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Sunday, October 18, 2026, 8:26 am

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दैनिक भास्कर और अडाणी ग्रुप का ‘22 भाषाओं’ वाला सपना: भारतीय मीडिया के इतिहास की सबसे बड़ी क्रांति?

कपिल भटनागर. गांधी नगर

भारतीय मीडिया जगत में इन दिनों एक नई हलचल है। चर्चा है कि अगर सबकुछ ठीक रहा तो अडाणी ग्रुप और दैनिक भास्कर समूह मिलकर आने वाले वर्षों में वह काम कर सकते हैं, जो अब तक किसी भी मीडिया हाउस ने नहीं किया। योजना है — भारत के संविधान की मान्यता प्राप्त 22 भाषाओं में दैनिक भास्कर का एक साथ प्रकाशन।
यानी कल्पना कीजिए, हिंदी, मराठी या गुजराती ही नहीं बल्कि असमिया, कश्मीरी, संथाली, बोडो और संस्कृत जैसी भाषाओं में भी भास्कर का पेपर देशभर के घरों में पहुंचे।

यह कदम सिर्फ भारत के मीडिया इतिहास का नया अध्याय नहीं खोलेगा बल्कि विश्व स्तर पर भी एक अनोखा रिकॉर्ड बन सकता है। अनुमान है कि अगर योजना पूरी तरह अमल में लाई गई तो अगले 10 वर्षों में 90 करोड़ से अधिक पाठक भास्कर से जुड़ सकते हैं।

अडाणी का विज़न और मीडिया पर फोकस

अडाणी ग्रुप के चेयरमैन गौतम अडाणी ने इस प्रस्ताव को लेकर मीडिया से बातचीत में साफ कहा है:

“हमारा प्लान है कि दैनिक भास्कर देश के संविधान से मान्यता प्राप्त 22 भाषाओं में एक साथ निकले। आर्थिक रूप से कोई समस्या नहीं है। यह अब तक किसी मीडिया हाउस ने नहीं किया और यह भारत को विश्व स्तर पर मीडिया पावर हाउस बनाने की दिशा में सबसे बड़ा कदम साबित होगा।”

अडाणी ग्रुप पहले ही ऊर्जा, बंदरगाह, खनन, एविएशन और डेटा सेंटर जैसे क्षेत्रों में मजबूत मौजूदगी रखता है। हाल ही में ग्रुप ने मीडिया सेक्टर में भी बड़ा निवेश किया है। अब इस साझेदारी से साफ है कि अडाणी मीडिया को अपने बिजनेस इकोसिस्टम का अहम हिस्सा बनाना चाहते हैं।

भास्कर का मौजूदा स्वरूप

आज की तारीख में दैनिक भास्कर तीन भाषाओं में प्रकाशित होता है —

  • हिंदी (देश का सबसे बड़ा संस्करण, 11 से ज्यादा राज्यों में सर्कुलेशन)

  • गुजराती (दिव्य भास्कर)

  • मराठी (दिव्य मराठी)

इन भाषाओं में भास्कर की मिलियन कॉपियाँ रोज़ाना छपती हैं और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर करोड़ों यूजर्स जुड़े हुए हैं। ऐसे में अगर भास्कर 22 भाषाओं में उतरता है, तो यह उसकी मौजूदा ताकत का तीन गुना विस्तार होगा।

क्यों है यह योजना ‘गेमचेंजर’?

  1. पाठक आधार का विस्फोटक विस्तार
    भारत की जनगणना 2011 के अनुसार, देश में 22 संवैधानिक भाषाएं लगभग 95% जनसंख्या की मातृभाषा हैं। यानी भास्कर सीधे हर भारतीय घर की भाषा में पहुंचेगा।

  2. रीजनल अख़बारों की चुनौती
    अब तक क्षेत्रीय मीडिया समूह अपने-अपने इलाकों में मजबूत पकड़ रखते थे। लेकिन 22 भाषाओं में भास्कर आने पर उनकी पकड़ ढीली पड़ सकती है।

  3. डिजिटल और प्रिंट का संयुक्त मॉडल
    भास्कर पहले से ही डिजिटल न्यूज़ पोर्टल और मोबाइल ऐप पर सक्रिय है। अगर 22 भाषाओं में कंटेंट तैयार होगा तो यह मल्टीलिंगुअल डिजिटल डॉमिनेशन का सबसे बड़ा प्रयोग होगा।

कौन-कौन सी होंगी 22 भाषाएं?

अडाणी और भास्कर की साझा योजना के तहत अख़बार इन भाषाओं में निकलेगा:
असमिया, बंगाली, गुजराती, हिंदी, कन्नड़, कश्मीरी, कोंकणी, मलयालम, मणिपुरी, मराठी, नेपाली, उड़िया, पंजाबी, संस्कृत, सिंधी, तमिल, तेलुगू, उर्दू, बोडो, संथाली, मैथिली और डोंगरी।

यह वही भाषाएं हैं जिन्हें भारत के संविधान की आठवीं अनुसूची में मान्यता प्राप्त है।

चुनौतियां क्या होंगी?

