समय-समय पर आर्थिक सहयोग और साथ ही साथ सरकारी योजनाओं का लाभ उन तक पहुंचाने का कार्य कर रहे हैं। कुछ ऐसे गांव के बुनकर आर्टिशन है जो की दरियां बनाते हैं दरिया बनाने में बहुत ही दक्ष हैं। ऐसे परिवार में तीन सदस्य हैं जो इस प्रकार का कार्य कर रहे हैं उनका समय-समय पर प्रदेश में अमृत हाट बाजार की प्रदर्शनियों में उनका प्रदर्शन व बिक्री करने में सहयोग देते हैं।

-बुनकर महिलाओं को अपने एनजीओ में मिलाकर उनकी कला को प्रोत्साहित किया जैसे कसीदा बनाई, जूतियां बनाना एवं सिलाई करना, ब्यूटी पार्लर का काम करना एवं हस्त निर्मित घरेलू सामान बनाना आदि काम के लिए प्रशिक्षण भी दिया जाता है। प्रदर्शनी के दौरान फ्री में जगह उनको दिलवाई जाती है जिससे कि वह अपना रोजगार आसानी से प्राप्त कर सकें। हाथ से निर्मित चीजों का ज्यादा से ज्यादा प्रयोग करें। इस उद्देश्य से  स्वरोजगार को हमने जोड़कर आगे कार्य किया । इसी कार्य के आधार पर कोविड के समय राज्य, जिला स्तर पर कई पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor