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Sunday, August 23, 2026, 9:58 am

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Lifestyle

कविता : ये गुलाबी सर्दी- अनिल भारद्वाज

ये गुलाबी सर्दी

तुम्हें गुलाबी सर्दी के दिन रोज बुलाते हैं।
मेरे सूने गीत तुम्हें आवाज लगाते हैं।

हीरे मोती जवाहरात से
रात के प्रहर लगते,
महक तुम्हारी लेकर पुष्प
रातरानी के खिलते।

चांद चांदनी और सितारे तुम्हें बुलाते हैं।
तुम्हें गुलाबी सर्दी के दिन रोज बुलाते हैं।

नींद जरा भी आती तो तुम
सपने में आ जाते,
आंखें खुलते ही जाने किस
जहां में चले जाते।

जब तुम मन को भाए वे पल तुम्हें बुलाते हैं।
तुम्हें गुलाबी सर्दी के दिन रोज बुलाते हैं।

ख्वाबों में ये यादें हमसे
तुम्हें मिला जातीं हैं,
तुमसे मिलने की चाहत को
और बढ़ा जातीं हैं।

हम प्रतीक्षाओ के दीपक रोज जलाते हैं।
तुम्हें गुलाबी सर्दी के दिन रोज बुलाते हैं।

यादों की बरसातें मन को
रोज भिगो जातीं हैं,
अश्कों के मोती पलकों में
रोज पिरो जातीं हैं।

देहरी द्वार झरोके आंगन तुम्हें बुलाते हैं।
तुम्हें गुलाबी सर्दी के दिन रोज बुलाते हैं।

गीतकार अनिल भारद्वाज एडवोकेट हाईकोर्ट ग्वालियर
Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor