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Thursday, April 23, 2026, 3:43 pm

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सुचेता कृपलानी शिक्षा संस्थान : जहां दिव्यांगों को मिली जीने की राह…कोई डॉक्टर बन कर रहे सेवा, किसी ने खेलों में रचा इतिहास

 
मेरे पिताजी पद्मश्री पद्म भूषण, राज्यसभा मनोनीत सदस्य डॉ. नारायण सिंह माणकलाव का मानना है कि दिव्यांगता कोई सीखी हुई चीज नहीं, बल्कि प्रकृति की देन है। इस संवेदना ने उनके हृदय को गहराई से प्रभावित किया और उन्होंने समाज के इस विशेष वर्ग के लिए कुछ करने का निश्चय किया…सन् 1991 में उन्होंने मात्र 15 बच्चों के साथ इस विद्यालय की शुरुआत की : डॉ. भैरूसिंह भाटी
सुचेता कृपलानी शिक्षा संस्थान के सचिव डॉ. भैरूसिंह भाटी से राइजिंग भास्कर की विशेष बातचीत

दिलीप कुमार पुरोहित. राखी पुरोहित. जोधपुर

9783414079 diliprakhai@gmail.com

दिव्यांगता व्यक्ति की स्वाभाविक स्थिति है जो प्रकृति प्रदत्त है। मगर दिव्यांग व्यक्ति अपनी प्रतिभा, अपनी काबिलियत और मेहनत-समर्पण के बल पर वो कर दिखाते हैं जिसकी आम आदमी कल्पना भी नहीं कर सकता। माणकलाव स्थित सुचेता कृपलानी शिक्षा संस्थान एक ऐसा ही संस्थान है जिसके दिव्यांग छात्र-छात्राएं आज अपनी दिव्यता के लिए पहचान बना चुके हैं। राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना चुके इस संस्थान के सचिव डॉ. भैरूसिंह भाटी से राइजिंग भास्कर ने लंबी बातचीत की। यहां प्रस्तुत है संपादित अंश-

राइजिंग भास्कर : आपको सुचेता कृपलानी शिक्षा संस्थान की स्थापना का विचार कैसे आया? इस प्रेरणा  के पीछे कौन-सा जीवन अनुभव या संवेदना थी?
डॉ. भैरुसिंह भाटी : मेरे पिताजी पद्मश्री पद्म भूषण, राज्यसभा मनोनीत सदस्य डॉ. नारायण सिंह माणकलाव एक प्रतिष्ठित समाजसेवी है। उन्होंने समाजसेवा के क्षेत्र में कार्य करते हुए नशा मुक्ति कार्यक्रम के अंतर्गत लोगों को नशे से मुक्त कराने के लिए एक नशा मुक्ति केंद्र की स्थापना की थी। इसी दौरान उन्होंने यह विचार किया कि नशा व्यक्ति गलत संगति से सीखता है, जबकि दिव्यांगता कोई सीखी हुई चीज नहीं, बल्कि प्रकृति की देन है। इस संवेदना ने उनके हृदय को गहराई से प्रभावित किया और उन्होंने समाज के इस विशेष वर्ग के लिए कुछ करने का निश्चय किया।
वहीं से, सन् 1991 में उन्होंने मात्र 15 बच्चों के साथ इस विद्यालय की शुरुआत की। इसके बाद मैंने अपने पिताजी के साथ मिलकर इस कार्य को आगे बढ़ाने में उनका सहयोग किया। तभी से यह संस्था  दिव्यांग बच्चों की शिक्षा, पुनर्वास और सेवा के लिए निरंतर कार्यरत हैं।
राइजिंग भास्कर : जब आपने इस संस्थान की नींव रखी, तब आपके मन में दिव्यांग विद्यार्थियों के लिए क्या सपना था?
डाॅ. भैरुसिंह भाटी : मेरा सपना था कि हर दिव्यांग विद्यार्थी आत्मनिर्भर बने, सम्मान से जिए और समाज के लिए प्रेरणा बनें। हम उन्हें दया के पात्र नहीं, बल्कि देश की ताकत के रूप में देखना चाहते हैं।
राइजिंग भास्कर : संस्थान की स्थापना के शुरुआती दिनों में कौन-कौन सी प्रमुख चुनौतियां सामने आईं और आपने उन्हें कैसे पार किया?
डॉ. भैरुसिंह भाटी : शुरुआत में सबसे बड़ी चुनौती लोगों की सोच थी। बहुतों को विश्वास नहीं था कि दिव्यांग बच्चे पढ़ सकते हैं या कुछ कर सकते हैं। संसाधनों और प्रशिक्षित शिक्षकों की कमी भी रही। लेकिन दृढ़ निश्चय और समाज के कुछ संवेदनशील लोगों के सहयोग से हमने धीरे-धीरे हर कठिनाई को पार किया।
राइजिंग भास्कर : आपके अनुभव में, यहां आने वाले छात्रों में कौन-सी ऐसी विशेषता है जो आम विद्यार्थियों से उन्हें अलग बनाती है?
डॉ. भैरुसिंह भाटी :  इन बच्चों की जिजीविषा और हिम्मत असाधारण है, जहां सामान्य बच्चा हार मान लेता है, वहीं ये बच्चे मुस्कुराकर आगे बढ़ते हैं। उनकी यही ऊर्जा हमारे लिए रोज नई प्रेरणा बनती है।
राइजिंग भास्कर : संस्था दिव्यांग छात्रों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए किन प्रमुख गतिविधियों या प्रशिक्षणों पर काम कर रही है?
डॉ. भैरुसिंह भाटी : हम व्यावसायिक प्रशिक्षण, कंप्यूटर शिक्षा, सिलाई-कढ़ाई, संगीत, हस्तशिल्प और खेल गतिविधियों के माध्यम से बच्चों को आत्मनिर्भर बना रहे हैं। हमारा उद्देश्य है कि वे स्वयं अपने पैरों पर खड़े हों।
राइजिंग भास्कर : संस्थान के छात्र खेल प्रतियोगिताओं में मेडल जीत चुके हैं। उनके इस प्रदर्शन को देखकर आपकी क्या अनुभूति होती है?
डॉ. भैरुसिंह भाटी : जब हमारे विद्यार्थी राष्ट्रीय या राज्य स्तर पर मेडल जीतते हैं तो दिल गर्व से भर जाता है। यह साबित करता है कि दिव्यांगता शरीर में होती है, आत्मा में नहीं। ये बच्चे सच्चे योद्धा हैं।
राइजिंग भास्कर : क्या संस्थान में केवल शिक्षा ही नहीं, बल्कि जीवन कौशल और व्यक्तित्व विकास पर भी विशेष ध्यान दिया जाता है?
डॉ. भैरुसिंह भाटी : जी हां, हम समग्र विकास पर विश्वास करते हैं। बच्चों को आत्मविश्वास, स्वावलंबन, संचार कौशल और सामाजिक व्यवहार सिखाया जाता है ताकि वे जीवन में किसी भी परिस्थिति का सामना कर सकें।
राइजिंग भास्कर : आपको क्या लगता है, समाज में दिव्यांगों के प्रति दृष्टिकोण कितना बदला है और इसमें और क्या बदलाव की जरूरत है?
डॉ.भैरुसिंह भाटी : सोच में बदलाव जरूर आया है, पर अभी भी दूरी बाकी है। समाज को यह समझना होगा कि दिव्यांग व्यक्ति किसी बोझ नहीं हैं वे भी समाज के समान सदस्य हैं। उन्हें अवसर और सम्मान की जरूरत है, दया की नहीं।
राइजिंग भास्कर : दिव्यांग विद्यार्थियों के परिवारों की भागीदारी संस्था के साथ कैसे सुनिश्चित की जाती है?
