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Sunday, August 23, 2026, 6:48 pm

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Lifestyle

समाधि अवस्था क्या है?

लेखक : शिव सिंह
9784092381

​जब केवल ध्येय स्वरूप का ही भान रहे, ध्यान की उस अवस्था को समाधि कहते हैं । समाधि ध्यान की चरम सीमा होती है, जिसे कायोत्सर्ग भी कहते हैं । जिसमें शरीर, मन और वाणी की प्रवृत्तियां समाप्त हो जाती हैं और साधक मुक्त अवस्था को प्राप्त कर लेता है।

​समाधि अथवा कायोत्सर्ग में शिथिलीकरण के साथ-साथ सजगता, ममत्व का विसर्जन और भेद विज्ञान का चिन्तन आवश्यक होता है । जबकि शवासन में केवल शिथिलीकरण होता है। ​अष्टांग योग के प्रथम पांच अंगों अर्थात् यम, नियम, आसन, प्राणायाम और प्रत्याहार को बहिरंग योग तथा अन्तिम तीन धारणा, ध्यान और समाधि को अतरंग योग कहा जाता है । यह बहिरंग योग को विवेक पूर्ण जीवन में उतारा जाये तो मनुष्य में मानवीय गुणों के विकसित होने के साथ-साथ शारीरिक, मानसिक और आत्मिक विकास भी होता है, जो स्वस्थ जीवन का मूलाधार होता है ।

पतंजलि योग में यम नियमों द्वारा अन्त: चेतना की सफाई के बाद आसन, प्राणायाम से शरीर बलवान होता है । वहीं प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि से मनोबल और आत्म बल बढ़ता है । जिस प्रकार फूटे हुए घडे़ को छिद्र बन्द करने के पश्चात् ही पानी से भरा जा सकता है । अच्छी फसल के लिए खेती की जीव जन्तुओं से रक्षा और खाद देने के साथ-साथ, पानी से नियमित सिंचन और धूप की भी आवश्यकता होती है । योग साधना ऐसी ही खेती है, जिसे यम-नियम द्वारा हिंसा, झूठ, चोरी, व्यभिचार, लोभ, मलिनता, तृष्णा, आलस्य, अज्ञान जैसे दस प्रकार के दुर्गुणों रूपी हानिकारक आत्मिक विकारों से रक्षा करनी होती है और आसनों का खाद तथा प्राणायाम का पानी देना होता है, तभी संतोषजनक स्वास्थ्य की उपलब्धि होती है । शरीर आकर्षक और पुष्ट बनता है । शरीर में हल्कापन, कार्य करने का उत्साह बढ़ता है । शरीर की बैटरी चार्ज हो जाती है । चिन्ता, भय, निराशा, अनिद्रा, दुर्बलता, आलस्य आदि दूर होकर व्यक्ति सजग एवम् अप्रमादी बनने लगता है । अपने आपको पहचानने लगता है । आत्मवलोकन करने लगता है । यही तो आत्मा से परमात्मा में बनने की कला कहलाती है ।

 

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor