ग़ज़ल : मनशाह ‘नायक’
कोई हंसता है कोई रोता है…
कोई हँसता है कोई रोता है
ये तो तक़दीर का तकाज़ा है
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तुझ से तेरा रुमाल अच्छा है
आंसुओं के करीब रहता है
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क्यूं उसे ज़ोर से पुकारो हो
दूर बैठा वो मन की सुनता है
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दो ही मंज़र हैं सारी दुनिया में
धूप है और कहीं पे साया है
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और तो क्या है मेरी ग़ज़लों में
तेरी यादें हैं तेरा चेहरा है
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मन में मूरत जो बस गई “नायक”
रात दिन अब उसी की पूजा है
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मनशाह “नायक”
(हर्मिटेज, सूरसागर, जोधपुर)