डॉ. भैरुसिंह भाटी :  हम नियमित अभिभावक बैठकें आयोजित करते हैं। अभिभावकों को भी बच्चों की शिक्षा और प्रगति में शामिल किया जाता है। इस तरह विद्यालय और घर दोनों मिलकर बच्चे के भविष्य को मजबूत करते हैं।
राइजिंग भास्कर : सुचेता कृपलानी शिक्षा संस्थान का वातावरण ऐसा क्या है जो बच्चों में आत्मविश्वास और सकारात्मक सोच पैदा करता है?
डॉ. भैरुसिंह भाटी :  हमारे संस्थान का वातावरण परिवार जैसा है, यहां हर बच्चा प्यार, सम्मान और सहयोग महसूस करता है। शिक्षक बच्चों के मित्र हैं, जिससे वे खुलकर सीखते हैं और आत्मविश्वास से बढ़ते हैं।
राइजिंग भास्कर : क्या आप किसी ऐसे छात्र या छात्रा की कहानी साझा कर सकते हैं जिसने यहां से शिक्षा लेकर समाज में प्रेरणा का उदाहरण पेश किया हो?
डॉ. भैरुसिंह भाटी : हमारी कई सफल कहानियां हैं।
1. हमारी संस्था से दिव्यांग बालिका डाॅ. अनुराधा राठौड़ ने एम.बी.बी.एस. (एम.डी.) राजकीय मेडिकल काॅलेज बीकानेर राजस्थान  मे अपनी सेवाएं दे रही है। 
2. डाॅ. सुरेश कुमार ने भी एम.बी.बी.एस किया और राजकीय चिकित्सालय केरु जोधपुर राजस्थान में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।
3. छात्रा जीतु कंवर भाटी की प्रेरक कहानी- 
हमारे संस्थान की प्रतिभाशाली छात्रा जीतु कंवर भाटी आज अनेक विद्यार्थियों के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं। जन्म से ही उनके हाथ और पैरों में गंभीर विकलांगता थी, परंतु उन्होंने कभी अपने आत्मविश्वास और लगन को कम नहीं होने दिया। उन्हें पढ़ाई में गहरी रुचि थी, और शिक्षकों के मार्गदर्शन में उन्होंने कठिन परिस्थितियों के बावजूद उत्कृष्ट प्रदर्शन किया।
यही नहीं, उन्होंने खेलों में भी अपनी प्रतिभा साबित की और राज्य स्तर पर कई पदक जीते। वर्तमान में जीतु कंवर भाटी जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली में शिक्षा के क्षेत्र में पी.एच.डी. कर दी हैं। वह आज शिक्षा और खेल दोनों माध्यमों से समाज की सेवा कर रही हैं और यह सिद्ध कर रही हैं कि यदि संकल्प मजबूत हो, तो कोई भी शारीरिक कमी सफलता की राह में बाधा नहीं बन सकती।
इसके अलावा सन् 2002 में संस्था की अध्यक्ष सुश्री स्नेह गुप्ता  के नेत्तृव मे विद्यालय की बालकों की टीम (जिसमे जनक सिंह, अमर सिंह, प्रेमाराम आदि) ने और सन् 2003 में बालिकाओं की टीम (जिसमे परमेश्वरी विश्नोई, जैना गुर्जर, छोटा कंवर, संगीता विश्नोई आदि) ने इंग्लैंड में आयोजित मिनी पैरा ओलंपिक गेम्स में भाग लिया। इन मिनी पैरा ओलंपिक का आयोजन लंदन ओलंपिक खेलों के अंतर्गत किया गया था। इन प्रतियोगिताओं में हमारे विद्यालय के खिलाडि़यों ने उत्कृष्ट प्रदर्शन करते हुए 26 स्वर्ण पदक जीतकर विद्यालय और देश का नाम रोशन किया।
इस प्रकार हमारी संस्था से लगभग 700 से अधिक दिव्यांग बालक बालिकाएं केन्द्र व राजकीय सेवा मे अपना योगदान दे रहे है जैसे – भारतीय रेलवे, बैंक, शिक्षा, चिकित्सक, व अन्य विभागों मे कार्यरत है।
राइजिंग भास्कर : क्या संस्था में आधुनिक तकनीक या डिजिटल माध्यमों का उपयोग दिव्यांग छात्रों की शिक्षा और प्रशिक्षण में किया जा रहा है?