1. अनुवाद और लोकलाइजेशन

हर भाषा की अपनी सांस्कृतिक बारीकियां और अलग पाठकीय प्रवृत्ति है। एक ही खबर को हिंदी और कन्नड़ में लिखने का तरीका बिल्कुल अलग होगा। इसके लिए बड़े स्तर पर लोकल एडिटोरियल टीमें खड़ी करनी होंगी।

2. इंफ्रास्ट्रक्चर और वितरण

22 भाषाओं में अख़बार छापना सिर्फ कंटेंट का काम नहीं, बल्कि प्रिंटिंग प्रेस से लेकर डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क तक बड़ा खर्चा है। हर राज्य में प्रेस और चैनलाइज्ड सप्लाई चेन चाहिए होगी।

3. मानव संसाधन

22 भाषाओं के लिए हजारों पत्रकार, अनुवादक, एडिटर्स और डिस्ट्रीब्यूशन कर्मचारी चाहिए होंगे। यह भारतीय मीडिया इंडस्ट्री का अब तक का सबसे बड़ा रोज़गार अवसर भी बन सकता है।

4. प्रतिस्पर्धा और प्रतिक्रिया

भास्कर के इस कदम से पहले ही दैनिक जागरण, हिन्दुस्तान, अमर उजाला जैसे मीडिया समूह बैकफुट पर आ गए हैं। आने वाले समय में इनकी रणनीति और प्रतिक्रिया देखना दिलचस्प होगा।

सुधीर अग्रवाल की प्रतिक्रिया

दैनिक भास्कर समूह के मैनेजिंग डायरेक्टर सुधीर अग्रवाल ने अडाणी प्रस्ताव पर कहा:

“हमें अडाणी ग्रुप का प्रस्ताव मिला है। हम विचार कर रहे हैं कि श्री रमेशचंद्र जी अग्रवाल द्वारा जो पौधा लगाया गया है, उसे विश्व कीर्तिमान स्तर तक कैसे ले जाया जाए। अगर हमारे विचारों का तालमेल सही बैठा तो हम इस दिशा में आगे बढ़ेंगे।”

यह बयान साफ इशारा करता है कि फिलहाल समझौते के शुरुआती दौर की बातचीत चल रही है।

आर्थिक पहलू

गौतम अडाणी ने साफ कर दिया है कि आर्थिक रूप से कोई दिक्कत नहीं होगी।

  • अडाणी ग्रुप पहले से मीडिया में NDTV के अधिग्रहण के जरिए प्रवेश कर चुका है।

  • विज्ञापन और रेवेन्यू मॉडल पर भरोसा जताया जा रहा है।

  • 90 करोड़ पाठकों का आधार मिलने पर यह भारत का ही नहीं बल्कि दुनिया का सबसे बड़ा मीडिया नेटवर्क बन सकता है।

मीडिया इंडस्ट्री में हलचल

इस खबर के सामने आते ही हिन्दुस्तान, दैनिक जागरण और अमर उजाला जैसे पुराने मीडिया हाउस बैकफुट पर दिखाई दे रहे हैं।
मीडिया विश्लेषकों का मानना है कि अगर भास्कर- अडाणी गठबंधन सफल हुआ तो बाकी समूहों को भी 5–10 वर्षों में मल्टीलिंगुअल विस्तार करना पड़ेगा।

पाठकों पर असर

  1. स्थानीय भाषा में अख़बार
    उत्तर-पूर्व भारत या कश्मीर जैसे इलाकों में लोग पहली बार अपनी मातृभाषा में दैनिक भास्कर देख पाएंगे।

  2. नए पाठक वर्ग
    छोटे कस्बों और गांवों में वे लोग, जो हिंदी या अंग्रेज़ी अख़बार नहीं पढ़ते, अब सीधे जुड़ सकेंगे।

  3. विश्वसनीयता बनाम क्षेत्रीय स्वाद
    चुनौती होगी कि भास्कर अपनी राष्ट्रीय पहचान को बनाए रखते हुए स्थानीय मुद्दों को कितनी गहराई से कवर कर पाएगा।

संभावित टाइमलाइन

  • 2025–26: प्रोजेक्ट की रूपरेखा और प्रारंभिक टीम बनाना।

  • 2027–28: 8–10 भाषाओं में पहला चरण लॉन्च।

  • 2030–31: बाकी भाषाओं में विस्तार और डिजिटल पोर्टल्स का मजबूत आधार।

  • 2035: 22 भाषाओं में पूर्ण प्रकाशन और 90 करोड़ पाठकों का लक्ष्य।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर महत्व

अगर भास्कर यह प्रयोग सफल करता है तो भारत दुनिया का पहला देश होगा जहां एक ही मीडिया हाउस संविधान मान्य सभी भाषाओं में प्रकाशन करता है।

  • अमेरिका या यूरोप में भी ऐसा मॉडल नहीं है।

  • यह भारतीय भाषाई विविधता और लोकतंत्र की ताकत का प्रतीक होगा।

भारतीय मीडिया उद्योग की दिशा और दशा बदल जाएगी

भले ही यह प्रस्ताव अभी शुरुआती चरण में है, लेकिन अगर यह सफल होता है तो भारतीय मीडिया उद्योग की दिशा और दशा बदल जाएगी।
दैनिक भास्कर और अडाणी ग्रुप का यह सपना सिर्फ एक मीडिया विस्तार नहीं बल्कि भाषाई एकता, सांस्कृतिक विविधता और आर्थिक शक्ति का संयुक्त प्रदर्शन होगा।

आने वाले दस वर्षों में यह तय करेगा कि भारत का मीडिया सिर्फ राष्ट्रीय स्तर पर नहीं बल्कि वैश्विक स्तर पर भी अपना दबदबा कायम कर सकता है या नहीं।


Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor