आओ हम मिल दशहरा मनाते हैं
आओ हम मिल दशहरा मनाते हैं।
अब मारें अपने दश-दुष्कर्मों को ।।
क्यों मारते हैं हर वर्ष रावण को।
आओ हम मारें अपने अंहकार को।
मरता क्यों नहीं फिर ये, रावण ।
हां, रोकें हो रही अमानुषता को।।
न्याय नहीं जब शासन व्यवस्था में।
तो फिर आओ जमीर जगाने को।।
धर्म नहीं सिखाता है बुराई करना।
आओ सबका दुख दूर करने को।।
घर- समाज-देश में सब खुश रहें।
त्याग करें दशहरे पर अपने क्रोध को ।।
न जलाएं कागज बांस के ये पुतले ।
मन का मैल जलाएं, छोड़ें ईर्ष्या को।।
मद-मोह-लोभ जो भीतर छिपे हैं।
क्यों न मारें सब, इन दुष्ट रावणों को ।।
स्वच्छ रहे ये समाज, प्रदूषण से मुक्त।
प्रतीकात्मक रूप से मनाएं दशहरे को ।।