डॉ. भैरुसिंह भाटी :  हां, हम स्मार्ट क्लास, ब्रेल कंप्यूटर, ऑडियो लर्निंग टूल्स और डिजिटल बोर्ड जैसी तकनीक का उपयोग करते हैं। तकनीक ने शिक्षा को बच्चों के लिए अधिक सरल और आनंददायक बना दिया है।
राइजिंग भास्कर : दिव्यांग छात्रों के साथ काम करने वाले शिक्षकों को आप किस तरह प्रशिक्षित या प्रेरित करते हैं?
डॉ. भैरुसिंह भाटी : हमारे यहां अधिकांश शिक्षक स्वयं दिव्यांग हैं और यही हमारे संस्थान की सबसे बड़ी विशेषता है। हमारा मानना है कि एक दिव्यांग व्यक्ति ही दूसरे दिव्यांग की भावनाओं और कठिनाइयों को सही मायने में समझ सकता है। इन शिक्षकों ने भी यहीं से शिक्षा प्राप्त की है, इसलिए वे न केवल शैक्षणिक दृष्टि से सक्षम हैं, बल्कि संवेदनात्मक रूप से भी अपने विद्यार्थियों से गहराई से जुड़ते हैं।
उनकी सोच अत्यंत सकारात्मक है और वे बच्चों को आत्मविश्वास से भरने का कार्य करते हैं। साथ ही, वे विद्यार्थियों की काउंसलिंग भी करते हैं, जिससे बच्चे मानसिक रूप से मजबूत बनें और अपने जीवन की चुनौतियों का डटकर सामना कर सकें। वर्तमान में ये सभी सुचेता कृपलानी दिव्यांग शिक्षा निकेतन में अपनी सेवाएं निष्ठा और समर्पण भाव से प्रदान कर रहे हैं।
1. लक्ष्मण सिंह दिव्यांग (प्रबंधक)
2. रामप्यारी बिश्नोई दिव्यांग (प्रधानाध्यापिका)
3. मालम सिंह (दिव्यांग) गणित अध्यापक
4. नैनी चौधरी (दिव्यांग) हिन्दी अध्यापिका
5. सोहनी चौधरी (दिव्यांग) सामाजिक विज्ञान अध्यापिका
6. अन्नाराम (दिव्यांग) हिन्दी अध्यापक
7.जसवंत सिंह (दिव्यांग) अंग्रेजी अध्यापक
8. छोटा कंवर (दिव्यांग) सामाजिक विज्ञान अध्यापिका
9. नरेंद्र (दिव्यांग) कम्प्यूटर ऑपरेटर  बी.एड.काॅलेज
10.बाबूराम (दिव्यांग) वार्डन
11. प्रेम सिंह (दिव्यांग) पी.टी.आई
12.युगल किशोर (दिव्यांग) चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी बी.एड. काॅलेज
13.परसाराम (दिव्यांग) पी.टी.आई
14.देदाराम (दिव्यांग) चौकीदार
15. सुरेश (दिव्यांग) चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी स्कूल
16.गुडि़या (दिव्यांग) रसोइया
17. नारायण बिश्नोई (दिव्यांग) इलेक्ट्रिशियन
राइजिंग भास्कर : क्या संस्था को सरकार या समाज के अन्य संगठनों से सहयोग मिलता है? इस सहयोग से क्या बदलाव आए हैं?
