राइजिंग भास्कर. जोधपुर
श्री दिलीप पुरोहित (राइजिंग भास्कर मीडिया) द्वारा लिखी गई यह टिप्पणी केवल एक फिल्म की समीक्षा नहीं है, बल्कि समाज को झकझोर कर सोचने के लिए मजबूर करने वाला गंभीर विश्लेषण है। उन्होंने बिल्कुल सही प्रश्न उठाया है कि फिल्में केवल कल्पना नहीं होतीं; वे अक्सर समाज की उन सच्चाइयों का आईना होती हैं, जिन्हें हम देखने या स्वीकार करने से बचते रहते हैं।
The Kerala Story और The Kerala Story 2: Goes Beyond को लेकर जो बहस चल रही है, उसमें श्री पुरोहित ने एक महत्वपूर्ण बात कही है—मुद्दा यह नहीं है कि फिल्म की हर घटना का लिखित प्रमाण मौजूद है या नहीं; बल्कि यह है कि यदि समाज में ऐसी घटनाओं की आशंका और परिस्थितियाँ ही न हों, तो ऐसी कहानियाँ फिल्म के रूप में सामने ही क्यों आएँ?
इतिहास गवाह है कि कई सच्चाइयाँ वर्षों तक दबाई जाती रही हैं। The Kashmir Files ने भी कश्मीरी पंडितों के पलायन और उनकी पीड़ा को उस समय सामने लाया, जब दशकों तक उस विषय पर पर्याप्त चर्चा नहीं हुई। इससे यह स्पष्ट होता है कि सिनेमा कई बार समाज की अनदेखी वास्तविकताओं को सामने लाने का माध्यम बनता है।
मारवाड़ और राजस्थान के इतिहास में भी ऐसे उदाहरण रहे हैं जब अत्याचार और सामाजिक पीड़ा लंबे समय तक दबे रहे। जैसलमेर के दीवान Salim Singh के अत्याचारों से तंग आकर Paliwal Brahmins द्वारा एक ही रात में अपने गाँव छोड़ देना इस बात का प्रमाण है कि कई बार समाज की पीड़ा आवाज़ उठाने से पहले ही इतिहास बन जाती है।
The Kerala Story 2: Goes Beyond : क्या लव जिहाद की आंच जोधपुर तक पहुंच चुकी है? हिंदू कुंवारी लड़कियों को फांसने और अत्याचार पर एक रिपोर्ट – Rising Bhaskar