डॉ. भैरुसिंह भाटी :  हां, हमें सरकार और कई सामाजिक संगठनों से सहयोग प्राप्त होता है। इस सहयोग से हमारी सुविधाएं बढ़ी हैं, संसाधन सुधरे हैं और हम अधिक विद्यार्थियों तक पहुंच पाए हैं।
राइजिंग भास्कर : आपको क्या लगता है दिव्यांग और सामान्य विद्यार्थियों के लिए समान अवसर सुनिश्चित करने के लिए शिक्षा व्यवस्था में क्या सुधार जरूरी हैं?
डॉ. भैरुसिंह भाटी : शिक्षा व्यवस्था को अधिक समावेशी बनाना चाहिए। स्कूलों व काॅलेजों दिव्यांगों के लिए पूर्ण रुप से दिव्यांगजन सुविधाजनक कैम्पस होना चाहिए। जो की हमारी संस्थान में दिव्यांग जनों की  सुविधा के लिए उपलब्ध है। विशेष शिक्षण सामग्री और प्रशिक्षित शिक्षक होने चाहिए ताकि हर दिव्यांग बच्चा समान रूप से सीख सकें।
राइजिंग भास्कर : आने वाले वर्षों में आप संस्थान को किन नई दिशाओं या प्रोजेक्ट्स की ओर ले जाना चाहते हैं?
डॉ. भैरुसिंह भाटी : व्यावसायिक प्रशिक्षण हम पैरा ओलिम्पिक खेलकूद के लिए समय की आवश्यकता अनुसार  अन्तरराष्ट्रीय स्तर की पैरा स्पोर्ट्स अकेडमी की स्थापना करना चाहते है। केंद्र, डिजिटल लैब और पुनर्वास कार्यक्रमों को और सशक्त बनाना चाहते हैं। हमारा लक्ष्य है कि कोई भी दिव्यांग बच्चा शिक्षा या रोजगार अवसर से वंचित न रहें।
राइजिंग भास्कर : यहां पढ़ने के बाद विद्यार्थियों में जो आत्मविश्वास और जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण आता है, वह आपको व्यक्तिगत रूप से किस तरह प्रभावित करता है?
डॉ. भैरुसिंह भाटी : जब मैं बच्चों की मुस्कान और आत्मविश्वास देखता हूं तो मेरा हृदय संतोष से भर जाता है। यह मुझे हर दिन और अधिक सेवा की प्रेरणा देता है।
राइजिंग भास्कर : एक संस्थापक के रूप में, दिव्यांग बच्चों के साथ काम करते हुए आपने खुद में कौन-से भावनात्मक या मानवीय परिवर्तन महसूस किए?
डॉ. भैरुसिंह भाटी : इन बच्चों के साथ काम करते हुए मैंने सीखा कि सच्ची खुशी दूसरों की मुस्कान में है। पहले यह मेरे लिए एक संवेदना थी, अब यह मेरे जीवन का समर्पण बन गया है।
राइजिंग भास्कर : आप समाज के लोगों, विशेष रूप से युवाओं को दिव्यांगजनों के प्रति क्या संदेश देना चाहेंगे?
डॉ. भैरुसिंह भाटी : मैं युवाओं से कहना चाहता हूं कि दिव्यांगजनों को दया नहीं, अवसर दें। हर व्यक्ति में एक विशेषता होती है बस हमें उसे पहचानने और प्रोत्साहित करने की जरूरत है।
राइजिंग भास्कर :  यदि आपको एक वाक्य में अपने संस्थान की भावना या मिशन को परिभाषित करना हो, तो वह क्या होगा?
डॉ. भैरुसिंह भाटी :  “हमारी भावना है हमारी संस्थान के दिव्यांगजन भारतीय अर्थव्यवस्था में अपनी भागीदारी निभानें में किसी से भी कम नही रहे। यही कामना करता हूं।
Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor